ऐसा भी तो होता है न-हिंदी कविता-दिनेश मालवीय “अश्क”

ऐसा भी तो होता है न
छुप -छुप कर सुख रोता है न।

दुख सह सह कर, कोई
दुख – प्रेमी बन जाता
सुख ही सुख से कभी
किसी का मन भर जाता

कोई मरने का भी स्वप्न सँजोता है न
ऐसा भी तो होता है न

कभी किसीको रूप
नहीं अपना ही भाता
राह दिखाने वाला भी
पथ से भटकाता

नाविक भी तो नैया कभी डुबोता है न
ऐसा भी तो होता है न ।

विनती प्यासी धरती की
मेघा ठुकरा दे
और मदिरा भी शुष्क कंठ
की प्यास बढा दे

बहुत संयमी भी तो आपा खोता है न
ऐसा भी तो होता है न ।

दिवा अमावस लगे
मलिन सी लगे चाँदनी
कुटिया उत्सव छाये
हवेली लगे उन्मनी

मानव ख़ुद ही बीज दुखों के बोता है न
ऐसा भी तो होता है न।

दिनेश मालवीय “अश्क”

PURAN DESK



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