कामयाबी के लिए अपनी आलोचना पचाना सीखिये -दिनेश मालवीय

कामयाबी के लिए अपनी आलोचना पचाना सीखिये

-दिनेश मालवीय

dineshज़िन्दगी में हर कोई कामयाब होना चाहता है. हर कोई ऐसे मंत्र की तलाश में रहता है, जो उसे कामयाब होने में मददगार हो. इसके लिए सदियों से चिंतकों और विचारकों ने बहुत सोच-विचार कर कुछ बहुत महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया है. उन्होंने बहुत से मंत्र दिए हैं. इनमें एक बहुत महत्वपूर्ण मंत्र यह है कि अपनी आलोचना को पचाना और उससे अपनी कमियों को दूर करना आना चाहिए.

यह सही है कि ज्यादातर लोगों की हमेशा दूसरों की आलोचना करने की आदत होती है. वे हर किसी की सकारण या अकारण आलोचना करने को ही अपने जीवन का परम कर्तव्य मानते हैं. उनकी ऐसी प्रवृत्ति के कारण अनेक ऐसे लोगों को नुकसान हो जाता है, जो बहुत मेहनत और लगन से किसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं. ऐसे लोग आमतौर पर बहुत भावुक और संवेदनशील होते हैं. इसलिए वे इन आलोचनाओं से बहुत जल्दी विचलित हो जाते हैं.

विचारवान लोगों का कहना है कि आलोचना से विचलित होने की जगह, उससे कुछ सीखना चाहिए. हर आलोचना से कोई सबक सीखा जा सकता है. हर आलोचना दुर्भावना से ही की जा रही हो, यह ज़रूरी नहीं है. कई आलोचनाएँ सकारात्मक भी होती हैं. ऐसी आलोचना के पीछे तथ्य भी होता था. इस तथ्य की समीक्षा करके हम अपनी कमियों को दूर कर सकते हैं. बहरहाल, सिर्फ दुर्भावना से की जाने वाली आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए.

इस विषय में स्वामी विवेकानंद ने भी कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हैं. उनमें आलोचना सुनकर अपनी गलतियों को सुधारने का अपना अलग तरीका था. वह अपनी गलतियों को सुधारने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे. एक जगह स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि- “ मुझे अपनी गलतियों को सुधारना ही होगा. यही एकमात्र उपाय है. खुद के द्वारा अपने चारों ओर बिछाए हुए जाल को मझे खुद ही काटना होगा. इसके लिए पर्याप्त शक्ति मेरे अपने भीतर से ही आएगी. इस एक सत्य से मैं अवगत हूँ कि चाहे वे सुप्रेणित हों या बुरी. कोई भी आकांक्षा मेरे जीवन में व्यर्थ नहीं गयी, क्योंकि उन अतीत की सभी महत्वाकांक्षाओं का समष्टि रूप ही आज मैं हूँ, चाहे वे भली हों अथवा बुरी. मैंने अपने जीवन में बहुत-सी गलतियां की हैं; पर स्मरण रहे, मैं यह निश्चय से कह सकता हूँ कि आज मैं जो भी बना हूँ, वह उन गलतियों का परिणाम है. मैं पूरी तरह निश्चिन्त हूँ कि मैंने उन गलतियों को किया था”.

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स्वामी जी आलोचकों द्वारा बताई गई अपनी गलतियों को स्वीकार कर लेते थे और उन्हें लगातार ठीक करने की कोशिश करते थे.  वह कभी झूठी प्रशंसा के एहसास में कभी नहीं जीते थे.

उनके जीवन का एक बहुत प्रेरक प्रसंग है. स्वामीजी जब पाश्चात्य देशों की यात्रा से भारत लौटे,तो लोगों ने उनका जबरदस्त अभिनन्दन किया. उस समय उनसे जलन करने वाले कुछ लोग भी वहां थे,जिन्होंने इस भव्य स्वागत का विरोध किया. जब वह चेन्नई पहुंचे, तो एक पंडित जी ने उनसे कहा कि केवल ब्राह्मण को ही सन्यासी बनने का अधिकार है. आप ब्राह्मण नहीं हैं, लिहाजा आपको सन्यास का अधिकार नहीं है.

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स्वामी जी पंडित जी के इस कथन से बिलकुल विचलित नहीं हुए. उनके बीच कुछ वाद-विवाद भी हुआ. कुछ दिनों बाद, जब स्वामीजी अल्मोड़ा गए, तो अश्विनी कुमार नाम के एक सज्जन उनसे मिलने आये. वह स्वामी जी के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस से भी मिल चुके थे.

अश्विनी कुमार ने चेन्नई की घटना का उल्लेख करते हुए अश्विनी कुमार ने कहा कि मैंने सूना है कि उसने आपको “अस्पृश्य” कहा था, जिसके उत्तर में आपने उसे “म्लेच्छ” कहा था. क्या यह सच है? स्वामीजी ने इसे ठीक खा तो, अश्विनी कुमार ने उनसे कहा की  श्री रामकृष्ण के शिष्य को ऐसा कहना शोभा नहीं देता.

इस पर स्वामी जी ने कहा कि उनका क्रोध सचमुच अनुचित ही था. वह उन पंडितजी को नीचा दिखाना नहीं चाहते थे. स्वामी जी ने स्वीकार किया कि वह क्रोध के वशीभूत होकर ऐसा कह गए थे. उन्हें ऐसा नहीं करना था. उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ.

स्वामी जी की यह बात सुनकर अश्विनी कुमार ने उन्हें गले लगा लिया. उसने कहा कि अब मैं समझ गया हूँ कि आपने किस तरह जगत को जीता है.  मैं यह भी समझ गया हूँ कि श्री रामकृष्ण आपसे इतना प्रेम क्यों करते हैं.

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Priyam Mishra



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