बुजुर्तों के साथ अच्छा व्यवहार सफलता की कुंजी -दिनेश मालवीय

बुजुर्तों के साथ अच्छा व्यवहार सफलता की कुंजी

-दिनेश मालवीय

हमारे देश में युगों-युगों से बुजुर्गों, यानी वृद्धजन के साथ अच्छा व्यहार को सफलता की कुंजी माना गया है. जो भी व्यक्ति अपने घर के ही नहीं, बल्कि सभी बुजुर्गों के साथ अच्छा व्यवहार करता है, उसे जीवन में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. पूछा जा सकता है कि ऐसा क्यों है?

इसका जबाव यह है कि उम्र ढलने के बाद व्यक्ति हर दृष्टि से कमज़ोर हो जाता है. उसमें कुछ भी काम करने की पहले जैसी शक्ति नहीं रह जाती. साथ ही उसका पहले जैसा सम्मान और प्रभाव नहीं रह जाता. ऐसी स्थिति में जब कोई उसके साथ अच्छा व्यवहार करता है, तो उसके मन में अच्छा व्यवहार करने वाले के लिए अच्छे भाव पैदा होते हैं और वह उसके कल्याण और भले की कामना करता है. इस बात को शायद शब्दों में समझाना बहुत मुश्किल है, लेकिन यह एक तथ्य है कि बुजुर्गों के मन में जो कामना होती है वह फलित होकर ही रहती है.
   
इसीलिए कहा गया है कि बुजुर्गों का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए और अपमान तो किसी भी हालत में नहीं किया जाना चाहिए. भारत में तो सदा यह शिक्षा दी जाती रही है कि व्यक्ति को सुबह उठकर सबसे पहले माता-पिता और फिर अपने गुरु या उनकी तस्वीर को प्रणाम निवेदित करना चाहिए. मृकंडू ऋषि का पुत्रमारकंडेय अल्पायु था. महर्षि नारद ने उसके अल्पायु दोष के निवारण के लिए  दो ही उपाय बताये थे- शिव की उपासना और अधिक से अधिक बुजुर्गों का चरण स्पर्श.

ज्ञानीजन तो यहाँ तक कहते हैं कि व्यक्ति को सुबह बिस्तर से उठकर धरती पर पांव रखने से पहले धरती को स्पर्श कर उसे प्रणाम करना चाहिए. ऐसा भाव रखना चाहिए कि है माता मैं दिन-भर न आप पर न जाने कितने अत्याचार करूँगा. कृपया मुझे क्षमा कर देना.

कहा गया है कि वृद्धजन को रोजाना प्रणाम करने और उनकी सेवा करने से आयु, विद्या, यश और  बल की प्राप्ति होती है.

यह बात याद रखी जानी चाहिए कि वृद्ध तीन प्रकार के होते हैं- आयु वृद्ध, ज्ञानवृद्ध और तपवृद्ध. इन तीनों का ही आदर करना चाहिए. ज्ञान और तप से समृद्ध यदि कोई आपसे छोटा भी हो, तो उसे सादर प्रणाम करना चाहिए.

जब कोई वृद्ध व्यक्ति किसी युवा के सामने आता है, तो युवा के प्राण ऊपर उठने लगते हैं. जब वह उठकर उसे प्रणाम करता है तो पुन: अपने प्राणों की वास्तविकता प्राप्त कर लेता है. यदि आप आसन पर बैठे हों या शय्या पर विराजमान हों अथवा वाहन पर सवार हों, तो किसी वृद्ध के सामने आने पर उतर कर प्रणाम करना चाहिए. बैठे-बैठे ही प्रणाम करना अशिष्ठ्ता मानी जाती है.

साथ ही सिर पर टोपी पहने हुए या हाथ में कुछ लिए हुए वृद्धों को प्रणाम नहीं करना चाहिए. स्त्रियों को सिर ढांककर ही वृद्धों को प्रणाम करना चाहिए. गौतम स्मृति में कहा गया है कि जूते पहन कर नहीं बैठना चाहिए, भोजन नहीं करना चाहिए, सोना नहीं चाहिए और गुरुजनों को जूते पहन कर अभिवादन नहीं करना चाहिए. यह बात देवता, महापुरुष और श्रेष्ठजन के लिए भी लागू होती है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ औपचारिकता के नाते प्रणाम नहीं करना चाहिए. प्रणाम सच्चे मन और श्रद्धा के साथ करना चाहिए.

यह बात बहुत वैज्ञानिक है. इसे कोई भी आजमा कर देख सकता है. जो लोग उठकर अपने माता-पिता, अन्य वृद्धों और गुरु-चित्र को प्रणाम नहीं करते, वे इसे शुरू करके देख लें. इसके अच्छी परिणाम बहुत जल्दी सामने आने लगेंगे. लेकिन जैसाकि पहले कहा गया प्रमाण श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए, औपचारिकता के लिए नहीं. सांच को आंच नहीं. आप आजमा कर तो देखए. आप स्वयं महसूस करेंगे कि आपको कुछ अद्भुत प्राप्ति हो रही है.

वृद्धजन का अपमान तो भूले से भी नहीं करना चाहिए. वे भले ही बद्दुआ न दें और मुंह से कुछ बुरा न कहें, लेकिन ईश्वर इसका बहुत बुरा मानता है.

तो आइये, आज से ही इस पर अमल करके देखिये और परिणामों को महसूस कीजिए.

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