गिलहरी ने बनाया गौतम को भगवान बुद्ध -दिनेश मालवीय

गिलहरी ने बनाया गौतम को भगवान बुद्ध

-दिनेश मालवीय

बहुत मजबूत इरादा रखने वाले इंसान के को भी कभी-कभी निराशा आ घेरती है. वह अपनी कोशिश में कमज़ोर हो जाता है. ऐसी कई मिसालें मिलती हैं कि किसी बहुत महान व्यक्ति की महानता में किसी बहुत छोटे व्यक्ति की बहुत बड़ी भूमिका होती है.

इस सम्बन्ध में भगवान बुद्ध के जीवन की एक प्रेरक कथा मिलती है. ज्ञान की खोज में गौतम अपना घर छोड़कर वन में तपस्या करने गए. उन्होंने इतनी घोर तपस्या की, कि उनका शरीर सूखकर लकड़ी की तरह हो गया. इसके बाबजूद उन्हें ज्ञान की कोई झलक नहीं दिखाई दी. उनके मन में बहुत निराशा छ गयी. वह आत्महीनता में डूब गये. उन्हें लगा कि बेकार ही समय ख़राब किया. लिहाजा, उन्होंने घर लौटने का निश्चय किया.

घर के रास्ते में उन्हें एक बहुत बड़ा तालाब दिखा, जिसका पानी बहुत साफ़ था. वह पानी पीने के लिए झील के किनारे गए और पानी पीकर वहीँ आराम करने लगे. इसके बाद वह जब चलने लगे, तो उनकी नज़र एक गिलहरी पर पड़ी. वह झील में जाकर अपनी पूँछ भिगोकर झील का पानी बाहर छोड़ रही थी. उन्हें यह बात बड़ी अजीब लगी. उन्होंने गिलहरी से पूछा कि यह तुम क्या रही हो?

गिलहरी ने कहा कि इस झील में मेरे बच्चे बहकर मर गये. मैंने इस झील को सुखाकर इसका बदला लेने का संकल्प लिया है. वह बोले कि बिना किसी बर्तन के सिर्फ पूँछ से पानी निकाल कर तुम इतनी बड़ी झील को कैसे सुखा पायोगी? तुम्हारी उम्र है ही कितनी? इस काम में तो अनेक युग लग जाएँगे. गिलहरी ने कहा कि झील कब सूखेगी, यह मुझे नहीं मालूम. मुझे इसकी  कोई चिंता भी नहीं है. मेरा काम मेहनत करना है, जो मैं करती जा रही हूँ. जीवन के अंतिम क्षण तक मैं यह करती रहूंगी.

यह बात सुनकर गौतम को बहुत आश्चर्य हुआ. उनके मन में बेचैनी होने लगी. उन्हें लगा कि जब यह छोटी-सी गिलहरी अपनी इतने छोटे साधन से इस संभव काम को करते हुए हिम्मत नहीं हार रही, तो मैं क्यों अपने मार्ग को छोडूँ? उसकी बात से प्रेरित होकर गौतम फिर से तपस्या करने लौट गये और बुद्धत्व प्राप्त कर भगवान् बुद्ध बन गये.


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