दुनिया बदली, ये न बदले, आज भी मध्ययुगीन मानसिकता में जी रहे हैं कई लोग.. दिनेश मालवीय

दुनिया बदली, ये न बदले, आज भी मध्ययुगीन मानसिकता में जी रहे हैं कई लोग.. दिनेश मालवीय
dineshआज 21वीं सदी का लगभग चौथाई भाग निकलने वाला है और आज भी मध्य युग की मानसिकता में जीने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है. दुनिया में ज्ञान-विज्ञान और दूसरे क्षेत्रों में जो भी प्रगति हुयी है, वे उससे पूरी तरह अप्रभावित हैं. खबर छपी है कि, सीनियर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के नेता अनस हक्कानी ने महमूद गजनवी की तारीफ़ के पुल बांधे हैं. उन्होंने महमूद की तारीफ़ इसलिए की कि, 11वीं सदी के प्रारंभ में उसने सोमनाथ मंदिर को लूटा और वहां प्रतिष्ठित प्रतिमा को तोड़ा था.  हक्कानी बुधवार को महमूद गजनवी की कब्र पर गए थे. अब बताइये कि, तालिबान और तालिबानी सोच रखने वाले लोग किस युग में जी रहे हैं ? ये लोग तो स्पष्ट रूप से ऐसा कर रहे है, लेकिन मन ही मन महमूद की तारीफ़ करने वालों और उसके इस नीच काम पर पर सहमत होने वाले लोगों की तादाद भी कम नहीं है. एक लुटेरे ने सोमनाथ मंदिर की संपदा को लूटा और एक शांतिप्रिय धर्म के सबसे महान देवता की प्रतिमा को खंडित किया, यह उन्हें काबिले-तारीफ़ बात लगती है.


लूटपाट और हत्याएं करना तो लुटेरों का बहुत पुराना खेल है. जो भी राजा या राज्य हार जाता है या कमज़ोर होता है, वहां ये लोग हिंसा,अत्याचार और अनाचार का खुला खेल खेलते ही रहे हैं. लेकिन यह क्या बात हुयी कि, किसी धर्म के आराध्य देव की प्रतिमा को खंडित कर दिया जाए या उनके धर्मस्थलों को तोड़ दिया जाये या उनके स्थान पर अपने धर्मस्थल बना दिए जाएँ. यह और भी आपत्तिजनक और अनुचित तब हो जाता है, जब ऐसा करने वाला यह कहता है कि, हमारे मजहब में मूर्तिपूजा करने की मनाही है. यदि आपके मजहब में मनाही है, तो आप मूर्तिपूजा बिल्कुल नहीं कीजिए. आपको ऐसा करने से कौन रोक रहा है ? लेकिन आप किसी और को भी ऐसा नहीं करने देंगे, यह तो सरासर गुंडागर्दी और मानवताविरोधी बता है. जिन लोगों ने अपने मजहब की आड़ लेकर ऐसा किया और जो लोग इसको सही ठहरा रहे हैं, वे मूर्तिपूजा का विज्ञान ही नहीं जानते. यह सनातन धर्म की एक ऎसी व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति को ईश्वर कि ओर स्टेप बाई स्टेप आगे बढ़ने की सुविधा दी गयी है. सनातन धर्म में ही अनेक ऐसी शाखाएं और सम्प्रदाय हैं, जो मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते. आयर समाज, राधास्वामी, सहित अनेक ऐसे सम्प्रदाय हैं.




शिवपुराण के एक श्लोक के अनुसार-“ईश्वर की विद्यमानता की वास्तविक अनुभूति ही उत्तम स्थिति है. दूसरा दर्जा ध्यान और चिन्तन का है. तीसरा स्तर प्रतीकों की आराधना का है, जिससे सर्वशक्तिमान का स्मरण होता है. चौथा स्तर परम्पराओं और पवित्र स्थानों की तीर्थयात्रा का होता है. महान दार्शनिक डॉ. सर्पल्ली राधाकृष्णन के अनुसार-“ ऋग्वेद में मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं है. इसका प्रचलन बाद में आया है. इसे अपूर्ण विकास के स्तर के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है. मानव का रुझान सभी चीजों में ईश्वर को देखने का रहा है. वह ईश्वर को सचित्र रूप में समझता है. वह प्रतीक और कला के  बिना अपने  मानसिक दृष्टिकोण को व्यक्त नहीं कर सकता”. जो व्यक्ति मूर्ति या किसी अन्य प्रतीक के सामने जाता है, वह उसमें ईश्वर का भाव रखकर ही उसे प्रणाम करता है और उसकी पूजा-अर्चना करता है. वह पत्थर या धातु की पूजा थोड़े ही करता है. मूर्ति स्थापित कर उसकी विधिवत प्राणपतिष्ठा की जाती है. उसमें ईश्वर का भाव धारण करके उसकी पूजा की जाती है. हिन्दू धर्म में कोई भी चीज़ बलपूर्वक नहीं मनवाई जाती. व्यक्ति को क्रमिक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे कि वह आराधना के उच्च स्तर पर पहुंचकर ईश्वर के तात्विक स्वरूप की अनुभूति कर सके.




सनातन धर्म की इस सुविचारित और सुचिन्तित व्यवस्था को समझे बिना उसकी अवहेलना करना और अपने धर्म-मत को जबरदस्ती दूसरों पर थोपना अन्याय है. पैगम्बर साहब ने अरब में जब इस्लाम का  प्रवर्तन किया था, तब वहां बद्दू लोग बहुत जाहिल, गंवार, क्रूर  और पशुवत चेतना के लोग थे. वे 360 देवी-देवताओं की पूजा किया करते थे. पैगम्बर साहब ने उन्हें इससे रोका. उन्हें बताया कि ईश्वर एक है. उन्होंने कहा कि, जो लोग इसे नहीं मानते, उनसे इसे मनवाओ. यह बात उन्हीं लोगों के लिए थी. यह बात भारत की साकार उपासना प्रतिमा पूजन पद्यति से एकदम अलग है. भारत के ऋषि और अन्य ज्ञानी लोग ईश्वर के तात्विक रूप को जानते थे. लेकिन उन्हें यह भी अहसास था कि, साधारण समझ रखने वाले लोग एकदम निराकार ब्रह्म की अवधारणा को नहीं समझ सकते. उन्होंने ऐसे लोगों के लिए प्रतीक पूजा की व्यवस्था विकसित की, ताकि लोग अपने स्तर पर ईश्वर से किसी न किसी तरह जुड़े रहें. पूजा करने वाला भी जानता है कि, प्रतिमा के माध्यम से उसके द्वारा कि जाने वाली पूजा परब्रह्म परमेश्वर की ही पूजा है. जिन लोगों ने भी भारत में या कहीं भी मंदिरों और मूर्तियों को खंडित किया, वे धार्मिक लोग कतई नहीं थे. वे अपने धर्म को भी नहीं समझते थे.



जो व्यक्ति अपने धर्म को ठीक से समझकर उस पर निष्ठा से आचरण करता है, वह सभी धर्मों और साधना पद्यतियों का आदर करता है. जिन लोगों ने ऐसा किया, उन्होंने कोई इस्लाम  का भला नहीं किया और जो लोग आज भी ऎसी सोच रखते हैं, वे अपने मजहब का नाम ही खराब कर रहे हैं.  इस विषय में हिन्दुओं की सोच बहुत व्यापक है. चिन्तन की व्यापकता और सभी धर्मों के प्रति आदर हिन्दुओं को उनके पूर्वज ऋषियों की देन है. हक्कानी अगर महमूद की तारीफ़ करें, तो उन्हें कौन रोक सकता है? कोई भी किसी की भी तारीफ़ कर सकता है. पूरी दुनिया में सब जगह बुरे से बुरे व्यक्ति की तारीफ़ करने वाले भी मिलते हैं. भारत में ही रावण की तारीफ़ और उसका महिमामंडन करने वाले कई लोग हैं. लेकिन रावण को भारतीय जनमानस से कभी अपना आदर्श नहीं माना. उसके आदर्श तो सबसे प्रेम और समानता का व्यवहार करने वाले परम न्यायप्रिय श्रीराम ही हैं और रहेंगे. आशा की जानी चाहिए कि, हक्कानी की सोच से इत्तेफाक रखने वाले कुछ लोग तो हो सकते हैं, लेकिन सभी मुस्लिम नहीं हैं.



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