क्या जगत सचमुच एक सपना है?

क्या जगत सचमुच एक सपना है?

-दिनेश मालवीय 

आज के युवा इस बात की बहुत जिज्ञासा करते हैं कि हमारे शास्त्रों में और ज्ञानवान लोगों ने जगत को सपना क्यों कहा. वे इस विषय में जहाँ संभव हो प्रश्न पूछते हैं और विद्वान उनकी इस जिज्ञासा का अलग-अलग तरह से समाधान भी करने का प्रयास करते हैं. आइये, हम भी यहाँ इस विषय पर कुछ तथ्यपरक विचार करते हैं.

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में भगवान् शंकर अपनी अर्धांगनी देवी पार्वती से कहते हैं-

उमा कहऊँ मैं अनुभव अपना

सत हरि भजन जगत सब अपना।

अर्थ - हे उमा!मैं अपना अनुभव कहता हूं कि संसार में सिर्फ ईश्वर का भजन सत्य है, और सारा जगत सपना है.

भगवान शिव ही नहीं, हर उस व्यक्ति ने जिसने जगत और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया है, उसका यही अनुभव है. वह यही महसूस करता है, कहता है और इसे जीता है.

दुनियाबी और तर्कवादी लोग कहते हैं कि इसमें भगवान शिव जगत को सपना कह रहे हैं.दरअसल किसी भी बात का शाब्दिक अर्थ लगाने से  ऐसे ही भ्रम होते हैं. गूढ़ बातों को रूपकों के माध्यम से ही समझाया जाता है. भगवान शिव का यह आशय नहीं है कि जगत को सपना मान कर उसे झुठला दिया जाए. उनका आशय सिर्फ इतना है कि दुनिया में जो कुछ भी है, भगवान के प्रति प्रेम, भक्ति और उनका नाम स्मरण उन सबसे ऊँचा है. उससे बड़ा कुछ भी नहीं है. जो लोग इस सत्य को जान कर जाग जाते हैं, वे इस जीवन में प्रकाश ही प्रकाश देखते हैं; जो नहीं जान पाते उन्हें हर जगह अंधकार ही दिखाई देता है.

गीता में भी भगवान श्री कृष्ण यही कहते हैं कि "या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।''

अर्थात - सम्पूर्ण प्राणियों के लिए यह जग रात्रि के समान है. इसमें नित्य ज्ञान स्वरूप परमानंद की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है.  जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है.

भगवान शिव जगत की सत्ता को नकार नहीं रहे हैं, वे ईश्वर प्रेम की तुलना में जगत की तुच्छता बता रहे हैं. लोक और परलोक में जितने भी भोग हैं, सब नाशवान, क्षणिक, अनित्य और दु:ख रूप हैं, फिर भी अंधकारमय अज्ञान के कारण विषयों में आसक्त मनुष्य उनको नित्य और सुखरूप मानते हैं.उनकी दृष्टि में विषय भोग से बढ़कर और कोई सुख नहीं हैं. इस प्रकार भोगों में आसक्त होकर उन्हें प्राप्त करने की चेष्टा में लगे रहना और उनकी प्राप्ति में आनंद का अनुभव करना, यही उन संपूर्ण प्राणियों का उनमें जागना है, किन्तु परमात्म तत्व को जानने वाले ज्ञानी के अनुभव में जैसे स्वप्न में जगे हुये मनुष्य का स्वप्न के जगत से कुछ भी संबंध नहीं रहता, वैसे ही एक सच्चिदानंद परमात्मा से भिन्न किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं रहती. वह ज्ञानी इस दृश्य जगत के स्थान में इसके अधिष्ठान रूप परमात्म तत्व को ही देखता है. अतएव उनके लिए यह समस्त सांसरिक भोग और विषयानंद रात्रि के समान है.

जीवन के सभी कर्तव्य कर्मों का निर्वाह करते हुए ईश्वर को सर्वोपरि रखा जाए. उनके नाते ही हर एक नाते को माना जाए और अपना हर कार्य उन्हीं के निमित्त किया जाए, यही शिव का आशय है. यही संतों की वाणी है और यही शास्त्र का मत भी है।

 

 

 


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