प्रश्नोत्तर से समझ आता है विषय का मर्म, सार्थक प्रश्न पूछना आसान नहीं होता.. दिनेश मलवीय

प्रश्नोत्तर से समझ आता है विषय का मर्म, सार्थक प्रश्न पूछना आसान नहीं होता.. दिनेश मलवीय

 

dineshमनुष्य का मन सदा से जिज्ञासाओं से भरा है. अस्तित्व में आते ही उसने जिन चीजों को देखा, उन्हें लेकर उसके मन में अनेक जिज्ञासाएं उत्पन्न हुयीं. पहले उसने उनके सम्बन्ध में उठी जिज्ञासाओं के बारे खुद से प्रश्न किये. संतोषजनक उत्तर नहीं मिलने पर उसने दूसरों से पूछना शुरू किया. हर बच्चा अनेक तरह के प्रश्न करता हुआ बड़ा होता है. कई बार तो बच्चे ऐसे प्रश्न पूछ लेते हैं, जिनका जवाब बहुत ज्ञानी और शिक्षित लोग भी नहीं दे पाते. वे  कुछ न कुछ बात बनाकर किसी तरह उसे बहला-फुसलाकर प्रश्न से भटका देते हैं. भारत की ज्ञान-परम्परा, जीवन-दर्शन  और संस्कृति में एक सबसे बड़ी बात यह रही कि, इसमें प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति को दबाया नहीं गया. इसके विपरीत उसे प्रोत्साहित किया गया. इस सम्बन्ध में हमारे देश में दो वाक्य बहुत महत्वपूर्ण हैं. पहला है – “बाबा वाक्यं प्रमाणम” से बचो. बड़ों ने जैसे कह दिया, उसे एकदम से सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करो कि, इसे बड़ों ने कहा है या यह किसी किताब में लिखा है. उसे एकदम नकारने की भी बात नहीं कही गयी है. इतना ही कहा गया है कि, पहले बात का हर पहलू से परीक्षण करो और यदि मन और विवेक को सही लगे, तब ही उसे स्वीकार करो.

दूसरा बहुत महत्वपूर्ण सूत्र है – “पुराण मिथ्येव न साधु सर्वम, 

                                     न चापि काव्यं नव मित्यावद्यम , , 

अर्थात पुराना हमेशा अच्छा ही हो,यह ज़रूरी नहीं. इसी प्रकार नयी सोच या नयी बात बुरी ही हो, यह भी ज़रूरी नहीं. इस प्रकार नवीनता को प्रोत्साहित किया गया है. जो पुराना चला आ रहा है, यदि वर्तमान संदर्भ में उसकी उपयोगिता नहीं हो तो, उसे सिर्फ इसलिए नहीं ढोते रहना चाहिए कि, वह पुराना है. इसी तरह नवीन को  बिना परीक्षण किये ख़ारिज कर देना अविवेक है. धर्म के मामले में तो इस बात पर बहुत ज़ोर दिया गया है. कई बार ऐसे रीति-रिवाज़, प्रथाएं, परम्पराएं और अन्य बातें धर्म के नाम पर चल पड़ते हैं, जो उस समय भले ही  प्रासंगिक हों, लेकिन वर्तमान में उनकी उपयोगिता नहीं रह गयी है.भारत की ज्ञान-परम्परा में ऎसी चीजों को तत्काल बदलने की पैरवी की गयी है. प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता दूसरे धर्मों में देखने को नहीं मिलती. यह
सिर्फ सनातन धर्म में है. भारत की ज्ञान-परम्परा का तो मुख्य आधार ही प्रश्नोत्तर हैं. सारे उपनिषद शिष्यों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के गुरु द्वारा दिए गये उत्तरों से ही जन्में हैं. शिष्य गुरु के उत्तर से एक बार में ही संतुष्ट हो जाए, यह ज़रूरी नहीं है. वह उत्तर पर भी प्रश्न करता है. गुरु उसकी बात का बुरा नहीं मानते, बल्कि ऐसा करने वाले शिष्य की प्रशंसा करते हुए उसका पूरा समाधान करते हैं.

 

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श्रीमद्भभगवतगीता अर्जुन के प्रश्न से ही शुरू होती है. उसने श्रीकृष्ण से एक-दो नहीं चौरासी प्रश्न किये. साधारण गुरु होता तो चिढ़ जाता. लेकिन श्रीकृष्ण पूर्ण गुरु हैं. इसी तरह अर्जुन भी पूर्ण शिष्य है. प्रश्न का उत्तर पाने पर शिष्य प्रतिप्रश्न करता है. इसी तरह विषय पर हर पहलू से मंथन हो जाता है और विषय का तत्व सामने आता है. बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है कि- वादे वादे जायते तत्वबोध:. अर्थात वाद-विवाद से ही तत्वबोध होता है. भारत में ऐसा नहीं रहा कि यदि किसी महापुरुष ने कुछ कह दिया है या किसी ग्रंथ में कुछ लिखा है, तो वह पत्थर की लकीर है. सनातन रेडीमेड धर्म धर्म नहीं है. धर्म और अन्य विषयों पर भी प्रश्न कर पूछने का सबको अधिकार सबको है, बशर्ते उसका उदेश्य सत्य जानने की जिज्ञासा हो. सिर्फ तर्क-वितर्क करने के लिए या बिना किसी गंभीर उद्देश्य के प्रश्न पूछने को गलत माना गया है. भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि, महापुरुषों के समक्ष सच्ची जिज्ञासा से प्रश्न लेकर जाओ,वे तुम्हारी जिज्ञासा का समाधान करेंगे. पात्र प्रश्नकर्ता की सच्ची जिज्ञासा और सदाशयता समझने पर ज्ञानीजन गूढ़ से गूढ़ बात भी बता देते हैं.  प्रश्न पूछने वाले की मंशा का बहुत महत्त्व है. सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि, लोगों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों के पीछे कोई गंभीरता नहीं होती. वे या तो अपना ज्ञान बघारने या बुद्धिमान कहलाने के लिए प्रश्न करते हैं या सिर्फ पूछने के लिए पूछते हैं. ऐसे लोग उत्तर आने के दौरान यही सोचे रहते हैं कि, अगला प्रश्न क्या पूछा जाए. वे पूछे गये प्रश्न का उत्तर भी ध्यान से नहीं सुनते.

 

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प्रश्में सहज जिज्ञासा का अभाव होता है. ऐसे प्रश्नकर्ता को कभी सही उत्तर नहीं मिलता, क्योकि उसका प्रश्न ही उचित नहीं होता. बच्चों के समग्र विकास के लिए उन्हें प्रश्न पूछने के लिए कभी हतोत्साहित नहीं करना चाहिए. यदि उत्तर पता हो, तो तुरंत बता देना चाहिए. यदि नहीं मालूम हो, तो स्पष्ट कर देना चाहिए कि, अभी आपको प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम. मालूम करके बता देंगे. इससे बच्चे के सामने आपकी कोई हेटी नहीं होगी. इसके विपरीत, उसमें यह सोच विकसित होगी कि, कोई भी सर्वज्ञानी नहीं होता. ज्ञान एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जीवनभर चलती रहती है. मरते-मरते भी व्यक्ति कुछ नया सीखता रहता है. किसी विद्वान ने कहा है कि, आपका बुढ़ापा तब शुरू होता है, जब आपके मन में जिज्ञासाएं और कुछ नया सीखने की इच्छा नहीं रह जाती. जो लोग रोजाना कुछ नया सीखने को उत्सुक होते हैं, वे ही सार्थक जीवन जी पाते हैं. भारत में एक और बहुत बड़ी बात यह कही गयी है कि, ज्ञान प्राप्त करने के लिए सारी खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए. जहाँ से और जिससे भी ज्ञान मिलता हो,उसे ग्रहण करो. ज्ञान देने वाला कोई भी हो, इसका कोई महत्त्व नहीं है. कोई बच्चा भी आपको कुछ सिखा सकता है. शुकदेवजी बालक ही थे,लेकिन ऋषियों  ने उनसे प्रश्न किये और उन्होंने उनके समाधानकारी उतर दिए. इसलिए हर व्यक्ति को किसी बंधे-बंधाये उत्तर से संतुष्ट नहीं होना चाहिए. अपने विवेक का उपयोग कर खुद विषय को समझिये और फिर उसे अपने विवेक की कसौटी पर कास कर मानिये  या नहीं मानिये.

 

 

 


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