विशेष: श्री राम मंदिर आंदोलन संघर्ष गाथा

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किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व और अस्मिता, स्वत्व और स्वाभिमान उस देश के श्रद्धा व आस्था केन्द्रों, महापुरुषों के स्मृतिस्थलों तथा सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण व संवर्धन पर निर्भर करता है।

यह इतिहास का एक कड़वा सच है कि बर्बर विदेशी आक्रान्ताओं ने हमारे हजारों श्रद्धा, पुण्य और प्रेरणा केन्द्रों को ध्वस्त कर राष्ट्रीय स्वाभिमान को आहत करने का दुस्साहस किया था। श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिये तो अब तक हुए 76 संघर्षों में साढ़े तीन लाख से अधिक लोगों ने अपना बलिदान दिया।

बाबर के सेनापति मीर बाकी ने श्री रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को ध्वस्त कर उसके बहुत से प्रतीक चिन्हों, स्तंभों, मूर्तियों आदि को क्षतिग्रस्त करके उनका मलवे के रूप में प्रयोग करते हुए उसी स्थान पर एक मस्जिदनुमा ढ़ांचे का निर्माण कराया। यदि ऐसा है तो इस प्रश्न को मंदिर-मस्जिद विवाद अथवा हिन्दू-मुस्लिम समस्या की चौखट से बाहर निकालकर एक स्वतंत्र राष्ट्र के नाते गुलामी के प्रतीक चिन्हों को मिटाने और राष्ट्र के स्वत्व व स्वाभिमान जगाने तथा अस्मिता और पहचान को प्रकट करने वाले स्मारक की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जाना चाहिये। ऐसा होना सभी स्वतंत्र व स्वाभिमानी देशों व समाजों में होता आया है, और यह स्वाभाविक भी है।

भारत के लिये राम केवल पूजा के देव नहीं हैं। वे राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय गौरव, भारतभक्ति और मर्यादा के मानदंडों के अनुसार जीवन-व्यवहार करने वाले राष्ट्रपुरुष हैं। ऐसी स्थिति में अपमान के कलंक को धोने, गुलामी के चिन्हों को हटाने, सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति पाने, आस्था-श्रद्धा व मानबिन्दुओं की रक्षा करने, भावी पीढ़ियों को प्रेरणा देने, राष्ट्र की चेतना को जगाने और राष्ट्रीय पहचान को प्रकट करने के प्रतीक के रूप में श्री रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाया जाना अत्यंत स्वाभाविक है।

भारत के लिये राम केवल पूजा के देव नहीं हैं। वे राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय गौरव, भारतभक्ति और मर्यादा के मानदंडों के अनुसार जीवन-व्यवहार करने वाले राष्ट्रपुरुष हैं। ऐसी स्थिति में अपमान के कलंक को धोने, गुलामी के चिन्हों को हटाने, सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति पाने, आस्था-श्रद्धा व मानबिन्दुओं की रक्षा करने, भावी पीढ़ियों को प्रेरणा देने, राष्ट्र की चेतना को जगाने और राष्ट्रीय पहचान को प्रकट करने के प्रतीक के रूप में श्री रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाया जाना अत्यंत स्वाभाविक है।

🏹 1. राम
देश की आस्था के प्रतीक। इतिहास के धीरोदात्त नायक। लोकजीवन में शील और मर्यादा को स्थापित कर बने पुरुषोत्तम । भारत के राष्ट्रपुरुष राम। राम राज्य, अर्थात शील का अनुगामी राज्य। लोककल्याण के लिये कृतसंकल्प। भारत के इतिहास में शासन-विधान का सर्वोच्च मापदंड। इसीलिये देश के संविधान की प्रथम प्रति पर पुष्पक विमान में विराजमान माता जानकी और श्री लक्ष्मण सहित अयोध्यानरेश श्री राम का रेखाचित्र अंकित किया गया।

🏹 2. आक्रमण
1526 ई. में फरगाना के क्रूर शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। रास्ते भर में सैकड़ों नगरों को लूटता, हजारों गांवों को जलाता और लाखों लोगों की हत्या करता हुआ 1528 ई. में वह अयोध्या पहुंचा। बाबर के सेनापति मीर बाकी ने उसके आदेश पर अयोध्या पर आक्रमण किया। इतिहासकार कनिंघम के अनुसार 15 दिनों के घमासान युद्ध में 1 लाख 74 हजार हिन्दुओं के वीरगति प्राप्त करने के बाद ही मीर बाकी मंदिर को तोप के गोलों से गिराने में सफल हो सका। उसने रामजन्मभूमि मंदिर के मलवे से उस स्थान पर दरवेश मूसा आशिकान के निर्देश पर मस्जिद जैसा एक ढ़ांचा खड़ा कर दिया।

🏹 3. संघर्ष
अयोध्या सहित समूचे भारत के हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र रामजन्मभूमि पर स्थित मंदिर का ध्वंस भक्तों के लिये असहनीय वेदना का कारण बन गया । इसने रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिये संघर्ष की एक विरामहीन श्रंखला को जन्म दिया। 1528 से 1949 तक की कालावधि में जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिये 76 युद्ध हुए जिनमें लाखों रामभक्तों ने बलिदान दिया। इनमें बाबर के काल में 4 बार, हुमायूं के काल में 10 बार, अकबर के काल में 20 बार, औरंगजेब के काल में 30 बार, अवध के नवाब सआदत अली के काल में 5 बार और नवाब नासिरुद्दीन हैदर के काल में 3 बार संघर्ष हुआ।

🏹 4. रामलला का प्राकट्य
22 दिसम्बर 1949 की रात को एक चमत्कार घटित हुआ । रामजन्मभूमि पर सुरक्षा के लिये तैनात सिपाही ने बताया कि अचानक एक दिव्य प्रकाश से उसकी आंखें चौंधिया गयी और जब उसे भान हुआ तो उसने देखा कि बाल रूप में श्री राम उस भवन के भीतर विराजमान हैं और सैकड़ों लोग श्रद्धाभाव से उनके दर्शन कर रहे हैं। ढ़ांचे के बाहर स्थित राम चबूतरे पर अखण्ड कीर्तन प्रारंभ हो गया जो 6 दिसम्बर 1992 तक निरंतर चलता रहा। आक्रोषित कारसेवकों द्वारा विवादित ढ़ांचा ढ़हा दिये जाने के बाद उस स्थान को सरकार द्वारा कब्जे में ले लिया गया। इस कारण कीर्तन का स्थान बदल दिया गया किन्तु वह आज तक अखण्ड रूप से जारी है।

🏹 5. रामलला ताले में
रामलला के प्राकट्य की घटना पर मुस्लिम समाज की ओर से विरोध की संभावना को देखते हुए 29 दिसम्बर 1949 को तत्कालीन जिलाधिकारी श्री कृष्ण कुमार नैयर ने उस क्षेत्र को विवादित घोषित कर निषेधाज्ञा लागू कर दी।

ढ़ांचे के मुख्य द्वार को लोहे की सरियों से बंद कर ताला डाल दिया गया। एक छोटे द्वार से पूजा-अर्चना और भोग आदि के लिये केवल चार पुजारियों और एक भंडारी को प्रवेश की अनुमति दी गयी तथा फैजाबाद नगरपालिका अध्यक्ष श्री के के राम वर्मा को रिसीवर नियुक्त कर दिया गया। किसी भी प्रकार का संघर्ष टालने के लिये उस स्थान से 500 गज की परिधि में मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया।

🏹 6. हिन्दू सम्मेलन
1983 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हिन्दू जागरण मंच के तत्वावधान में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये पधारे उ.प्र. सरकार के पूर्व मंत्री श्री दाऊदयाल खन्ना, जो मुरादाबाद से पांच बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक रहे, ने श्री राम जन्मभूमि अयोध्या, श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा तथा वाराणसी स्थिति काशी विश्वनाथ मंदिर पर बनी मस्जिदों को हिन्दू स्वाभिमान के लिये चुनौती बताते हुए उनकी मुक्ति का प्रयास किये जाने की मार्मिक अपील की। उपस्थित हिन्दू समाज ही नहीं अपितु आयोजकों को भी इस तथ्य की जानकारी नही थी। श्री खन्ना की अपील का गहरा असर हुआ और सम्मेलन में ही तीनों मन्दिरों की मुक्ति का प्रस्ताव पहली बार पारित हुआ।

🏹 7. प्रथम धर्म संसद
उक्त जानकारी के आधार पर विश्व हिन्दू परिषद का एक प्रतिनिधि मण्डल श्री अशोक सिंहल के नेतृत्व में तीनों स्थानों के तथ्यान्वेषण के लिये गया। मुजफ्फरनगर में पारित प्रस्तावों पर देश के शीर्षस्थ संतों-महंतों से परामर्श कर अप्रेल 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसे धर्म संसद नाम दिया गया। यहां पुनः उक्त तीनों प्रस्ताव पारित किये गये ।

धर्म संसद में ही श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया । समिति के तत्वावधान में जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने की मांग को लेकर बिहार के सीतामढ़ी से श्रीराम-जानकी रथयात्रा प्रारंभ करने तथा देश भर में जनजागरण करने का भी निर्णय किया गया।

🏹 8. ताला खुला
श्री राम-जानकी रथों के माध्यम से व्यापक जन-जागरण हुआ। किन्तु वे रथ दिल्ली पहुंच पाते, इससे पूर्व ही प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी। इसके साथ ही राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में सिख बन्धुओं के नृशंस नरसंहार का सिलसिला शुरू हो गया। श्री रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने इन परिस्थितियों में अपने आंदोलन को एक वर्ष के लिये रोक दिया। अक्तूबर 1985 में कर्नाटक के उडुपि में द्वितीय धर्म संसद का आयोजन किया गया जहां सरकार को जन्मभूमि पर लगा ताला खोलने के लिये चेतावनी दी गयी। फैजाबाद के जिला न्यायाधीश श्री के एम पाण्डेय ने 01 फरवरी 1986 को ताला खोलने का आदेश दे दिया। ज्ञातव्य है कि इस समय जहां केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे वहीं उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह थे।

🏹 9. मन्दिर का प्रारूप
अब प्रश्न मंदिर के निर्माण का था। इसके लिये आवश्यक था मंदिर का प्रारूप। सोमनाथ मंदिर का प्रारूप बनाने वाले श्री सोमपुरा के पौत्र तथा मंदिर शिल्प के प्रख्यात विशेषज्ञ श्री चन्द्रकान्त सोमपुरा को श्री रामजन्मभूमि पर बनने वाले मंदिर का प्रारूप तैयार करने का काम सौंपा गया। श्री सोमपुरा ने 270 फीट लम्बे, 135 फीट चौड़े और 125 फीट ऊंचे दो तल वाले भव्य मंदिर का प्रारूप तैयार किया।

🏹 10. श्री रामशिला पूजन
जनवरी 1989 में प्रयाग में कुम्भ के अवसर आयोजित तृतीय धर्म संसद में एक लाख से अधिक संतों और रामभक्तों के बीच पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में 9-10 नवम्बर को श्री रामजन्मभूमि पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गयी। मंदिर निर्माण का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने के लिये शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन 30 सितम्बर 1989 को देश भर में रामशिलाओं के पूजन की योजना बनायी गयी। इस दिन लगभग 2 लाख 75 हजार गांवों में रामशिलाओं का पूजन कर अयोध्या भेजा गया। विदेशों में निवास कर रहे भारतीयों ने भी मन्दिर निर्माण के लिये रामशिलायें अयोध्या भेजीं।

🏹 11. शिलान्यास
घोषित कार्यक्रम के अनुसार 9 नवम्बर 1989 को प्रातः निर्धारित समय पर पू. महंत अवैद्यनाथ, पू. वामदेव जी तथा महंत रामचन्द्रदास परमहंस के नेतृत्व में भूमि उत्खनन कार्य हुआ। शंखध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच शिलान्यास सम्पन्न हुआ। बिहार के दलित समाज के रामभक्त श्री कामेश्वर चौपाल ने राम मंदिर की पहली शिला रखी। शिलान्यास से पूर्व ही उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने घोषणा कर दी थी कि शिलान्यास स्थल विवादित भूमि नहीं है। किन्तु 11 नवंबर को जब 7 हजार से अधिक सन्त तथा रामभक्त निर्माण हेतु कारसेवा के लिये आगे बढ़े तो उन्हें जिलाधिकारी की आज्ञा से रोक दिया गया। इस समय राज्य के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी थे।

🏹 12. अल्पविराम
केन्द्र और राज्य सरकारें जहां अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के कीर्तिमान बना रही थीं वहीं हिन्दू समाज की रामजन्मभूमि के प्रति आस्था का भी मखौल बनाया जा रहा था। इससे उत्पन्न रोष की बाढ़ में दोनों ही सरकारें बह गयीं।

नवंबर 1989 में उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ हुए जिनमें कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी।

नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से भेंट कर राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के प्रतिनिधियों ने सारे ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्रमाण उनके समक्ष रखे। प्रधानमंत्री द्वारा शीघ्र ही निर्णय का आश्वासन दिया गया। फरवरी माह में उन्होंने पुनः चार महीने का समय मांगा जो जून में समाप्त हो गया।

🏹 13. प्रथम कारसेवा
सरकार द्वारा फिर भी कोई सकारात्मक उत्तर न मिलने पर 01 अगस्त 1990 को संतों ने वृंदावन में मंदिर निर्माण में आने वाली चुनौतियों से संघर्ष हेतु तन-मन-धन अर्पण करने का संकल्प किया। अगस्त मास में देश भर में श्री राम कारसेवा समितियों का गठन किया गया। 15 अगस्त को घंटे-घड़ियाल और शंख बजा कर चेतावनी दिवस मनाया गया।

सन्तों ने ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती की अध्यक्षता में श्री राम कारसेवा समिति का गठन किया तथा 30 अक्तूबर 1990 को देवोत्थान एकादशी के दिन मंदिर निर्माण के लिये कारसेवा प्रारंभ करने की घोषणा कर दी। समिति का संयोजक विहिप के महामंत्री श्री अशोक सिंहल को बनाया गया।

🏹 14. रामज्योति
मंदिर निर्माण का संकल्प घर-घर तक पहुंचाने के लिये रामज्योति को माध्यम बनाया गया। 01 सितंबर 1990 को अयोध्या में पूर्ण विधि-विधान से मंत्रोच्चार के बीच अरणि मंथन द्वारा अग्नि का आह्वान किया गया। इस अग्नि से ही 18 अक्तूबर को दीपावली के दीप प्रज्ज्वलित करने का संदेश संतों ने दिया। 400 बड़ी और सैकड़ों छोटी-छोटी यात्राओं के माध्यम से देश के लाखों गावों तक यह ज्योति पहुंची, साथ ही मंदिर निर्माण का संकल्प भी।

🏹 15. परिंदा भी पर नहीं मार सकता
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने घोषित किया कि वे 30 अक्तूबर को अयोध्या में कारसेवा नहीं होने देंगे। अयोध्या की ओर जाने वाली सभी सड़कें बंद कर दी गयीं और सभी रेलगाड़ियां रद्द कर दी गयीं। श्री रामजन्मभूमि को पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने घेर लिया और अयोध्या को छावनी में बदल दिया गया। मुख्यमंत्री ने अहंकारपूर्वक घोषणा की कि उनकी इजाजत के बिना अयोध्या में कारसेवक तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।

कारसेवकों को रोकने के लिये उत्तर प्रदेश की पुलिस और अर्धसैनिक बलों के अतिरिक्त केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, रेलवे सुरक्षा बल तथा केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के 1 लाख 80 हजार सशस्त्र जवान भी केन्द्र से मंगा कर तैनात किये गये थे। उत्तर प्रदेश से मिलने वाली मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं पर सड़कों में 10-10 फीट चौड़ी खाइयां खोद दी गयीं थीं। इटावा में चंबल नदी के पुल पर दस फुट ऊंची और तीन फीट चौड़ी कंक्रीट की दीवार ही खड़ी कर दी गयी थी। अनेक स्थानों पर लोहे की रेलिंग लगा कर उनमें करंट प्रवाहित कर दिया गया था।

इतनी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था के बाद दुनियां भर से आये पत्रकारों को भी यह विश्वास हो गया था कि कारसेवा असंभव है। 29 अक्तूबर को अज्ञात स्थान से जब श्री अशोक सिंहल का बयान जारी हुआ – “पूर्व घोषणा के अनुसार 30 अक्तूबर को ठीक 12.30 बजे कारसेवा होगी”, तो सहसा कोई भी इस पर विश्वास न कर सका।

🏹 16. सत्ता का दर्प चूर हुआ
देवोत्थान एकादशी की भोर। अयोध्या नगरी में कर्फ्यू लागू था, सुरक्षा बलों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिये गये थे।

नगर की सड़कों पर सशस्त्र जवानों के अतिरिक्त कोई नजर नहीं आता। सच में, परिन्दा पर न मार सके, ऐसी ही स्थिति थी।

प्रातः नौ बजे। अचानक मणिरामदास छावनी के द्वार खुले और पूज्य वामदेव जी और महंत नृत्यगोपाल दास जी बाहर निकले। ठीक इसी समय वाल्मीकि मंदिर का कपाट खोल कर विहिप के महामंत्री श्री अशोक सिंहल प्रकट हुए। उनके साथ थे उ.प्र. पुलिस के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित।

उन्हें देख कर सभी चौंक गये। एक सप्ताह से आन्दोलन के इन नेताओं की तलाश में पुलिस ने अयोध्या का चप्पा-चप्पा छान मारा था लेकिन उनकी हवा भी न पा सकी थी। आश्चर्यचकित पत्रकार भी हुए थे। वे सोच रहे थे कि यह लोग अकेले पहुंचने में सफल भी हो गये तो इतनी सुरक्षा व्यवस्था के सामने क्या कर सकेंगे। लेकिन अभी तो रोमांच का क्षण आना बाकी था।

इन नेताओं ने जयश्री राम का उदघोष कर जैसे ही हनुमान गढ़ी की ओर कदम बढ़ाये, घरों के दरवाजे खुल लगे और हर घर से कारसेवक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की टोलियां निकलने लगीं। देखते ही देखते भगवा पटके सर से बांधे हजारों लोगों का काफिला बढ़ चला। सबसे आगे संत, फिर महिलायें और बच्चे, सबसे अंत में पुरुष। निहत्थे, निर्भीक कारसेवक रामनाम का संकीर्तन करते श्री राम जन्मस्थान की ओर आगे बढ़ रहे थे। प्रशासन हतप्रभ था। परिंदा भी पर न मार सके, ऐसी सुरक्षा का दावा करने वालों के होश उड़ गये।

हनुमान गढ़ी के पास पहुंचते ही बौखलाये प्रशासन ने निहत्थे कारसेवकों पर लाठी बरसाना प्रारंभ कर दिया। श्री अशोक सिंहल के सिर पर लाठी का प्रहार हुआ, रक्त की धार बह चली। उनके मुख से निकले जय श्री राम के घोष ने कारसेवकों के पौरुष को जगा दिया। 64 वर्षीय श्रीश चन्द्र दीक्षित ढ़ांचे के बाहर बनी आठ फीट ऊंची दीवार और उस पर लगी कंटीले तारों की बाड़ पार कर कब और कैसे रामलला के सामने जा पहुंचे, वे भी नहीं समझ सके।

उनके साथ ही सैकड़ों कारसेवक भी प्रांगण के अंदर थे। देखते ही देखते वे सभी बन्दरों की भांति ढ़ांचे के गुम्बद पर चढ़ गये। कोलकाता के रामकुमार और शरद कोठारी ने बीच में स्थित मुख्य गुम्बद पर हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक भगवा ध्वज फहरा दिया। फैजाबाद के एक नौजवान और एक साधु महाराज ने शेष दोनों गुम्बदों पर भी ध्वज लगा दिया। यह दोनों लोग ही गुम्बद से फिसल कर नीचे गिरे और रामकाज में बलिदान हो गये। उस रात अयोध्या सहित साकेत में अभूतपूर्व दीवाली मनायी गयी।

यह समाचार सुनते ही कि विवादित ढ़ांचे पर कारसेवकों का कब्जा हो गया है, सुरक्षा के अहंकारपूर्ण दावे करने वाले मुख्यमंत्री मुलायम सिंह स्तब्ध रह गये। दूसरी ओर बलिदानी कारसेवकों के शोक तथा उनके शवों के अंतिम संस्कार के लिये 31 अक्तूबर और 01 नवम्बर को कारसेवा बन्द रही। 02 नवम्बर को रामदर्शन कर कारसेवकों के वापस जाने की घोषणा की गयी।

🏹 17. खून की होली
अभी दो दिन पहले ही अयोध्या ने दीवाली मनायी थी। कौन जानता था कि महाकाल की इच्छा होली की है, वह भी खून की होली। आज कारसेवक रामलला के दर्शन कर अपने-अपने घरों को लौटने के लिये तैयार थे। प्रातः 11 बजे दिगम्बरी अखाड़े से परमहंस रामचन्द्र दास, मणिराम छावनी से महंत नृत्यगोपाल दास और सरयू के तट से बजरंग दल के संयोजक श्री विनय कटियार तथा श्रंगारहाट से सुश्री उमा भारती के नेतृत्व में कारसेवकों के जत्थे राम जन्म भूमि की ओर बढ़े।

अपमान की आग में जल रहे मुख्यमंत्री ने प्रतिशोध लेने की ठान ली थी। विनय कटियार और उमा भारती के नेतृत्व में चल रहे निहत्थे कारसेवकों पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया। दिगम्बरी अखाड़े की ओर से परमहंस रामचन्द्र दास के नेतृत्व में आ रहे काफिले पर पीछे से अश्रुगैस के गोले फेंके गये और कारसेवक कुछ समझ पाते इससे पहले ही बिना किसी चेतावनी के गोलियों की वर्षा होने लगी।

कारसेवकों के शरीर जयश्री राम के उच्चारण के साथ कुछ क्षण तड़पते और फिर शांत हो जाते।

30 अक्तूबर को मुख्य गुंबद पर भगवा फहराने वाले शरद कोठारी को भीड़ में से खोज कर गोली मारी गयी। उसका छोटा भाई रामकुमार कोठारी जब उसे बचाने के लिये आगे बढ़ा तो उसे भी गोलियों से भून दिया गया। अपने माता-पिता के यह दो ही पुत्र थे। दोनों रामकाज में समर्पित हो गये। मां की गोद सूनी हो गयी।

🏹 18. अस्थिकलश
बलिदानी कारसेवकों के अस्थिकलशों को देश भर में ले जाया गया। स्थान-स्थान पर उनका भावपूर्ण स्मरण कर नागरिकों ने उन्हें श्रद्धा-सुमन चढ़ाये। 1991 की मकर संक्रांति को माघमेला के अवसर पर उनकी अस्थियां प्रयागराज संगम में विसर्जित कर दी गयी। कारसेवकों के इस बलिदान ने मन्दिर निर्माण के संकल्प को और दृढ़ कर दिया।

🏹 19. संतों की सिंहगर्जना
2-3 अप्रेल 1991 को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में चतुर्थ धर्मसंसद सम्पन्न हुई। 04 अप्रेल को दिल्ली के वोट क्लब पर ऐतिहासिक रैली हुई जिसमें देश भर से पच्चीस लाख से भी अधिक रामभक्त एकत्र हुए। इस रैली में संतों ने सिंह गर्जना की कि मंदिर वहीं बनेगा। सरकार अपनी भूमिका स्वयं तय करें। उन्हें इस जनज्वार के आगे झुकना होगा या हटना होगा। रैली अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि सूचना मिली कि उत्तर प्रदेश में श्री मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। केन्द्र की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार इससे पूर्व 17 सितम्बर को ही विश्वास मत में पराजित हो चुकी थी। कारसेवकों ने सरकारी अत्याचार के विरुद्ध नारा दिया था – “दिल्ली की गद्दी डुबो सके, सरयू में इतना पानी है”, वह नारा सच साबित हुआ।

🏹 20. धरती से निकले मंदिर के प्रमाण
इससे पूर्व सरकार ने तीर्थयात्रियों हेतु सुविधाएं विकसित करने के लिये स्वयं भी 2.77 एकड़ भूमि अधिगृहीत की। जून 1991 में जब सरकार की भूमि पर समतलीकरण का कार्य प्रारंभ हुआ तो दक्षिण-पूर्वी कोने से अनेक पत्थर प्राप्त हुए जिनमें शिव-पार्वती की खंडित मूर्ति, सूर्य के समान अर्धकमल, मन्दिर के शिखर का आमलक सहित उत्कृष्ट नक्काशी वाले पत्थर व मूर्तियां थी। यह सभी प्रस्तर खण्ड पुरातात्विक महत्व के थे और मन्दिर की ऐतिहासिकता के स्वयं सिद्ध प्रमाण थे।

🏹 21. फिर फहराया भगवा
31 अक्तूबर 1991 को एक बार पुनः कारसेवक अयोध्या में जुटे। समिति ने यद्यपि प्रतीकात्मक कारसेवा का ही निश्चय किया था किन्तु कुछ उत्साही कारसेवक एक बार पुनः गुम्बद पर जा चढ़े और भगवा लहरा दिया। गुम्बदों को कुछ नुकसान भी पहुंचा किन्तु प्रदेश सरकार ने उसकी मरम्मत करा दी। बाद में ढ़ांचे की रक्षा के लिये इसके चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया।

🏹 22. प्रधानमंत्री से भेंट
आंदोलन के नेता स्वामी वामदेव, परमहंस रामचन्द्र दास, महंत अवैद्य नाथ, युगपुरुष परमानंद, स्वामी चिन्मयानंद आदि ने प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव से भेंट कर राम मंदिर निर्माण में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आग्रह किया।

🏹 23. सर्वदेव अनुष्ठान व नींव ढ़लाई
09 जुलाई 1992 से 60 दिवसीय सर्वदेव अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। जन्मभूमि के ठीक सामने शिलान्यास स्थल से भावी मंदिर की नींव के चबूतरे की ढ़लाई भी प्रारंभ हुई। 15 दिनों तक इसके लिये कारसेवा चली और नींव ढ़लाई का काम होता रहा ।

शांतिपूर्ण ढ़ंग से चल रही इस कारसेवा को रोकने के लिये धर्मनिरपेक्षतावादियों ने पूरे देश में कोहराम मचाया । लोकसभा में अभूतपूर्व हंगामा हुआ जिसके चलते एक सप्ताह तक लोकसभा की कार्यवाही ठप्प रही। प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हाराव ने संतों से तीन माह का समय मांगा और निर्धारित समय सीमा में अयोध्या विवाद का सर्वमान्य हल निकालने का विश्वास दिलाया। संतों ने प्रधानमंत्री का आग्रह स्वीकार कर लिया तथा नींव ढ़लाई का काम बन्द कर दिया ।

जिस नीव की ढ़लाई की जा रही थी वह 290 फीट लम्बी, 155 फीट चौड़ी और 2-2 फीट मोटी एक के ऊपर एक तीन परत ढ़लाई करके कुल छः फीट मोटी थी।

🏹 24. पादुका पूजन
नन्दी ग्राम में भरत जी ने 14 वर्ष तक वनवासी रूप में रह कर अयोध्या का शासन भगवान की पादुकाओं के माध्यम से चलाया था। इसी स्थान पर 26 सितम्बर 1992 को श्रीराम पादुकाओं का पूजन हुआ। अक्तूबर मास में देश के गांव-गांव में इन पादुकाओं के पूजन द्वारा जन-जागरण हुआ। रामभक्तों ने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया।

🏹 25. द्वितीय कार सेवा
29-30 अक्तूबर 1992 को नयी दिल्ली में पंचम धर्मसंसद आहूत की गयी। संतों ने सरकार के रवैये पर रोष जताते हुये समाधान न होने पर गीता जयंती 06 दिसम्बर 1992 से अयोध्या में पुनः कारसेवा प्रारंभ करने की घोषणा की।

निर्धारित समय सीमा में सरकार विवाद का हल ढ़ूंढ़ने में विफल रही। परिणामस्वरूप गीता जयंती की घोषित तिथि पर कारसेवा की घोषणा कर दी गयी। कई दिन पहले से ही पूरे देश से कारसेवक पहुंचने प्रारंभ हो गये थे

न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उन सभी को परिचय-पत्र दिये जा रहे थे। न्यायालय के निर्देशानुसार प्रचार माध्यमों द्वारा निरंतर उसके निर्देशों की उदघोषणा भी की जा रही थी।

🏹 26. न्यायिक प्रक्रिया
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार से कारसेवा के संबंध में आश्वासन मांगा गया। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने शपथ-पत्र दाखिल कर न्यायालय को आश्वासन दिया कि अधिग्रहीत 2.77 एकड़ भूमि पर लम्बित विवाद का फैसला होने तक किसी निर्माण की अनुमति नहीं दी जायेगी, क्षेत्र में निर्माण सामग्री और उससे संबंधित यंत्र नहीं आने दिये जायेंगे तथा धार्मिक गतिविधियों के तहत प्रतीकात्मक कारसेवा की जायेगी। इस आश्वासन के पश्चात उच्चतम न्यायालय ने सांकेतिक कारसेवा की अनुमति प्रदान कर दी। अयोध्या में न्यायिक पर्यवेक्षक की नियुक्ति कर दी गयी जिसे कारसेवा के दौरान इसपर नजर रखनी थी कि शपथ-पत्र में दिये गये आश्वासनों का उल्लंघन न हो।

समिति को यह विश्वास था कि प्रयाग उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ का 2.77 एकड़ भूमि पर निर्माण संबंधी फैसला गीता जयंती से पूर्व आ जायेगा। इस वाद की सुनवाई 4 नवंबर को ही पूरी हो चुकी थी और निर्णय प्रतीक्षित था। इसका अनुमान लेते हुए ही कारसेवा की तिथि गीता जयंती पर तय की गयी थी। यह बात न्यायालय के संज्ञान में भी थी। किन्तु फिर भी न्यायालय ने कारसेवा से तीन दिन पूर्व अपना निर्णय 11 दिसम्बर तक के लिये सुरक्षित कर दिया।

वस्तुतः यह भूमि श्रीराम जन्मभूमि न्यास की अपनी भूमि थी जिसे मुलायम सिंह सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया था। न्यास ने न्यायालय से इस अधिग्रहण को अवैध घोषित करते हुए न्यास को भूमि वापस सौंपे जाने की प्रार्थना की थी। इसी भूमि पर कारसेवा प्रस्तावित थी।

11 दिसंबर को सुनाये अपने फैसले में न्यायालय ने न्यास के दावे को उचित मानते हुए भूमि के अधिग्रहण की अधिसूचना को अवैध ठहरा दिया।

🏹 27. गीता जयंती (06 दिसम्बर 1992)
इस बीच अयोध्या में लगभग चार लाख कारसेवक पहुंच चुके थे। समिति के सामने समस्या थी कि इतनी बड़ी संख्या में उपस्थित कारसेवकों को क्या समझाया जाय। फिर भी कारसेवकों को सम्बोधित करते हुए नेताओं ने ‘जोश में होश न खोने’, ‘संयम बरतने’, ‘अनुशासन में रहने’, ‘मर्यादा न भंग होने’, ‘साधु-संतों के निर्देश का पालन करने’ आदि के निर्देश दिये। कारसेवा का स्वरूप पंक्तिबद्ध रूप से दोनों मुठ्ठियों में सरयू की रेत लाकर निर्माणस्थल पर डालने तक सीमित कर दिया।

गीता जयंती की ठंडी सुबह कारसेवक सरयू में स्नान कर निर्धारित समय पर रामकथा कुंज में जुटने लगे। लगभग 10 बजे औपचारिक कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। संतों तथा आंदोलन के नेताओं ने कारसेवकों को संबोधित करना शुरू किया। इसी मध्य कुछ कारसेवक अधिग्रहीत भूमि, जिस पर कारसेवा प्रस्तावित थी, की ओर बढ़ गये। मंच संचालक ने कारसेवकों से प्रस्तावित कारसेवास्थल तुरंत खाली कर देने की अपील की। साथ ही व्यवस्था में लगे कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि जो कारसेवक परिसर खाली न कर रहे हों उन्हें उठा कर बाहर कर दिया जाय।

🏹 28. धैर्य टूट गया
कारसेवकों से बलपूर्वक कारसेवास्थल खाली कराने का प्रयास जैसे ही शुरू हुआ, उनके धैर्य का बांध टूट गया। स्वयंसेवकों को परे धकेल कर बैरीकेटिंग को लांघते हुए कारसेवकों का समूह अंदर घुस गया।

यह देख कर अन्य कारसेवक भी उस ओर दौड़ पडे और सारे वातावरण में जयश्रीराम के नारे गूंजने लगे। उनमें से कुछ कारसेवक विवादित ढ़ांचे तक भी जा पहुंचे थे।

मंच पर उपस्थित नेताओं ने पहले मंच से ही स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। ढांचे की ओर बढ़ने वाले अधिकांश कारसेवक दक्षिण भारतीय हैं, यह देख सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) श्री हो वे शेषाद्रि ने कन्नड़, तमिल, तेलुगू और मलयालम में कारसेवकों से वापस आने की अपील की। इसका कोई असर न देख कर भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी और सुश्री उमा भारती ने इसका प्रयास किया। यह प्रयास भी बेकार गया।

अपने प्रयास निष्फल होते देख अनेक नेता मंच से उतर कर स्वयं ढ़ांचे तक गये और कारसेवकों को निकालने का प्रयास करने लगे। इनमें श्री अशोक सिंहल और श्री आडवाणी भी थे। यद्यपि वे लोग कुछ मात्रा में कारसेवकों को बाहर भेजने में सफल हुए किन्तु उससे अधिक संख्या में लोग निरंतर ढ़ांचे की ओर बढ़ रहे थे। उस अफरा-तफरी में कोई किसी को नहीं पहचान रहा था। स्थित नियंत्रण से परे हो चुकी थी। आंदोलन के नेता ही नहीं, सुरक्षा बल भी कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं थे।

🏹 29. विवादित ढ़ांचा ध्वस्त
कारसेवकों में उत्साह तो अपरिमित था किन्तु अपना मनोरथ पूरा करने के लिये उनके पास कोई औजार नहीं था। प्रारंभ में तो वे ढ़ांचे को केवल हाथों से ही पीट रहे थे और धक्का दे रहे थे। किन्तु शीघ्र ही कुछ नौजवानों ने सुरक्षा के लिये लगाये गये बैरीकेटिंग के पाइपों को निकाल लिया और उससे ढ़ांचे पर प्रहार करने लगे। दोपहर 01.30 बजे ढ़ांचे की एक दीवार को कारसेवकों ने ढ़हा दिया।

इससे उनमें नया जोश भर गया और वे और अधिक तीव्रता से प्रहार करने लगे। कारसेवकों का सैलाब वहां हर पल बढ़ रहा था।

बड़ी संख्या में कारसेवक गुम्बदों पर भी चढ़ गये थे। 2.45 बजे वे पहला गुम्बद गिराने में सफल हो गये। इसने उनके जोश को दोगुना कर दिया। गुम्बद के साथ ही उस पर चढ़े बीसियों कारसेवक भी नीचे गिरे। जो कारसेवक उस गुम्बद को नीचे से गिराने की कोशिश कर रहे थे वे उसके नीचे ही दब गये। वातावरण में गूंज रहे जोशीले नारों में आहों और कराहों के स्वर भी जुड़ गये। 4.30 बजे दूसरा गुम्बद भी धराशायी हो गया।

लगभग 4.45 बजे अचानक तीव्र आवाज के साथ धूल का एक बादल उठा और आसमान में छा गया। कुछ पल के लिये लगा मानो सब कुछ ठहर गया। धूल का गुबार कम होने पर देखा कि ढ़ांचे का तीसरा गुम्बद भी नीचे आ चुका था। विवादित ढ़ांचे का नामो-निशान भी न बचा था। इतिहास का चक्र 464 वर्षों बाद अपनी परिक्रमा पूरी कर वहीं लौट आया था।

🏹 30. अस्थायी मंदिर का निर्माण
कारसेवकों ने विवादित स्थल को समतल करने का काम प्रारंभ कर दिया। अब यह असली कारसेवा हो रही थी जिसके लिये कारसेवक आये थे। समतलीकरण का काम 6 दिसम्बर की सारी रात और 7 दिसम्बर के पूरे दिन चलता रहा। समतल भूमि पर ईंट, मिट्टी और गारे से एक चबूतरे का निर्माण कर उस पर रामलला को स्थापित कर दिया गया और पूजा-अर्चन प्रारंभ हो गया। 8 दिसम्बर की भोर में केन्द्र सरकार के निर्देश पर वहां सुरक्षा बलों ने पहुंच कर सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया। रामलला के नवनिर्मित मंदिर की पूजा-अर्चना नियमित रूप से चलती रही।

🏹 31. सुरक्षा बलों की भूमिका
आंदोलन का नेतृत्व जब कारसेवकों को विवादित ढ़ांचे ही नहीं, प्रस्तावित कारसेवा के स्थान से भी बाहर करने का प्रयत्न कर रहा था तो उसके पीछे दो उद्देश्य कार्य कर रहे थे। पहला, वे अपने कार्यक्रम को उसी प्रकार शांति पूर्ण ढ़ंग से पूरा करना चाहते थे और दूसरा, न्यायालय में दिये शपथ-पत्र का सम्मान बनाये रखने की उनकी मंशा थी। अभी तक का सारा आंदोलन संवैधानिक मर्यादा के भीतर रह कर ही चलाया गया था और वे उसे बनाये रखना चाहते थे।

लेकिन कानून और व्यवस्था का प्रश्न उस समय प्रशासन को हल करना था जिसने समय पर अपनी भूमिका ठीक तरह से नहीं निभायी। पुलिस सूत्रों के अनुसार जिला प्रशासन ने बाहर से आयी सीआरपीएफ और रैपिड एक्शन फोर्स से लगभग 02 बजे सहायता मांगी थी किन्तु उन्हें आदेश करने के लिये मजिस्ट्रेट स्तर का पदाधिकारी चाहिये था जो उन परिस्थितियों में उपलब्ध नहीं हो सका।

सायं 5.30 पर राज्य के मुख्यमंत्री ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए त्यागपत्र दे दिया। 8.30 बजे राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। इसके साथ ही सारी शक्तियां केन्द्र सरकार के हाथ में आ गयीं थी। इसके बावजूद वहां निर्माण कार्य चलता रहा। केन्द्रीय सुरक्षा बल विवादित स्थल से केवल 15 किमी की दूरी पर फैजाबाद में थे। वे 08 दिसम्बर को प्रातः 3.50 बजे फैजाबाद से चले और 04.10 पर विवादित स्थल पर पहुंच गये। लेकिन केन्द्र द्वारा उन्हें वहां पहुंचने के लिये आदेश देने में 38 घंटे का समय लगा जो आश्चर्यचकित करता है।

🏹 32. अधिग्रहण
27 दिसम्बर 1992 को केन्द्र सरकार ने विवादित क्षेत्र और उसके आस-पास की 67 एकड़ भूमि के अधिग्रहण और इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय से राय लेने का फैसला लिया। सर्वोच्च न्यायालय की राय मिलने के बाद 07 जनवरी को राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये एक अध्यादेश से उक्त भूमि का अधिग्रहण कर लिया गया।

🏹 33. दर्शन की अनुमति
अयोध्या में विवादित क्षेत्र पर सुरक्षा बलों के अधिकार के बाद 08 दिसम्बर 1992 को नगर में कर्फ्यू लागू कर दिया गया। हरिशंकर जैन नाम के एक वकील ने उच्च न्यायालय में गुहार लगायी कि भगवान भूखे हैं अतः उनके राग, भोग, पूजन की अनुमति दी जाय। 01 जनवरी 1993 को न्यायमूर्ति हरिनाथ तिलहरी ने दर्शन-पूजन की अनुमति प्रदान की।

बाबरी ढ़ांचे के विध्वंस के बाद विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह प्रतिबंध न्यायालय में नहीं टिक सका और उसे हटाना पड़ा।

 

स्रोत:  विश्व हिन्दू परिषद


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