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असली साधू-संत की पहचान क्या है? नानक ने बताये संत के गुण

असली साधू-संत की पहचान क्या है? नानक ने बताये संत के गुण

 

एक बार गुरु नानक पानीपत गए|  पानीपत में एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े संत कहलाते हैं लेकिन आपने अपने बाल नहीं  मुड़ाये? न ही आपने संतो जैसे कपड़े पहने ? गुरु नानक ने कहा मुड़ाना तो मन को चाहिए| दूसरी बात कोई व्यक्ति किसी खास तरह की वेशभूषा पहनकर संत नहीं हो जाता|
जो व्यक्ति अपने सुख और अहंकार को छोड़कर परमात्मा की शरण में चला जाता है वह कैसे भी कपड़े पहने ईश्वर उसे स्वीकार कर लेते हैं| इसके बाद उस व्यक्ति ने पूछा आप किस जाति से है? गुरु नानक बोले मेरी जाति वही है जो आग और वायु की है| आग और वायु दुश्मन और दोस्त, दोनों को समान  समझते हैं| उस व्यक्ति ने फिर पूछा आपका धर्म क्या है? गुरु नानक बोले मेरा धर्म है सत्य का मार्ग| मैं एक पेड़ और धरती की तरह रहता हूँ| नदी की तरह मुझे इस बात की चिंता नहीं रहती कि कोई मुझ मैं फूल फेकता है या कचरा|
यह बात आज भी लागू होती है आज न जाने कितने लोग खास तरह की वेशभूषा पहनकर,दाढ़ी बढ़ाकर या सिर मुंडाकर अपने आप को साधु और संत कह रहे हैं लोग भी उन्हें उसी तरह पूज रहे हैं| लेकिन क्या यह साधु संत बुद्ध महावीर नानक कबीर महर्षि अरविंद, प्रभुपाद, स्वामी विवेकानंद,रामकृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती,स्वामी शिवानंद,स्वामी रामतीर्थ, रामानुज , माधवाचार्य , विष्णुतीर्थ , रामानन्दा, चैतन्य महाप्रभु की तरह कोई उदाहरण पेश कर रहे हैं|
साधु और संत इन दोनों शब्दों में थोडा भेद है|  एक व्यक्ति जो सत्य की खोज में निकल पड़ता है वह साधु है|  जो साधु सत्य को प्राप्त करके परोपकार और समाज कल्याण का कार्य करता है वह संत है|
कबीर कहते हैं कि जिसका कोई दुश्मन नहीं है जिसकी कोई कामना नहीं है जो ईश्वर और ईश्वर की सृष्टि से प्रेम करता है,विषय वासनाओं से दूर है वही संत है|
साधु यानी सत्य की साधना करने वाला अच्छे गुणों को अपनाकर सत्य की खोज में निकल पढ़ने वाला|

साधु या संत किसी खास तरह लुक या कॉस्टयूम का मोहताज नहीं है| साधुता या संतत्व एक मौलिक गुण है, एक स्वभाव है|

साधु संतों का काम किसी धर्म, मत, संप्रदाय, विधि, परंपरा को थोपना नहीं है| इनका काम है लोगों की संकुचित विचारधारा को खत्म कर उन्हें समभाव में स्थित करना| सत्य के मार्ग पर चलाना|

सांसारिक दुखों से घबराकर घर से भागने वाले चोलाधारी व्यक्ति को साधू या संत नहीं कहा जा सकता| न ही इधर उधर से ज्ञान बटोरकर अधूरा ज्ञान बांटकर अपनी कामनायें पूरी करने वाला संत है|

ATUL VINOD



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