विराट का कोहेड़ा : क्या चौदह लोक के इस ब्रह्मांड की गति ही उल्टी है?

विराट का कोहेड़ा

 

"वैराट का फेर उलटा, मूल है आकाश।

डारें पसरी पाताल में, यो कहे वेद प्रकाश।।" 

चौदह लोक के इस ब्रह्मांड की गति ही उल्टी है। इस संसार रुपी वृक्ष का मूल या उत्पत्ति स्थान और जड़ें तो ऊपर अक्षर ब्रह्म में हैं तथा पत्ते और डालियों का फैलाव नीचे पाताल की ओर है। वेदों ने इस बात की स्पष्ट घोषणा की है।

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फल डार अगोचर, आड़ी अंतराय पाताल।

वैराट वेद दोऊ कोहेड़ा, गुंथी सो छल की जाल।। 

इस संसार रूपी वृक्ष के फल और शाखाएं अगोचर हैं। वे दिखाई नहीं देती हैं। आकाश से लेकर पाताल तक इसका फैलाव है। विराट और वेद दोनों एक ऐसी गुत्थी या उलझन के समान है जिसे स्वयं माया ने निर्मित किया है। इन्हें छलावे में फंसाने वाली जाली भी कर सकते हैं।

(वेद ने कर्मकांड में एवं जगत ने अपने आकर्षक मायावी रूप में संसार के लोगों को भ्रमित किया है)

महामंत्री प्राणनाथ जी कहते हैं कि हे ब्रह्मात्माओं तुम तो सुख में पड़ी थी लेकिन दुख का अनुभव दिखाने के लिए तुम्हारी ही जिद पर इस संसार की ऐसी भ्रमात्मक रचना की गई है। अब तुम्हारे लिए छल-बल युक्त मोहिनी माया की आंकड़ी या रहस्य को मैं स्पष्ट करता हूं।

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इस मायावी इंद्रजाल ने मानव को फंसाने के लिए बंधन या जाली की गांठ को इस तरह जोर से बांध दिया है कि उसे ही सुखद सत्य मानकर यहां के प्राणी, सत्य परमधम और आत्मा को असत्य और इस असत्य नश्वर शरीर एवं जगत को सत्य मान बैठे हैं। लोग आत्मा के सच्चे संबंध की अवहेलना करके मात्र शरीर से ही संबंध जोड़े रहते हैं। इस प्रकार, इस विश्व में अनेक प्रकार की विपरीत उलझाने वाली रीतियां हैं जिन से मनुष्य सदैव भ्रमित रहता है।

ब्रह्माँड के रहस्य

"सांचे को झूठा कहे, झूठे को कहे सांच।

सो भी देखाऊं जाहेर, सब रहे झूठे रांच।।" 

इस संसार में सत्य आत्मा को असत्य, परमधाम को काल्पनिक और झूठे स्वप्नवत पिंड ब्रह्मांड को सत्य मानते हैं। यह भी मैं प्रत्यक्ष दिखाता हूं कि असत्य में लोग कैसे मगन और एकरस हो रहे हैं।

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"आकार को निराकार कहे, निराकार को आकार।

आप फिरे सब देखें फिरते, असत यों निरधार।।" 

यथार्थ आकार, चिन्मय स्वरूप ब्रह्म को निराकार कहते हैं और पल-पल मिटने वाले पिंड को साकार समझते हैं। काल के चक्र में घूमने वालों को सब कुछ घूमता हुआ ही दिखाई देता है। निश्चित ही यह सब विस्तार असत्य ही है।

"मूल बिना वैराट खड़ा, यों कहे सब संसार।

तो ख्वाब के जो दम आपे, ताए क्यों कहिए आकार।।" 

बिना मूल या आधार के ही यह ब्रह्मांड खड़ा है, संसार के सब लोग ऐसा कहते हैं। स्वप्न के समान अस्तित्वहीन, पल-पल बदलते रूप वाले संसार को किस रूप वाला या साकार कैसे कहा जाए ?

"आकार न कहिए तिनको, काल को जो ग्रास।

काल सो निराकार है, आकार सदा अविनाश।।" 

काल के प्रभाव में रहने से जिसकी मृत्यु हो जाए, उसे आकारवान नहीं कहना चाहिए। क्योंकि काल (नश्वर) तो स्वयं निराकार होता है। जबकि सत्य स्वरूपवान का कभी नाश नहीं होता है।

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बजरंग लाल शर्मा, चिड़ावा

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