किचिन को पवित्र रखना क्यों ज़रूरी है, क्या प्रेत और बुरी आत्माओं की भोजन पर रहती है नज़र.. दिनेश मालवीय

किचिन को पवित्र रखना क्यों ज़रूरी है, क्या प्रेत और बुरी आत्माओं की भोजन पर रहती है नज़र.. दिनेश मालवीय
dineshहम धार्मिक और आध्यात्मिक प्रसंगों के साथ ही, सुखी जीवन के लिये सूत्रों की भी चर्चा करते हैं। हमारे ऋषि मुनियों और पूर्वजों ने अपनी साधना, सूक्ष्म जगत के अध्ययन और व्यवहारिक अनुभव के आधार पर कुछ ऐसे सूत्र बताये हैं, जिन्हें अपनाकर हम बहुत सी कठिनाइयों से बच सकते हैं। उन्होंने जीवन को कम्पार्टमेन्ट्स मे विभाजित करके नहीं, बल्कि एक समग्र इकाई के रूप मे समझा है। उनके अनुसार आध्यात्मिक और लौकिक जीवन अलग न होकर एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।


भोजन को ही लीजिये। हर  घर मे रोज़ाना समय भोजन बनता है। भोजन के बिना जीवन संभव नहीं है। हर व्यक्ति के घर मे उसकी आर्थिक स्थिति, उपलब्ध सामग्री और खानपान संबंधी परम्पराओं के अनुसार भोजन पकाया जाता है। इसमें तो कोई हार्ड एण्ड फास्ट नियम लागू नहीं हो सकते। लेकिन हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने भोजन से संबंधित कुछ ऐसे सूत्र बताये हैं, जिनका सब लोग आसानी से पालन कर सकते हैं।



सबसे बड़ा सूत्र-वाक्य तो यह बताया है कि "जैसा खाओ अन्न वैसा होये मन". यानी हमारे मन की अवस्था काफी हद तक हमारे द्वारा ग्रहण किये जाने वाले अन्न यानी भोजन पर निर्भर करती है। वह भोजन किस तरह से कमाये गये धन से बना है, कहाँ बना है,बनाने वाले की भोजन पकाते समय मन:स्थिति क्या थी और किस जगह खाया जा रहा है, यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।


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सनातन धर्मशास्त्रों ने इस विषय मे बहुत सावधान रहने की सलाह दी है। भोजन से हमारे प्राणों की पुष्टि होती है। इसी पर हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का निर्धारण होता है। भारत मे तो आहारशुद्धि पर स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। शास्त्रों मे भोजन की सात्विकता पर बहुत ज़ोर दिया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रमद्भगतगीता के सत्रहवें अध्याय मे सात्विक भोजन की व्याख्या की है। उनके अनुसार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य और प्रीति को बढ़ाने वाला रसयुक्त, चिकने भोजन सात्विक है। सात्विकता से तात्पर्य है ऐसा भोजन जो आसानी से पच जाये। इसमे ईमानदारी से कमाये गये धन के उपयोग पर भी बल दिया गया है।



सनातन धर्मशास्त्रों मे भोजन पकाने की प्रक्रिया को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने को कहा गया है। इसमें आंतरिक के साथ ही बाहरी शुद्धि को समान रूप से महत्व दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार अनेक तरह के अदृशय भूत प्रेत आदि वायुप्रधान शरीरों मे रहते हैं। भूखे होने के कारण वे हर एक भोजन पर नज़र रखते हैं। अपवित्र स्थानों पर उनकी ताक़त बढ़ जाती है। लिहाजा वे अपवित्र स्थान पर और अपवित्र व्यक्ति द्वारा पकाये गये भोजन को अपनी नज़र से और उसे छूकर दूषित कर देते हैं। ऐसे अन्न के कारण भोजन की आध्यात्मिक पवित्रता तो नष्ट होती ही है, साथ ही खाने वाले पर अनेक तरह की बीमारियों के हमले होते रहते हैं। इनसे बचने के लिये किचिन को सिर्फ साफसुथरा रखना काफी नहीं है। वहाँ पवित्रता भी भी अनिवार्य है।



पकाये हुये भोजन मे से गाय, कुत्ते आदि जीवों का हिस्सा रखा जाना चाहिये। यह यज्ञ की श्रेणी मे आता है। ऐसा करने वाले परिवारों मे बीमरियां नहीं के बराबर होती हैं। भोजन कहाँ और किसके यहाँ या किसके साथ करना चाहिए इसके लिये अनेक तरह के विधि निषेध हैं। इसका कारण व्यवहारिक पक्ष है। लोग अलग अलग तरह के स्वभाव वाले होते हैं। सबके खानपान मे भिन्नता होती है। लिहाजा यही उचित है कि अपने समान लोगों के यहाँ और उनके साथ ही भोजन किया जाये। इसमे जाति और वर्ण का भेद करना ग़लत है। यदि किसी का खानपान और स्वभाव आपसे मेल खाता है, तो उसके यहाँ और उसके साथ भोजन करने मे कोई बुराई नहीं है। भोजन के संबंध मे हम अफने शास्त्रों मे बताये गये इन नियमों का पालन कर स्वयं को और अपने परिवार को स्वस्थ और सुखी कर सकते हैं।


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