श्रीकृष्णार्पणमस्तु के संबंध में- न्यूज़ पुराण विशेष

श्रीकृष्णार्पणमस्तु के संबंध में
रमेश तिवारी
गहन, गंभीर और सारगर्भित अध्ययन के पश्चात, श्री कृष्ण के संबंध में कुछ अंतर्कथाओं की श्रृंखला प्रारम्भ करने जा रहा हूँ। कथा का प्रारंभ इस जिज्ञासा के साथ करते हैं कि क्या कोई, व्यक्ति, श्रीकृष्ण बन सकता है! 

"श्रीकृष्णार्पणमस्तु" को पढ़कर आप स्वयं भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं। "चमत्कार" रातों रात नहीं होते। बिजली तड़क रही थी। वर्षा इतनी कि लग रहा था कि बादल फट जायेंगे। मूसलाधार ही नहीं वर्षा तो धाराशाह थी। सीमायें तोड़ती यमुना के जल के स्वर डरा रहे थे। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों में मथुरा के यदुमहल कारागार में जन्मा एक शिशु कुछ ही मिनिटों में गोकुल में पहुंचा दिया जाता है। वही शिशु, हमारा कन्हैया, श्याम।

नंद के घर हर क्षण मृत्यु के भय में जीवित रहे| श्रीकृष्ण को एक षडय़ंत्र के अंतर्गत गोकुल से मथुरा लाया गया। यहीं से किशोर वय श्रीकृष्ण का जीवन संघर्ष प्रारंभ हो गया। मथुरा में मल्ल युद्ध, कंस वध, जरासंध का कोप, मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण को निष्प्रभावी करना, जरासंध जैसे समर्थ सम्राट को गोमान्तक (गोवा) तक पीछा करने पर बाध्य करके, पराजित करना, किशोर कृष्ण की बौद्धिक क्षमताओं का प्रमाण बना। श्रीकृष्ण के अप्रितिम बौद्धिक चातुर्य को देखकर महान परशुराम ने कृष्ण को चक्र सुदर्शन सौंप दिया! फिर तो कृष्ण अजेय ही हो गये मानो। वे मथुरा से दण्डकारण्य होकर गोवा पहुँचे थे और, लौटते हुए उन्होंने अत्याचारी, करवीरपुर (कोल्हापुर), पद्मावत के मांडलिक(करद) राजा श्रगाल का वध किया। 

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किंतु अन्य मार्गस्थ राजाओं से मैत्री संबंध भी स्थापित करते आये। आक्रमणों से जर्जर हुई| मथुरा को द्वारिका में पुन:स्थापित करना, श्रीकृष्ण की महान दृष्टि थी। इन घटनाओं के बाद वे उज्जैन के अंकपाद आश्रम में सांदीपनि से शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा सहित तत्व ज्ञान प्राप्त करने पहुंचे। उन्होंने प्रथम बार श्वेत सागर (अरब सागर) के दर्शन ही नहीं किये वरन् गुरुमाता को दिये अपने वचन के अनुसार वहां शंखासुर नामक असुर का वध कर गुरु पुत्र पुनर्दत्त को मुक्त करवाया। और फिर तो अन्याय के विरुद्ध श्रीकृष्ण का आर्यावर्त में खुला संघर्ष प्रारंभ हो गया।

श्रीकृष्ण ने जीवन को व्यवहारिकता से जिया। वे जब यादवों को सुरक्षित द्वारिका ले जा रहे थे| तब घात लगाये बैठे कालरुप कालयवन का भी उन्होंने चतुराई पूर्वक ऋषि मुचकुंद के श्राप से धवलपुर (धौलपुर) में वध करवा दिया। और द्वारिका में जब उनको कामरूप (असम, अहोम) में नारी अत्याचार की प्रथम शिकायत प्राप्त हुई। वे बिना बुलाये ही अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ ससैन्य जा धमके। श्रीकृष्ण ने वहां के नृशंस राजा भौमासुर (नरकासुर) का वध किया। 16000 बंदी स्त्रियों को कारागार से मुक्त किया। यही नहीं श्रीकृष्ण ने उन स्त्रियों को सम्मान देने की दृष्टि से सभी को सामूहिक रुप से पत्नी का स्थान देकर द्वारिका भेज दिया। और वहां से जगन्नाथपुरी और श्रावस्ती होते हुए अकेले ही उद्वव के साथ अमरनाथ चले गये। श्रीकृष्ण की दूरदृष्टि का आलम यह कि वे जिन राज्यों से निकलते थे, सभी से मैत्री संबंध स्थापित करते जाते थे। और तो और जब वे अमरनाथ से द्वारिका के लिए लौटे, तब भी अर्बुद (माउंट आबू) होकर अनेक राजाओं से मैत्री संबंध स्थापित करने से न चूके ।

श्रीकृष्ण के साहस और युक्ति का बेमिसाल उदाहरण तो यह था कि वे शस्त्र रहित भीम और अर्जुन को लेकर जरासंध की छाती पर जा चढे़। निदान यह कि उन्होंने भीम से उसका वध करवा दिया। धर्म (सत्य) के आगे वे रिश्ते और नातों को भी थता बता देते थे। उनसे बैर रखने वाले भले ही वे सगी भुआओं के पुत्र, श्रतश्रवा का पुत्र शिशुपाल और श्रतदेवी के पुत्र दंतवक्र और विदूरथ ही क्यों न हों, जीवित नहीं छोडे़। जबकि कौरवों के अन्याय के परिणाम भोगी पांडवोँ के पीछे चट्टान की भांति अडिग खड़े रहते रहे। कृष्ण की नकल करने वाले जरासंध समर्थक राजा पौंडृ, जो स्वयं को भगवान वासुदेव कहता था, का वध करने बंगाल तक पहुंच गये। उन्होंने काशीे राजा को भी पौँडृ समर्थक होने का दण्ड दिया। किंतु फिर क्षमा माँगने पर मित्रता का दर्जा भी दे दिया।

वे पूरे जीवन में सर्वाधिक व्यथित तब हुए, जब युधिष्ठिर ने द्यूत (जुआ) में सब कुछ गंवा दिया। भुआ कुंती के कष्टकर जीवन को सुखी बनाने हेतु उन्होने कोई कसर नहीं छोड़ी। किंतु युधिष्ठिर जब, जिसे कृष्ण ने सम्राट बनवाया, जुआ में द्रोपदी सहित भाई और 8 दिन बाद पुन: इन्द्र प्रस्थ भी हार गया तो अंतर्मन से दुखी कृष्ण, वैराग्य लेकर ब्रह्मज्ञान की शिक्षा लेने घोर आंगिरस (जो जैन मुनि थे) के आश्रम प्रयाग पहुंच गये। मित्रो कृष्ण के चरित्र पर हजारों ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। महान विद्वानों ने लिखा है। किंतु श्री कृष्ण पर मेरी अलग दृष्टि है। यह विश्वास दिलाता हूंँ कि मेरी दृष्टि से श्रीकृष्ण की मर्यादा का दृश्य ही अलग होगा। आपको 100 दिनों तक अनुपम आनंद प्राप्त होगा।

आज की कथा बस यहीं तक तो मिलते हैं|   धन्यवाद |


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