धर्म सूत्र:- 5: क्या दुष्टों में भी भगवान है? जब पाप में भी वही है तो मैं पाप क्यों न करूँ? क्या शुभ क्या अशुभ? P ATUL VINOD

धर्म सूत्र:- 5: क्या दुष्टों में भी भगवान है? जब पाप में भी वही है तो मैं पाप क्यों न करूँ? क्या शुभ क्या अशुभ?

जब सारे कर्म ईश्वर कराते हैं, तो पाप और पुण्य जीव के क्यों होते हैं ?

सूर्य हम सब की ऊर्जा का आधार है|  हैरत की बात ये है कि सूर्य पापी, नराधम, कुरूप, अशुभ और बेकार को भी उतनी ही उर्जा देता है जितनी शुभ और कल्याकारी को|

सूर्य तो परमात्मा  की प्रकृति का ही एक हिस्सा है|  जैसा सूर्य कर रहा है वैसे ही परमात्मा करता होगा?

वो शुभ के साथ अशुभ का भी समर्थक है तभी तो अशुभ का अस्तित्व है|  कितने आश्चर्य की बात है कि इस दुनिया में पापियों का पेट भी परमात्मा ही भरता है|

हम सब पुण्य, सेवा, अहिंसा,  परमार्थ, सत्य  के नाम पर अपनी जिंदगी में कितने समझौते करते हैं|

हर एक बात का विचार करते हैं तब कोई कदम उठाते हैं|  वो लोग भी हैं जो इन सब की कोई परवाह नहीं करते, फिर भी मौज में हैं|

परमात्मा की ये व्यवस्था समझ में नहीं आई|

निश्चित ही ये सवाल आता है और आना चाहिए|

जब परमात्मा अच्छे में है तो फिर बुरे में भी है|  धर्मशास्त्र ही कहते हैं कि परमात्मा हर जगह है|

फिर हम बुरे का ख्याल क्यों करें? बुरे में आनंद है तो बुरा क्यों ना करें?

सच्चाई ये है कि

धर्म हमें जटिल नहीं बनाता|

ना ही धर्म ने हमारे ऊपर इतने सारे रीति-नीति और सिद्धांत लादे हैं कि पल पल पर हमें कदम उठाने से पहले सोचना पड़े|

अच्छा, बुरा  शुभ अशुभ  पाप पुण्य  की परिभाषाएं हमने खुद बनाई हैं|

वास्तव में धर्म हमें शुभ का पीछा करना  और अशुभ से दूर रहना भी नहीं सिखाता|

धर्म हमें पाप और पुण्य का भेद भी नहीं बताता|

इन प्रश्नों के जवाब के लिए हमें जन्म और मृत्यु को समझना पड़ेगा|

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विभिन्न मतों का निष्कर्ष ये कहता है कि मनुष्य सिर्फ शरीर नहीं है शरीर के अंदर प्राण हैं और प्राण के अंदर मन|

जो प्रकृति के अनुसार  चलता है वो धार्मिक होता है और जो प्रकृति के खिलाफ चलता है वो अधार्मिक|

शास्त्र कहते हैं कि शरीर मिटने पर हमारे सभी विचार और अनुभव  मन में मिल जाते हैं|  मन प्राण में मिल जाता है|  और प्राण आत्मा  से जुड़ जाता है|

मन, प्राण और आत्मा  आगे की यात्रा के लिए निकलते हैं|

मन में विचार और अनुभवों के कारण जो संस्कार होते हैं उसी के अनुसार आगे की यात्रा होती है|

जो व्यक्ति प्रकृति के  सबसे अधिक नजदीक होकर मरता है वो  ब्रह्मलोक प्राप्त करता है|  ब्रह्मलोक को ही मोक्ष लोक कहा जाता है|

जो प्रकृति के कम नजदीक होता है, वो मध्यलोक प्राप्त करता है| मध्यलोक में ऐसे ग्रह होते हैं जहां की लाइफ पृथ्वी से कई गुना अच्छी होती है| ऐसे लोकों को देव लोक या  स्वर्ग लोग भी कहते हैं|

जो लोग प्रकृति के खिलाफ काम करते हैं वो मरने के बाद पृथ्वी के ऊपर खाली स्थान में भटकते हैं और  कुछ समय बाद  जानवरों के रूप में पैदा होते हैं|

ब्रह्मलोक वाला वापस नहीं आता लेकिन मध्यलोक वाला अपने अच्छे कर्मों का फल भोग कर वापस पृथ्वी पर आ जाता है|

पृथ्वी ऐसा ग्रह कहा जाता है जहां पर कर्म के जरिए हम  अपने भविष्य का निर्धारण कर सकते हैं|

सवाल ये है कि क्या अच्छा है क्या बुरा? क्या शुभ है क्या अशुभ? इसका निर्धारण कैसे किया जाए?

पृथ्वी पर रहने वाले किसी व्यक्ति का परमात्मा बुरा नहीं करता|  उसका काम है सबको पोषण देना,  उसकी मृत्यु तक की व्यवस्था करना|  कुछ कर्मों के फल तत्काल मिल जाते हैं और कुछ फल कर्मों के फल थोड़े समय बाद मिलते हैं|  उसे भी तो फल एडजस्ट करने हैं ना|

सवाल ये है कि हम कब तक और कैसे सही गलत का निर्धारण करते रहेंगे|

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निर्धारण करने की कोई जरूरत नहीं है|  अपने ऊपर इतनी सारी परिभाषाएं सही गलत शुभ अशुभ की धारणाएं लादने की एक परसेंट भी इम्पोर्टेंट नहीं है|

शास्त्रों में ये बात भी कही गई है कि सब कुछ परब्रह्म परमात्मा ही है|

आत्मा के विभिन्न लोकों में जाने वाली बात कैसे सही हो सकती है?

जब सब कुछ वही है तो फिर क्या अच्छा क्या बुरा क्या निम्न लोक क्या उच्च लोक?

इसे इस तरह से समझिए आपका शरीर एक ही है|

लेकिन जो भोजन आप करते हैं क्या वो पूरा के पूरा गोबर बन जाता है?

नहीं|

मील में से जो अच्छे तत्व हैं उनका उनके गुणों के मुताबिक़ यूज़ होता है?

जो सबसे अच्छे स्तर के न्यूट्रिशंस है वो भोजन में से निकल कर हमारे ब्रेन तक जाते हैं|

कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन पूरे शरीर में वितरित हो जाता है लेकिन जो अपशिष्ट होता है वो शरीर के सबसे निचले  हिस्से में चला जाता है|

अच्छा इसी शरीर में एडजस्ट हो जाता है और बुरा इस शरीर से निकाल दिया जाता है|

आपको भी अपने शरीर से निकली गंदगी पसंद नही|

भेद के बिना सृजन नहीं हो सकता| इसलिए इतने तत्वों और प्रकारों की रचना हुयी| यहाँ मनुष्य भी हैं और मगरमच्छ भी|

सिस्टम में सब कुछ स्थिर भी नहीं हो सकता|

सिस्टम को चलाने के लिए अपग्रेडेशन और डाउन ग्रेडेशन की व्यवस्था जरूरी है|

इसी को माया कहते हैं|  माया के इस संसार में अच्छे को रिवार्ड मिलता है और बुरे को सजा|

अच्छे के कारण ही बुरे का अस्तित्व है| बुरे के कारण ही अच्छे  का अस्तित्व है|

जब तक हम शरीर के अंदर हैं तब तक हमारे लिए अच्छे और बुरे का अस्तित्व है|

क्योंकि हम सिस्टम का हिस्सा है और हिस्सा होने के कारण हमें शुभ अशुभ अच्छे और बुरे से गुजर ना पड़ेगा|

“हां” यदि हम जीवन मुक्त हो जाएं तो फिर क्या अच्छा और क्या बुरा|

एक दृष्टि से ये सब कुछ माया नजर आता है लेकिन दूसरी दृष्टि से इससे बड़ी कोई सच्चाई नहीं है|

आत्मा के स्तर पर शुभ अशुभ अच्छा बुरा पाप पुण्य कुछ नहीं होता लेकिन मन प्राण और शरीर  के स्तर पर इन सबका अस्तित्व है|

जब हम संसार के स्तर पर बात करते हैं तो ऊँचा और नीचा, शुभ और अशुभ होता ही है| संसार के स्तर पर शरीर, प्राण और मन उपर नीचे होते रहते हैं| इस लेवल पर हमे पाप-पुण्य से होकर गुजरना ही पड़ता है|

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जो आत्मा के स्तर पर पहुंच गया उसके लिए इन बातों का कोई महत्व नही| यदि आप संसार के स्तर हैं तो भी आपको अच्छे बुरे शुभ-अशुभ के बारे में बहुत सोचने की ज़रूरत नही क्यूंकि आपकी सोच सुनी सुने या पढ़ी पढिया बातों पर आधारित होगी|  इसलिए भौतिक जीवन में भी और अच्छे ढंग से जिया जा सकता है|

सबसे पहले तो आप दूसरों को  मापना बंद कर दें|

कौन अच्छा है बुरा है? पुण्यात्मा है पापी है इसकी चिंता हमें नहीं करनी|  क्योंकि हमारे पास ऐसा कोई यंत्र नहीं है कि हम किसी की अच्छाई बुराई का परीक्षण कर सकें|

दूसरा कदम:- हम अपने आप को भी पापी, नराधम, बुरा, भला, कहना बंद कर दें| अपने आपको  किसी भी तरह से कमजोर और हीन न समझें|

जब आप अपने आप को ईश्वर के नजदीक ले जाएंगे  तो पाप और पुण्य से परे हो जाएंगे| ना तो आपके लिए पुण्य का अस्तित्व होगा ना ही पाप का|

जो जैसा है आप उसे वैसा ही एक्सेप्ट करेंगे|  दूसरों में पाप तब दिखता है जब हमारे अंदर पाप होता है|  दूसरों में गलती तब दिखती है जब हमारे अंदर गलती होती है|

पाप, अशुभ और गलत करने के बाद भी परमात्मा यदि किसी व्यक्ति को जीवित रखे हुए हैं तो हम कौन होते हैं उसके बारे में फैसला करने वाले|

उसे परमात्मा के ऊपर छोड़ दें और खुद अपने अस्तित्व को दो स्तरों पर देखने की कोशिश करें|

शास्त्र कहते हैं कि आप शरीर प्राण और मन के स्तर पर संसार हैं और आत्मा के स्तर पर संसार के स्वामी|

आप मन के स्तर पर क्षुद्र हैं और आत्मा के स्तर पर विराट|

मन के भी सात स्तर हैं|  मन के निम्न स्तर पर सृष्टि कुछ और नजर आती है और मन के सबकॉन्शियस, अनकॉन्शियस, सुपरकॉन्शियस, कलेक्टिवकॉन्शियस और यूनिवर्सल कॉन्शियस लेवल पर कुछ और|

जीव भाव में जो हमें घ्रणित दिखाई देगा,  सामूहिक चेतना के स्तर पर वो दया का पात्र नजर आएगा और ब्रह्म चेतना के स्तर पर वो ईश्वर की ही अभिव्यक्त नजर आएगा|

ईश्वर बनाता ही नहीं है उसका काम बिगाड़ना भी है|

वो सृजन ही नहीं करता वो विसर्जन भी करता है| द्वैत उसका स्वभाव है|  इसी सृष्टि चलती है प्लस के साथ माइनस होना जरूरी है|

अच्छाई के साथ बुराई का भी अस्तित्व होगा| ये दोनों एक दूसरे के विपरीत नहीं है बल्कि एक दूसरे के सापेक्ष हैं|

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि|  चेतना के निचले स्तर पर हम इस जगत को नरक कहते हैं| मध्यम स्तर पर स्वर्ग कहते हैं| और उच्चतम स्तर पर इसे विराट का ही विस्तार कहते हैं|

जब तक हम जीवन मुक्त नहीं हो जाते तब तक हम ये कहकर कि मैं तो मुक्त हूं मनमाना व्यवहार नहीं कर सकते|

क्योंकि शरीर है तो शरीर के साथ उस देश और उस काल की सीमाएं और मर्यादा जुड़ी हुई हैं|

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यदि आप कर्ता-भाव में हैं तो आपको कर्म करने से पहले ये जरूर देखना पड़ेगा कि आपके किसी कर्म से उस समय में प्रचलित देश और काल के कानून का उलंघन न होता हो|

यदि आप खुदको मुक्त सोचकर ऐसा कुछ कर दें जो कानून का उलंघन हो तो आप सींखचों के पीछे होंगे|

फिर समझ लीजिये|

यदि आप कर्ता भाव में हैं यानि ये सोचते हैं कि करने वाला मैं हूँ तो आपको पाप पुण्य के बारे में सोचना पड़ेगा क्यूंकी अच्छे बुरे के ज़िम्मेदार आप ही हैं|

यदि आप इससे ऊपर जाते हैं तो अकर्ता भाव में आजाते हैं तब आपको पढ़ी पढाई या सुनी सुनी बातों के आधार पर पाप पुण्य की थ्योरी की चिंता नही करनी पड़ेगी| क्यूंकि आप अकर्ता हैं आपने सब कुछ परमात्मा पर छोड़ दिया है हर काम उसी को समर्पित करके अंतरात्मा की आवाज पर कर रहे हैं|

इस स्थिति में कल्पना में न खोएं| खुदको पाप पुण्य से से दूर करें| अपना आत्मिक स्वरूप जाने, और सारे  कर्म को भगवान पर छोड़ दें| इससे जो होगा अच्छा ही होगा|  इस बीच अपनी बुद्धि ना लगाएं| यहाँ चालबाजी न करें करें मन की और खुदको कहें “अकर्ता” ऐसा नही चलेगा| अकर्ता में सब कुछ उसी के आधार पर चलता है वो हुई इच्छा पैदा करता है वो ही लक्ष्य देता है|

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।   श्रीमद् भगवद्गीता
भावनाओं की दुर्बलताओं से ऊपर उठकर जो पुरुष समत्व बुद्धियुक्त हो जाता है वह पाप और पुण्य दोनों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

कई बार लोग अपनी बुद्धि से खुद को जीवनमुक्त,धर्म अधर्म से परे, नैतिकता और अनैतिकता से ऊपर मानकर मनमाना व्यवहार करने लगते हैं|  जब तक बुद्धि है तब तक परमात्मा की गाइडेंस नहीं है|  और ऐसा मनमाना व्यवहार आपको  प्रक्टिकल लाइफ में नीचे ले जा सकता है|

ये बात ध्यान रखिए कि शरीर प्राण और मन के स्तर पर आप बंधन में है सिर्फ आत्मा के स्तर पर आप मुक्त हैं|

शरीर के स्तर पर आपके ऊपर वो सभी कानून लागू होते हैं जो उस देश और उस समय में प्रचलित हैं|

जब आप ईश्वर से जुड़ते हैं तो आप अपनी आत्मा से देखते हैं|

जो भी गलत , पाप, बुरा, अशुभ आत्मा के सबसे बाहरी आवरण पर ही मौजूद  हैं |

जब तक हम आत्मा के बाहरी स्तर से जुड़े रहेंगे गलत करने की संभावना मौजूद रहेगी|

जैसे जैसे हम, यानि हमारा “शरीर, प्राण और मन” का मिलाजुला अस्तित्व  आत्मा के करीब होता जाएगा वो अशुभ से शुभ के स्तर तक पहुंचता  जाएगा|

जब व्यक्ति पूरी तरह से आत्मा भाव में आ जाएगा, अशुभ और शुभ दोनों ही गायब हो जाएंगे|

जब हमारी चेतना ब्रह्म चेतना  बन जाती है तब हम खुद में देव या दानव शुभ या अशुभ पापी या पुण्यात्मा, अच्छा या बुरा नहीं देखते|

तब पता चलता है कि वास्तव में  ना तो कहीं स्वर्ग है नहीं कहीं नरक|  नहीं कहीं जाना है ना ही कहीं से आना है| लेकिन ये आत्मा पर लागू है उसे आना जाना नही लेकिन “स्थूल सूक्ष्म और कारण” शरीर के स्तर पर सब कुछ है|

आत्मा के स्तर पर देवता में भी वो एक है असुर भी वही है| पशु भी वही है कीट पतंगा भी वही |

इस स्थिति में कुछ भी निकृष्ट नहीं होता और हम अपने आप को श्रेष्ठ सबल और ईश्वर तुल्य मानने लगते हैं|

तब पता चलता है हमारे अंदर ही स्वर्ग है हमारे अंदर ही नरक| हमारे अंदर ही देवता है, हमारे अंदर ही दानव|

क्या ऐसी स्थिति मुमकिन है?

बिल्कुल अज्ञान के अंधकार के नष्ट होते ही ऐसी स्थिति आ जाती है|

हम इस दुनिया में सबसे करीब है तो वो है परमात्मा|  उसके और हमारे बीच में सिर्फ अज्ञान का पर्दा है|

हम जब तक खुद को  “करने” वाला मानते हैं कर्ता | करता के स्तर पर स्वर्ग नर्क सब है|

कर्ता के स्तर पर संसार में हम गति में है| इसी गति के कारण आना जाना लगा रहता है|

जैसे ही हम “मैं” यानि “स्थूल, सूक्षम और कारण” की डोर को कर्तापन से डिस्कनेक्ट करते हैं|  गति रुक जाती है| फिर कर्म करने वाला मैं नही होता| फिर अच्छा- बुरा करने का अभिमान भी नही रहता| जो कर रहा है वो कर रहा है और वो जो भी करेगा सब ठीक ही होगा|

कर्म में करने वाले के अभिमान से मुक्ति मिलते ही व्यक्ति जीवन मुक्त कहलाने लगता है|

शरीर, मन, प्राण (स्थूल, सूक्षम और कारण) कर्म के पुराने आवेश से कुछ समय तक गति करेंगे  लेकिन एक समय बाद वो थम जाएंगे यानि अपनी मर्जी पूरी छोड़ देंगे, इनमें अहंकार नही होगाk खुदकी कामनाएं भी नहीं होगी |

इस तरह की मुक्ति और वैचारिक मुक्ति में बहुत अंतर है|

आत्मा भाव में स्थित व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सत्कर्म करेंगे| दूसरों के लिए अच्छे शब्द निकालेंगे उन्हें शुभकामनाएं देंगे| वो हमेशा अच्छी बातों पर ही विचार और चर्चा करेंगे| मानव जाति के कल्याण का भाव रखेंगे ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति से ही बुराइयां दूर भाग जाती हैं| ऐसा व्यक्ति वास्तव में शुभ कर्म भी नहीं करता क्योंकि वो शुभ और अशुभ से परे होता है| लेकिन जो कुछ भी होता है वो अच्छा ही होता है| इसी स्थिति में हम वास्तव में धार्मिक कहलाएंगे| हालांकि तब अधर्म का अस्तित्व भी नहीं होगा| क्योंकि तब धर्म और अधर्म दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हो जाएंगे|

आत्म भाव में सामने जो भी होगा वो ब्रह्म ही होगा|

पत्नी अपने पति में ब्रह्म का स्वरूप देखेगी पति-पत्नी में ब्रह्म का स्वरूप देखेगी| ऐसे पति पत्नी एक दूसरे से अधिक उच्च स्तर पर जुड़े होंगे| ऐसी माताएं अपने बच्चों से ज्यादा अच्छे ढंग से प्रेम रखेंगी|

ऐसे लोग भौतिक स्तर पर महा दुष्ट माने जाने वाले वालों से भी नफरत नहीं करेंगे|

हालांकि दुष्टों से भी प्रेम करने की क्षमता तब हासिल होगी जब हमारे अंदर छोटा से छोटा अहंकार भी नहीं रहेगा|

जब सारे संघर्ष खत्म हो जाएंगे तब ये दुनिया हर स्तर पर सुंदर नजर आएगी| ऐसे व्यक्ति के लिए शुभ अशुभ, अच्छा बुरा, सुंदर कुरूप, कुछ भी नहीं रह जाएगा|

आप भले ही इस अवस्था में न  पहुंच पाए लेकिन इसका अभ्यास करके देखिए|

सिर्फ कल्पना करके मान कर देखिए कि इस संसार के सभी लोग, पशु, पक्षी, कीट, पतंगे सभी इश्वर हैं|

बार-बार दोहराईये कि मैं खुद भी उस परमपिता परमात्मा की संतान हूँ| मेरी आत्मा स्वयं परमात्मा ही है|

बार-बार इस बात का विचार कीजिए कि इस दुनिया में कुछ भी अशुभ नहीं है न ही कुछ शुभ है|

काल्पनिक अभ्यास करने से आप कुछ क्षण के लिए ही सही लेकिन उस आत्म-भाव का अनुभव कर लेंगे|

कुछ सेकंड के लिए ही सही ये महसूस करेंगे कि मैं तो स्वयं ब्रम्ह हूं और ये दिखने वाली सारी दुनिया, सब ब्रम्ह ही है| तब “अहम् ब्रह्मास्मि” “अयम-आत्मा-ब्रह्म” और “तत्वमसी” जैसे सूत्र हमारे अंदर ही साकार होते दिखेंगे|

“atulyam”

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