आश्चर्य ही आश्चर्य, पर आश्चर्य न होना सबसे बड़ा आश्चर्य -दिनेश मालवीय

आश्चर्य ही आश्चर्य, पर आश्चर्य न होना सबसे बड़ा आश्चर्य

-दिनेश मालवीय

हम ज़रा अपने विचारों के बेलगाम घोड़ों को कुछ घड़ी थामकर अपने आसपास देखें तो पाएँगे कि चारों तरफ अद्भुत आश्चर्य ही आश्चर्य बिखरे पड़े हैं. लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि हमें इन आश्चर्यों पर आश्चर्य ही नहीं होता. आश्चर्य हो भी कैसे? आश्चर्य जैसे कुछ दिखना भी तो चाहिए! आश्चर्यों को देखने के लिए जिस समझ और दृष्टि की ज़रुरत होती है, वह अधिकतर लोगों के पास होकर भी नहीं होती. अर्थात होती तो है, लेकिन वे उसका उपयोग ही नहीं करते.

हमारा अपना शरीर ही हजारों आश्चर्यों से भरा है. इसकी चर्चा मैं अपने एक ब्लॉग में बहुत विस्तार से कर चुका हूँ. भारत का चिन्तन कहता है कि जो ब्रह्माण्ड में हैं, वह सब हमारे शरीर में हैं और जो हमारे शरीर में है, वह ब्रह्माण्ड में भी है. हम से अलग कुछ भी नहीं है. हम ज़रा ध्यान से देखे और सोचें कि हमारे आसपास हर घड़ी क्या-क्या घाट रहा है. एक छोटा-सा बीज देखते ही देखते विशाल पेड़ बन जाता है. हम जमीन में मुट्ठी भर बीज बोते हैं और उनसे कई हज़ार गुना अनाज, फल, फूल आदि उग आते हैं. वीर्य के एक छोटे-से अंश से बच्चे का जन्म होता है और वह धीरे-धीरे बढ़ता हुआ पूर्ण पुरुष या स्त्री बन जाता है. हज़ारों तरह के फूल खिलते हैं. उनके अलग-अलग रंग और खुशबू होती हैं. अनेक तरह के अनाज उत्पन्न होते हैं. मनुष्य के हज़ारों तरह के स्वभाव और प्रवृत्तियां हैं. हर जीव का अपना अलग स्वभाव है.

सूर्य रोजाना अपने समय पर उगता है, चन्द्रमा अपने समय पर दिखाई देने लगता है, आकाश में अरबों-खरबों तारे, ग्रह-नक्षत्र हैं, आकाशगंगाएं हैं. ग्रह एक-दूसरे के चक्कर लगा रहे हैं. ऐसी अनेक नदियाँ हैं, जिनसे चौबीसों घंटे पानी बहता रहता है. यह हज़ारों साल से बह रहा है, लेकिन इसमें कमी नहीं आयी. बड़े-छोटे पर्वत हैं, उनपर हज़ारों तरह की वनस्पतियाँ हैं, जिनके अपने-अपने गुणधर्म हैं.

 लाखों तरह के जीव-जंतु हैं. भारत के दर्शन में चौरासी लाग योनियाँ बतायी गयी हैं. यह बात अब वैज्ञानिक रूप से भी साबित होने लगी है, कि योनियाँ यानी sub-human species की संख्या लगभग इतनी ही होनी चाहिए. हाथी जैसे विशालकाय जीव हैं, तो ऐसे सूक्ष्म जीव भी हैं, जो हमारी भौतिक आँखों से आसानी से दिखायी नहीं देते. ऐसे भी प्रमाण हैं कि पहले डायनासोर रहे हैं, जो हाथी से भी कई गुना बड़े थे. एक जीव दूसरे जीव का भोजन बना हुआ है.

अनंत आकाश है. आवारा उड़ते बादल हैं. अथाह समुद्र हैं. समुद्र में करोड़ों जीव-जंतु हैं. बादल समुद्र से खारा पानी लेकर आते हैं और उसे मीठा बनाकर वर्षा के रूप में बरसा देते हैं. इससे सारी वनस्पतियाँ जीवन पा जाती हैं. खेती-बाड़ी संभव हो पाती है और पीने के लिए जल उपलब्ध हो जाता है. यह सब कैसी पक्की व्यवस्था है! यह सब कैसे हो रहा है? सारा जीवन-चक्र बहुत व्यवस्थित तरीके से घूम रहा है. लोग पैदा हो रहे हैं, मर रहे हैं. बच्चे, किशोर हो रहे हैं तो किशोर जवान और जवान बूढ़े हो रहे हैं.

करोड़ों मील दूर सूर्य हमारी धरती को आग की तरह तपा देता है. सूर्य को ही जीवनदाता माना गया है. खगोलशास्त्रियों का कहना है कि ऐसे अनेक सूर्य हैं और एक महासूर्य भी है, जिसके सामने हमें दिखाई देने वाला सूर्य कुछ भी नहीं है. सूर्य के विषय में तो बहुत अनूठी और अविश्वसनीय लगने वाली बातें तथ्यगत रूप से प्रमाणित हैं. धरती गोल घूमकर सूर्य के चक्कर लगा रही है, जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है. हमारी साँस आ रही है, जा रही है. इसी पर हमारा जीवन और मृत्यु निर्भर है. शरीर में हजारों नस-नाड़ियों से रक्त प्रवाह हो रहा है. हम रोजाना बड़े होते हैं, लेकिन हमें पता ही नहीं चलता. हमारे भीतर एक अंश हर पल मर रहा है, लेकिन हम नहीं जान पाते.

ये सब आश्चर्य तो वे हैं, जो हमारी आँखों के सामने हैं, लेकिन हम उनपर कभी ध्यान नहीं देते, उन पर कभी नहीं सोचते. लेकिन ऐसे असंख्य आश्चर्य हैं, जो हमें बहुत कोशिश करने पर भी दिखाई नहीं दे सकते. जैसे, मनुष्य के भीतर ऐसी क्या चीज है, जिसके निकलते ही उसका शरीर मिट्टी हो जाता है, सड़ने लगता है और उसके सारे अंग-प्रत्यंग किसी काम के नहीं रह जाते. उसे सबसे अधिक प्रेम करने वाले ही उसे शमशान में जला आते हैं या दफन कर देते हैं. इस तत्व को जानने की कोशिश न जाने कब से चल रही है, लेकिन कोई नहीं जान सका.

युद्ध हो रहे हैं, जिनमें बहुत बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं. कैसा आश्चर्य है कि एक व्यक्ति के आह्वान पर हज़ारों-लाखों लोग अपनी जान हथेली पर लेकर लड़ाई में उतर जाते हैं. हिंसा है, अहिंसा है, उपद्रव हैं, शान्ति है, प्रेम है, नफरत है, आसक्ति है, अनासक्ति है, राग है,, द्वेष हैं, धर्म है, अधर्म है, अनंत प्रकार के परस्पर विरोधी भाव हैं.

अदृश्य जीवों के बारे में भी बहुत कुछ लिख-पढ़ा और सुना जा चुका है. कुछ लोग उन्हें देखने और अनुभव करने का दावा करते हैं, तो कुछ लोग उनके अस्तित्व को सिरे से नकारते हैं. हमें हमेशा ऐसा लगता है कि यदि हम कहीं अकेले हैं, तो हम अकेले ही हैं. लेकिन इसकी संभावना भी बहुत कम है. हमारे पास ऐसा बहुत कुछ मौजूद होता है, जो हमें अपनी भौतिक आँखों से दिखाई नहीं देता. कभी कुछ चेतन अवस्था में हम उनकी उपस्थति महसूस अवश्य करते हैं, लेकिन उसे शब्दों में नहीं बता पाते. पल-पल सबकुछ परिवर्तित हो रहा है. कहते हैं कि आज जहाँ बड़े पहाड़ हैं, वहाँ कभी समुद्र होता था और आज जहाँ समुद्र है, वहाँ आज पहाड़ हैं.

और क्या-क्या कहा जाए! लेकिन परमतत्व का अनुभव करने वाले संतों और ऋषियों ने यह अवश्य कहा है कि मनुष्य के भीतर आश्चर्य का भाव उसी तरह बना रहना चाहिए, जैसे किसी बालक में होता है. जिस व्यक्ति के भीतर आश्चर्य का भाव नहीं होता, उसे जड़बुद्धि और संवेदनहीन कहा गया है. ऐसे व्यक्ति के जीवन को सार्थक भी नहीं माना गया है.

लिहाजा हमें जीवन की सारी व्यस्तताओं और आपाधापियों के बीच आश्चचर्य के भाव को जीवित रखना चाहिए. यदि यह बहुत कठिन लगता हो, तो बीच-बीच में किसी अच्छे प्राकृतिक स्थान पर जाकर इसका अभ्यास करना चाहिए.

महाभारत में युधिष्ठिर से यक्ष ने प्रश्न किया कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा कि सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मनुष्य अपने चारों ओर लोगों को मरते देखता है, लेकिन उसे यही लगता है कि वह नहीं मरेगा. बहरहाल, अपने आश्चर्य-बोध को जीवित रखिये. इसके बाद जीवन का आनंद कई गुना बढ़ जाएगा. आपको लगने लगेगा कि आप सबकुछ करते हुए भी कुछ नहीं कर रहे . सबकुछ बस हो रहा है; आप या कोई और सिर्फ माध्यम है. धर्म और अध्यात्म की यही परम अवस्था है. लिहाजा आश्चर्य करिए और जीवनभर करते रहिये.


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