माँ वैष्णो देवी दो पल के लिए इस स्थान पर रहीं, भक्ति करने से यात्रा की सफलता मिलती है । 

माँ वैष्णो देवी दो पल के लिए इस स्थान पर रहीं, भक्ति करने से यात्रा की सफलता मिलती है ।

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माता वैष्णो देवी को श्रद्धा तथा आस्था का प्रतीक माना जाता है. कहा जाता है जो भी भक्त सच्चे मन से माता के दरबार में जाता है तथा पूजा करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. माता वैष्णो देवी की यात्रा के दौरान भक्त उन सभी स्थानों को नमन करते हुए दरबार में पहुंचते हैं जहां कभी कन्या स्वरूपी माता ने विश्राम किया था. कोल कंडोली, देवा माई, भूमिका मंदिर, दर्शनी ड्योढ़ी, बाण गंगा, चरण पादुका, अर्द्धकुंवारी हाथी मत्था, भैरों मंदिर जैसे पड़ाव वैष्णो देवी की यात्रा का मुख्य हिस्सा हैं.

यहां मौजूद हैं माता के चरणों के निशान

माता वैष्णो देवी की यात्रा का पहला हिस्सा है चरण पादुका. यह वो स्थान है जहां पर कन्या रूपी माता वैष्णो दो पल के लिए रूकी थीं तथा भैरों कितनी दूर है इसका अंदाजा लगाया था. इस स्थान पर आज भी माता के चरणों के निशान मौजूद हैं. ऐसा कहा जाता है कि जो भी भक्त माता वैष्णो के चरणों को छूकर यात्रा को प्रारंभ करता है उसकी यात्रा सफल होती है.

कैसे बना वैष्णो देवी का मंदिर?

पौराणिक कथा के अनुसार श्रीधर माता वैष्णो के परम भक्त थे, वह चाहते थे माता उन्हें दर्शन दें तथा दुनिया के समक्ष अपना अस्तित्व दिखाएं. श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर माता वैष्णो ने उन्हें दर्शन देने के बात कही तथा कहा कि वो समस्त लोगों के लिए भंडारे का आयोजन करें. आर्थिक तौर पर कमजोर होने के बावजूद श्रीधर के माता के आदेश अनुसार भंडारे का आयोजन किया. इस भंडारे में भैरवनाथ तथा उनके शिष्य भी पधारे. मां ने कृपा से पूरे गांव के लिए खीर-पूड़ी का इंतजाम किया. लेकिन भैरव तथा उसके शिष्यों ने मांस की मांग की. श्रीधर के बहुत समझाने के बावजूद वह नहीं माने, इसी बीच मां दुर्गा ने कन्या रूप में वहां दर्शन दिए.

माता के दर्शन प्राप्त के पश्चात भी भैरव नहीं माना तथा कन्या पर क्रोधित हो गया. अपना क्रोध जाहिर करते हुए भैरवनाथ कन्या को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा. लेकिन वह कन्या वहां से त्रिकूट पर्वत की ओर भागीं. भागते-भागते माता एक स्थान पर जा पहुंचीं तथा भैरवनाथ कितनी दूर है इसका अंदाजा लगाते हुए आगे बढ़ीं. आज इसी स्थान को चरण पादुका के नाम से जाना जाता है. भागते-भागते मां एक गुफा में जा पहुंची. इस बीच उन्होंने वीर लांगुर को बुलाया तथा उन्हें भैरव को 9 महीने व्यस्त रखने को कहा. उन्होंने कहा कि वो 9 महीने इस गुफा के अंदर तपस्या करेंगी.

अर्धकुंवारी के नाम से जानी जाती है गुफा

जिस गुफा में माता ने तपस्या की आज उसे अर्धकुंवारी के नाम से जाना जाता है. इसी पवित्र गुफा को सभी भक्त पार करते हैं. इस गुफा में माता तीन पिंडियो के रूप में स्थापित हैं तथा भक्तों की मुराद को पूरी करती हैं.

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