कर्म को ही योग बनाने की सीख दी श्रीकृष्ण ने -दिनेश मालवीय

कर्म को ही योग बनाने की सीख दी श्रीकृष्ण ने

-दिनेश मालवीय

जीवन को सुखी और आनंदमय बनाने के लिए सभी धर्मों में अपनी-अपनी तरह से मार्गदर्शन दिया है और उपाय बताये हैं. भगवान श्रीकृष्ण ने भगवतगीता में जीवन को आनंदपूर्वक जीते हुए जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष के लिए जो मार्गदर्शन दिया है, उसमें कर्म की अवहेलना न करते हुए, उसे इस प्रकार करने की सीख दी है, कि कर्म ही योग बन जाए.

अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं कि “कर्म ही पूजा है”. यह सच भी है, लेकिन अधिकतर लोग इसका अर्थ सिर्फ अपना काम-धंधा करना लगाते हैं. इसी सोच के चलते गीता के एक श्लोक के अंश “योग: कर्मसु कौशलम” का भी कुछ और ही अर्थ लगा लिया गया है. इसका अर्थ यह लगा लिया गया है कि अपने कर्म को कुशलता से करना ही योग है. इस मामले में बड़े-बड़े विद्वानों को भ्रमित देखा गया है. इस वाक्य का आध्यात्मिक अर्थ बहुत व्यापक और गहरा है. इसका अर्थ workholism नहीं है.

गीता के दूसरे अध्याय का यह पूरा श्लोक इस प्रकार है-

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते 

तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम.

अर्थात- समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप को इसी लोक में त्याग देता ही, यानी उनसे मुक्त हो जाता है. इससे तू समत्व रूप योग में लग जा; यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है.

 देखिये, श्रीकृष्ण ने जो कहा और आमतौर पर इसका जो अर्थ लगाया जाता है, उसमें कितना अंतर है.श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि समबुद्धि से युक्त हुआ योगी जीवन्मुक्त हो जाता है. वह कर्म को कर्ताभाव से रहित होकर करता है, जिसके कारण उसके चित्त में उसके संस्कार निर्मित नहीं होते. कर्म स्वाभाविक ही मनुष्य को बंधन में डालने वाले होते हैं. कर्ताभाव से किया गया कर्म संस्कार का बीज आरोपित करता है और यही मनुष्य के जीवन को दुखी करने का सबसे बड़ा कारण है.  बिना कर्म किये मनुष्य नहीं रह सकता. ऐसी परिस्थिति में कर्मों के बंधन से छूटने की सबसे अच्छी युक्ति समत्व योग ही है. इस समबुद्धि से युक्त होकर कर्म करने वाला मनुष्य इसके प्रभाव से उनके बंधन में नहीं आता. इसलिए कर्मों में योग ही कुशलता है. ऐसी समत्व बुद्धि से युक्त योगी स्वयं को कर्म करने वाला नहीं समझता और सफलता-असफलता; दुःख-सुख;जय-पराजय में सम रहता है, अर्थात विचलित नहीं होता.

कतिपय लोगों का मानना है कि “योग: कर्मसु कौशलम” के लोक प्रचलित अर्थ से कोई हानि नहीं है और वर्तमान सन्दर्भ में लोगों को अपना काम कुशलता से करने को प्रेरित करने के लिए जो लोग कर्म में कुशलता को ही योग कह रहे हैं, उसमें कोई हर्ज नहीं है. निश्चय ही, इसमें कोई हानि नहीं है, लेकिन इस महान और उदात्त वाक्य का इतने उथले स्तर पर प्रयोग भी उचित नहीं है.

जिस कर्मयोग की बात श्रीकृष्ण ने कही है, वह “काम-धंधा” करने में कुशलता नहीं है. इसका अर्थ है काम को कर्ताभाव से रहित होकर इस प्रकार किया जाए कि वह कर्म ही योग बन जाए. इसका अर्थ कर्मों में योग की कुशलता लाना है.

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