वास्तविक जीवन्त व सच्ची शिक्षा वह है जो बालक की सुप्त शक्तियों को जागृत करे|

वास्तविक जीवन्त व सच्ची शिक्षा वह है जो बालक की सुप्त शक्तियों को जागृत करे| अरविन्द ने Essays on the Gita Part-II में लिखा है,"बालक की शिक्षा को उसकी प्रकृति में जो कुछ भी सर्वोत्तम सर्वाधिक अन्तरंग व जीवन पूर्ण है, उसको व्यक्त करना चाहिए। 

श्री अरविन्द 

मनुष्य की क्रिया और विकास जिस साँचे में ढलने चाहिए, वह उसके अंतरंग गुण और शक्ति का साँचा हो। उसे नई वस्तुऐं अवश्य प्राप्त होनी चाहिए, परन्तु वह उनको सर्वोत्तम रूप से सबसे अधिक प्राणमय, स्वयं अपने विकास, प्रकार और अंतरंग शक्ति, के आधार पर प्राप्त हो।
ज्ञान पयोनिधि में संस्कार रूपी लहरों से प्रवाहित उत्तम शिक्षा रूपी रत्न का संचयकर्ता, जिसमे शिक्षक ऐसा माणिक्य हार बनाता है जिसको धारण करके विद्यार्थी आदर्श नागरिक बनता है। शिक्षा का सम्पूर्ण उददेश्य व्यक्ति के मानसिक विकास के लिए साधनों को जुटाना है वास्तविक शिक्षा व्यक्ति के चारित्रिक तथा मानसिक अनुशासन अपितु समालोचनात्मक विवेचन शक्ति के निर्माण में भी सहायता प्रदान करती है। 

विवेकपूर्ण निर्णय तथा गुण दोष विवेचन की शक्ति के विकास के अभाव में मानव एक यंत्र के समान समाज के हित अथवा अहित के लिए कार्य करने वाला हो जायेगा| उसे इस बात का भी ज्ञान नहीं होगा कि वह किस प्रकार उसका कार्य उत्तम या अधर्म हैं तथा वे किस प्रकार सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करते है।

शिक्षा व्यवस्था मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करती है तथा उसे निश्चित रूप से तर्कपूर्ण विवेचन की शक्ति प्रदान करती है। वस्तुतः वास्तविक शिक्षा का महत्त्व मानव के व्यक्तित्व को विकसित करने, व्यक्ति का सामाजीकरण करने, तथा इस प्रकार उसको समाज की जैविक तथा भौतिक संरचना के अनुकूल बनाता है।

शिक्षा के उचित आदर्शो में इन तीनों उद्देश्यों का समन्वय होना आवश्यक है। मानव चिंतन के इतिहास पर विहंगम दृष्टिपात करने पर यह विदित हो जाता है कि, जब-जब मानवीय चिंतन ने भौतिकता को अधिक महत्व दिया है तब-तब समस्त विश्व में नैतिक मूल्यों का हनन सामाजिक विघटन सुख-शान्ति का अभाव तथा विभिन्न कष्टों का आरम्भ हुआ है |

आज की वर्तमान परिस्थिति में समस्त विश्व में अत्यधिक विकट समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं| शिक्षा जो किसी भी समकालीन चिंतन का पहलू है साथ ही वह तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं तथा रीति-रिवाजों का ही अनुसरण करती है। अतः आज की शिक्षा व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।

आज ऐसे चिंतन की आवश्यकता है जो मानव का सही दिशा-निर्देशन कर सके। भारतीय षड्दर्शनों में भारतीय मुनी ऋषियों ने स्वस्थ एवं लोक मंगलकारी विचार व्यक्त किये है। वेदान्त, सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा तथा वैशेषिक ऐसे दार्शनिक सम्प्रदाय हैं। 

जिनमें शिक्षा को तो लोक मंगलकारी भावना से ही पूर्ण किया गया है,भारतीय दर्शनों में योग जहाँ अपनी वैज्ञानिक तत्त्व मीमांसा तथा मूल्य शास्त्र के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है वहीं वेदान्त अपने अध्यात्मिक मूल्यों तथा मानव जीवन की चरमोत्कर्ष परिणति आदि सिद्धांतों के लिए प्रसिद्ध है।

भारतीय शिक्षा का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। समय-समय पर विभिन्न दार्शनिकों ने अपने-अपने ढंग से शैक्षिक सन्दर्भ में ज्ञान का सुनियोजन व सहज संयोजन किया है। वैदिक परम्पराओं से लेकर आज तक की शैक्षिक पृष्ठभूमि का अध्ययन अनुशीलन करने पर अनेक ऐसे प्रबल सन्दर्भ व्यवहार में आते हैं |

जो अवसर के अनुरूप समाज की माँगों को पूरा करने के प्रमुख कारक बने हैं तथा उनका संयोजन ही राष्ट्र के निर्माणकारी अवस्था का मूल आधार रही है। इस शैक्षिक विकास यात्रा में महर्षि पतन्जलि और महर्षि अरविन्द घोष का योगदान अप्रतिम व अद्वितीय रहा है। इन दोनों शिक्षा मनीषियों ने राष्ट्र निर्माण की सूची परम्परा को अपने ढंग से अग्रेषित करते हुए शैक्षिक पृष्ठभूमि में अपनी अलग पताका फहराई है।

जहाँ पतंजलि ने अष्टांग योग पर आधारित भारतीय दर्शन के प्रसार पर बल दिया। वहीं महर्षि अरविन्द घोष ने सर्वांग योग में प्रयुक्त चारित्रिक सबलता व नैतिकता के महत्ता को सर्वोपरि सिद्ध किया है इन दोनों शिक्षा मनीषियों ने राष्ट्र निर्माण यज्ञ में अपने दिव्य ज्ञान से वह पुनीत समिधा समर्पित की जिसके पावन प्रज्ज्वलन और विशिष्ट सुगन्ध से मात्र भारतवर्ष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्य नवीन दिशा और उपयुक्त दिशा को प्राप्त कर सका। 

इन दोनों शिक्षाशास्त्रियों ने इन्द्रिय सुख भोग से परे अतीन्द्रिय जगत की उर्ध्व सत्ता के सत् अन्वेषण में अपनी वृत्ति लगाई तथा आनन्द के सृजन में संलग्न रहने हेतु अपने अनुयायिओं के साथ-साथ समस्त विश्व के सम्पूर्ण नागरिकों को पावन संदेश से आक्षादित किया "वास्तविक आनन्द को जान पाने के लिए बहुत गहराई तक जाना होता है।

आनन्द उत्तेजना भर नहीं है क्योंकि इसके लिए मन का असाधारण परिष्कार किया जाना आवश्यक है, क्योंकि हर कोई अपने स्वयं के लिए और अधिक की तलाश में लगा रहता है। इस प्रकार के आनन्द की अवस्था को कभी नहीं जान सकता, क्योंकि इसमें आनन्द उठाने वाला कोई नहीं होता है | इस अद्भुत बात को समझ लेना जरूरी है, नहीं तो जीवन अत्यन्त क्षुद्र, तुच्छ, और सतही बनकर रह जाता है|

तो जन्म लेना, क्लेश उठाते रहना, संतान उत्पन्न करना, उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना, धन कमाना, थोड़ा-बहुत बौद्धिक मनोरंजन करना और फिर मर जाना-जीवन यहीं तक सीमित होकर रह जाता है। श्री अरविन्द के अनुसार हमारी शिक्षा को आधुनिक जीवन की आवश्यकतानुसार होनी चाहिए। 

श्री अरविन्द ने शिक्षा को अति व्यापक और गतिशील रूप दिया है| उन्होंने इसकी व्याख्या प्राचीन भारतीय परम्परा के आधार पर की है। उनके शब्दों में "शिक्षा मानव के मस्तिष्क और आत्मा की शक्तियों का निर्माण करती है। यह ज्ञान, चरित्र और संस्कृति का उत्कर्ष करती है।



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