क्या भूत प्रेत होते हैं(kya bhoot hote hain) ? भूत प्रेत बाधा के उपाय

क्या भूत प्रेत होते हैं(kya bhoot hote hain) ? भूत प्रेत बाधा के उपाय
संसार के समाज के सभी वर्गों व धार्मिक मान्यताओं में अदृश्य शक्तियों अर्थात् भूत-प्रेतादि जैसी शक्तियों के अस्तित्व को अपने अपने अंदाज से स्वीकार किया गया है । ऐसी मान्यता है कि आत्मा अजर-अमर है जो मनुष्यों के मरणोपरांत भी नष्ट नहीं होती बल्कि इन्हीं में से अतृप्त आत्माओं की कल्पना भूत-प्रेतादि के रूप में की जाती है । वेद, पुराण, भवद्गीता आदि जेसे प्राचीन आध्यात्मिक ग्रंथों में इस संदर्भ में अनेक विवरणों को उल्लेखित किया गया है । गरूड़ पुराण में वर्णित तथ्यों से ज्ञात होता है कि मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार यदि धाम्रिक रीति-रिवाजों के अंतर्गत न किये जाएं तो वे प्रेत-योनी को प्राप्त होते हैं ।

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प्रेतादि व अन्य नकारात्मक तत्वों के लक्षण: जातक के आत्म विश्वास का टूटना, भोग-सिलासी प्रवृत्ति, निद्रा काल में डरावने या अश्लील स्वप्नों को आना, पवित्र गंथों व वस्तुओं से घृणा, किसी से नेत्र न मिला पाना, कभी चिल्लाना, बड़बड़ाना या कभी एकदम चुप्पी साध लेना, क्रोध का बार बार आना, अचानक या अक्सर सुगंध तो कभी दुर्गंध का आना, अस्वस्थता, शरीर का काला या पीला पड़ जाना तथा गुप्तांगों का विकृत या रोग ग्रस्त हो जाना । ये सारे के सारे लक्षण भूत-प्रेातद व अन्य अदृश्य नकारात्मक तत्वों से प्रभावित होने वाले व्यक्ति के हैं । इसके अतिरिक्त कुछ अलौकिक घटनाएं भी हैं जिन से इन नकारात्मक शक्तियों के लक्षणों या प्रभावों का पता चल सकता है ।

जैसे – अनायास आकाश से पत्थरों का गिरना जिन के बारे में यह पता नहीं चलता कि कहां से आ रहे हैं, घर के सामानों का अपने-आप इधर-उधर फेंका जाना या लापता हो जाना । अनायास किसी अनजान वस्तु का घर में आ जाना या पड़ा होना । टंगे या रखे कपड़ों या अन्य किसी वस्तु आदि में आग लग जाने की घटना ।

प्रेतादि व नकारात्मक तत्वों की अनिष्टताएं तथा उसका निराकरण: अकाल-मृत्यु प्राप्त जातकों की अतृप्त आत्माएं अपनी अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति हेतु दृढ़ता से आसक्त हो जाती है तो उनके द्वारा घातक ऊर्जा का उत्सर्जन होता है । इसके साथ साथ कुछ अतृप्त आत्माएं साधकों द्वारा तांत्रिक किक्रयाओं के अंतर्गत निहित कर ली जाती है, जिन्हें बाद में साधक या तांत्रिक अपनी उपयोगिता अनुसार जादू टोने आदि कार्यो के हेतु प्रयुकत करता है । इन प्रेतादि शक्तियों के अतिरिक्त इससे मिलती खबीस, जिन्न, दैत्य, पिशाच आदि नामों की कुछ अन्य अदृश्य शक्तियां भी हैं जिनकी नकारात्मक परिधि में भी यदि कोई जातक आ जाए तो उसके जीवन में तारह तरह की अनिष्टताएं उत्पन्न होने लगती है । अतः इन विषयों से संबंधित घातक व हानिकारक समस्याओं से बचाव व निराकरण हेतु कुछ सरल सहज व उपयोगी उपाय इस प्रकार हैं:-

– इन शक्तियों से बचाव के लिए शरीर को पाक पवित्र रखें । इसके अतिरिक्त साधक आकर्षक व सुगंधित वस्तुओं के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी का प्रयोग करें ।

-देवदारू, हींग, सरसों, जौ, नीम की पत्ती, कुटकी, कटेली, चना व मोर के पंख को गाय के घी तथा लोहबान में मिला कर मिट्टी के पात्र में रख लें, फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुंआ प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं । इस प्रक्रिया को नित्य कुछ दिनों तक दोहराते रहें, अवश्य लाभ मिलेगा ।

-मंगल व शनिवार के दिन जावित्री व श्वेत अपराजिता के पत्ते को आपस में पीसकर उसके रस को प्रेतादि या ऊपरी बाधा से पीड़ित जातक को सुघांएं, इन नकारात्मक शक्तियों से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी ।

-सेंधा नमक, चंदन, कूट, घृत, चर्बी व सरसों के तेल के साथ मिश्रित करके किसी मिट्टी के पात्र में रख लें तथा फिर उसे अग्नि से जलाकर उसका धुंआ प्रेतादि बाधा से पीड़ित जातक को दिखाएं । इस प्रकिक्रया को शनिवार अथवा मंगलवार से प्रारंभ करके नित्य 21 दिनों तक दोहराएं । ऊपरी बाधा से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी ।

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-बबूल, देवदारू, बेल की जड़ व प्रियंगु को धूप अथवा लोहबार के साथ मिश्रित करके मिट्टी के पात्र में रख लें तथा फिर उर्से अिन से जलाकर उसके धुंए को पीड़ित जातक के ऊपर से उतारें । मंगल या शनिवार से इस कार्य को प्रारंभ करके इसे 21 दिनों ते दोहराते रहें तथा जब ये प्रयोग समाप्त हो जाए तो 22वें दिन जली हुई सारी सामग्री को किसी चैराहे पर मिट्टी के पात्र सहित प्रातः सूर्य उदय से पूर्व फेंक आएं । अवश्य लाभ होगा ।

-मंगल या शनिवार के दिन लौंग, रक्त-चंदन, धूप, लोहबान, गौरोचन, केसर, बंसलोचन, समुद्र-सोख, अरवा चावल, कस्तूरी, नागकेसर, जई, भालू के बाल व सुई को भोजपत्र के साथ अपने शरीर व लग्न के अनुकूल धातु के ताबीज में भरकर गले में धारण करें । शरीर पर प्रेतादि जैसे नकारात्मक तत्वों का कोई दुष्ट प्रभाव नहीं पड़ सकता । कहा जाता है कि किसी भी झूठ को सत्य बनाने के लिए यदि उसको अधिकांश लोगों द्वारा दोहराया जाने लगे तो झूठ भी अत्ततः सत्य प्रतीत होने लगता है । परन्तु हवा पानी आग ताप आदि के अस्तित्व को झुठलाने के लिए करोड़ों अरबों लोग भी एक साथ झूठा सिद्ध करने का प्रयास करें तो भी वह सत्य को झुठला नहीं पाएंगे । आत्मा के विभिन्न स्वरूपों के बारे में भी यही स्थिति है ।

आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं:- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा । जो भौतिक शरीर में वास करती है वह जीवात्मा कहलाती है । जब वासनामय शरीर में जीवात्मा का निवास होता है तब वह प्रेतात्मा कहलाती है । यह आत्मा जब अत्यन्त सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है उस अवस्था को सूक्ष्मात्मा कहते हैं । वासना के अच्छे और बुरे भाव के कारण अथवा भाव के आधार पर मृतात्माओं को भी अच्छे और बुरे की संज्ञाएं दी गयी हैं । जहां अच्छी मृतात्माओं का वास होता है उसे पितृलोक तथा बुरी आत्मा वाले को प्रेत लोक, वासना लोक आदि कहते हैं । अच्छे बुरे स्वभावनुसार ही मृतात्मा अपनी अतृप्त वासनाओं की पूर्ति के निमित्त अपने अनुरूप कुकर्मी वासनामय जीवन जीने वाले भौतिक शरीर की तलाश करती है, ताकि उसके माध्यम से गुण कर्म स्वभाव के अनुसार अपनी अशान्त असन्तुष्ट विक्षुब्ध तथा वासनामयी दुरभिसंधि रच सके तथा अपने अनुकूल तत्वों को ग्रहण कर सके । इसलिए जिस मानसिकता वृत्ति प्रवृत्ति सत्कर्मो आदि का भौतिक शरीर होता है उसी के अनुरूप आत्मा उसमें प्रवष्टि होती है और अपने अपने तत्व ग्रहण करती है । अधिकांशतः भौतिक शरीर को इसका पता नहीं चल पाता परंतु आज असंख्य उदाहरण मिलते हैं कि पितृलोक की आत्माओं ने भौतिक शरीर का मार्गदर्शन किया, उनका उत्थान किया अथवा दुष्ट प्रवृत्तिनुसार उन्हें परेशान किया ।

यह थी प्रेतात्मा की आध्यात्मिक दृष्टि से विवेचना । तत्वदर्शन भूत का शाब्दिक अर्थ लगाता है – जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत हो।

योग ऋषि परंपरानुसार मानव शरीर पांच तत्वों से निर्मित है तथा इनका प्रभाव ही मानव शरीर पर पड़ता है । शरीर जब मृत्यु को प्राप्त होता है, तो स्थूल शरीर यहां ही पड़ा रह जाता है और अपने पूर्व संचित कर्म अथवा पाप या श्रापवश उसे अधोगति या भूतप्रेत योनि प्राप्त होती है । मृत्यु के बाद मनुष्य की अगली यात्रा वायु तत्व प्रधान अर्थात् सूक्ष्म शरीर से प्रारंभ होती है । इसमें अग्नि जल पृथ्वी तथ्व का ठोसपन नहीं होता, क्योंकि यदि यह होता तो इसमें रूप रस गंध अवश्य रहती । नका संतुलन बना रहे इसलिए इन तत्वों की प्रधनता वाले तत्वों की आवश्यकता होती है । इससे स्पष्ट होता है कि प्रेत वायवीय देहधारी होते हैं । अतः पानी भोजन अथवा
मानवोचित क्रियाएं इनमें नहीं होतीं।

bhoot hote hainवायु प्रधान होने से इनमें आकार या कर्मेन्द्रियों की प्रखरता नहीं रहती । वायु व आकाश की प्रमुखता होने पर उनका रूप भी उनके अनुरूप बन जाता है ।प्रेत योनि बोलने में असमर्थ है । वह केवल संवेदनशील है ।ठोसपन न होने के कारण ही प्रेत को यदि गोली तलवार लाठी आदि मारी जाए तो उस पर उनका कोई प्रभाव नहीं होता । प्रेत में सुख दुख अनुभव करने की क्षमता अवश्य होती है क्योंकि उनके बाहयकारण में वायु तथा आकाश और अंतःकरण में मन बुद्धि और चित्त संज्ञाशून्य होती है इसलिए वह केवल सुख दुख का ही अनुभव कर सकते हैं।

वैदिक साहित्य पुराण आगम श्री मद्भागवत गीता महाभारत मानस साहित्य आदि में असंख्य ऐसे प्रसंग आते हैं  कि इस योनि के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता । गीता में धुंधुकारी प्रेत की कथा सर्वविदित है । ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर प्रेत-पिशाचों का उल्लेख मिलता है । एक स्थान पर ऋषि कहते हैं – हे श्मशान घाट के पिशाचादि, यहां से हटो और दूर हो जाओ । भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को श्राद्ध विधि समझाने के प्रकरण में देव पूजन से पूर्व गन्धर्व, दानव, राक्षस, प्रेत, पिशाच, किन्नर आदि के पूजन का वर्णन आता है ।

चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के लक्षण और निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं । ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों – प्रश्नमार्ग, बृहत्पराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ऐसे ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृदोष आदि बाधाओं का विश्लेषण करते हैं ।

ऐसा नहीं कि हिन्दू दर्शन, अध्यात्मयोग में ही पे्रतों के अस्तित्व को स्वीकारा गया है । हिन्दू धर्म के अतिरिक्त विश्व में बौद्ध ताओ कन्फ्यूसियस शिन्टो जरथ्रुस्त(पारसी) इस्लाम यहूदी तथा ईसाई धर्मों के अनुयाईयों ने भी एक मत से इस योनि को स्वीकारा है ।

आज संपूर्ण विश्व में इस अलौकिक सत्य को जानने के लिए अनेक शोध कार्य किए गए हैं । वैज्ञानिक जगत में विश्वव्यापी क्रान्ति इस दिशा में तब आई जब क्रिलियान फोटोग्राफी द्वारा आभामंडल का फोटो खींचा गया । कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के कुछ खोजियों ने एक आश्चर्यजनक प्रयोग इस विषय में किया कि प्राणी की मृत्यु के समय उसके शरीर को त्यागने पर वैद्वुतिक परमाणुओं का अर्थात् उस आत्मा का भी फोटो उतारा जा सकता है ।

इसके लिए उन्होंने विलसा क्लाउड चैम्बर का प्रयोग किया । यह विशेष चैम्बर या कक्ष एक खोखले सिलिण्डर के आकार का होता है जिसके भीतर से हवा को सक्शन पम्प द्वारा बाहर निकालकर अन्दर पूर्णरूप से शून्य पैदा किया जाता है । उस सिलिण्डर के अन्दर एक सिर पर एक विशेष प्रकार का गीला कागज चिपका दिया जाता है जिससे इतनी नमी निकलती रहे कि भीतरी भाग में यदि एक भी इलैक्ट्रान या अणु गुजरे तो विशेष फोटो तकनीक द्वारा उसका चित्र उतारा जा सके ।

इस प्रकार के क्लाउड चैंम्बर की बगल मे एक छोटी सी कोठरी बनाई गई और उसके भीतर कुछ मेंढक और चूजे रखे गए । किसी विशेष वैज्ञानिक विधि से उनका प्राणान्त किया गया और उसक क्षण कैमरे से कक्ष के भीतर होने वाले परिवर्तन को चित्रित कर लिया गया । 50 में से 30 प्रयोगों में पाया गया कि जो फोटो खींचे गए उनकें मृत प्राणी के आकार से मिलते जुलते क्रम में इलैक्ट्रानों से छायात्मक आकृतियां बन गयीं । कालान्तर में असंख्य बार अनुभव में आया कि केवल मनुष्यों और पशुओं की ही छायात्माएं नहीं दीखतीं वरन् बड़े बड़े विध्वंसक जहाजों और रेलों आदि की भी भूतात्माएं दिखाई देती हैं।

समुदों में जो बड़े बड़े जहाज दुर्घटना ग्रस्त होते हैं उनमें से कुछ अपने पूर्व आकार में समुद्र में चक्कर लगाते देखे गए । कई बार नाविक उन्हें छाया न समझकर वास्तविक जहाज समझ बैठते हैं । फलस्वरूप उस छाया से टकराने से बचने की चेष्टा में स्वयं भी दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं । इस सम्बन्ध में अनेक प्रामाणिक और विश्वसनीय तथ्य खोजियों को मिले हैं । इधर दुर्घटनाओं में ध्वस्त रेलों की छायात्माओं का भी पता चला है । इन्फ्रारेड फोटोग्राफी से और भी ऐसे तथ्य सामने आए हैं कि जहां कुछ मूर्त नहीं था वह चित्रित हो गया । अन्ततः विश्वव्यापी स्तर पर विचारकों ने माना कि प्रत्येक पदार्थ की एक सूक्ष्म अनुकृति भी होती है जो सदैव उसके साथ अथवा उसके अस्तित्व के बाद भी बनी रहती है । इसीलिए स्थूल संरचना के न रहने पर भी उसकी सत्ता(भूत) यथावत बना रहता है ।

प्रेतात्माओं के उपद्रव के किस्से प्रचलित हैं । अनेक उदाहरण अथवा प्रमण हैं कि व्यक्ति, भूमि, भव, गांव, शहर आदि इनके शिकार होते रहते हैं ।

जनकल्याण के लिए समर्पित संत श्री जगदाचार्य स्वामी अखिलेश जी ने आशीष स्वरूप बताया कि परिवार का कोई सदस्य रात्रि को चैका उठ जाने के बाद चांदी की कटोरी में देवस्थान या किसी अन्य पवित्र निश्चित स्थल पर कपूर तथा लौंग जलाएगा तो वह अनेक आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त रहेगा ।

प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में चिरचिटे अथवा धतरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर यदि इस प्रकार धरती में दबा दिया जाए कि उसका जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए तो उस परिवार में सुख-शान्ति बनी रहती है । वहां प्रेतात्माएं कभी भी डेरा नहीं जमातीं ।
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