पांच राज्यों के चुनावों में इंडी गठबंधन केवल एक राज्य तमिलनाडु में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. बाकी राज्यों में सहयोगी ही आमने-सामने हैं. चुनाव के एग्जिट पोल सामने आ चुके हैं. संकेत यही है, कि परिणाम जो भी आएंगे उसके फॉल आउट में इंडी गठबंधन की पिंडी बिखर जाएगी..!!
अभी इंडी गठबंधन में लेफ्ट और टीएमसी दोनों शामिल हैं. महिला आरक्षण बिल पर जितने दलों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया है. वह चुनाव में बिखरे हुए हैं. बंगाल में राहुल गांधी ममता बनर्जी के खिलाफ जहर उगल रहे हैं. ममता बनर्जी तो कांग्रेस और राहुल गांधी को बंगाल में राजनीतिक रूप से महत्वहीन मानती हैं.
लेफ्ट के साथ राहुल गांधी की पार्टी का मुकाबला केरल में हो रहा है. एग्जिट पोल यह बता रहे हैं कि कांग्रेस के गठबंधन को फायदा हो सकता है. तमिलनाडु में ही गठबंधन में शामिल कांग्रेस और डीएमके मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.
एग्जिट पोल के जो भी नतीजे आए हैं उनका भरोसा नहीं किया जाए तो उनके संकेतों को समझा ही जा सकता है. यह संकेत बीजेपी के लिए उत्साहजनक दिखाई पड़ रहे है. असम में तीसरी बार उनकी सरकार बनने की संभावना बताई जा रही है. बंगाल में मुकाबला कश्मकश भरा है. एग्जिट पोल के नतीजे बीजेपी को उत्साह से भर रहे हैं. पहले भी एग्जिट पोल के नतीजे उलटते-पलटते रहे हैं. ईव्हीएम से परिणाम आने के बाद ही इनका भरोसा किया जा सकता है. केवल राजनीतिक विश्लेषण के लिए इन आंकड़ों का उपयोग अगर किया जाए तो यह तो दिख रहा है कि जहां कांग्रेस का सीधा बीजेपी से मुकाबला है. वहां कांग्रेस अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही है.
इन पांच राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी का मुकाबला असम में है. वहां के एग्जिट पोल के नतीजे तो यही बता रहे हैं, कि कांग्रेस बुरी तरह से पिछड़ रही है. असम में कांग्रेस के कैंपेन की इंचार्ज प्रियंका गांधी रहीं. यूपी में भी प्रियंका गांधी प्रभारी होने के बाद भी कुछ नहीं कर सकी थीं. अब असम में भी ऐसा ही दिखाई पड़ रहा है. उत्तर भारत में तो कांग्रेस बीजेपी का मुकाबला करने में तो पूरी तरह से अक्षम साबित हो रही है.
जिन राज्यों में बीजेपी को क्षेत्रीय दल चुनौती दे रहे हैं, वहां कांग्रेस की भूमिका पर कई सवाल खड़े हैं. राहुल गांधी बंगाल में वही भाषा बोल रहे हैं, जो ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा बोल रही है. सवाल यह है कि जब कांग्रेस का बंगाल में कोई वजूद ही नहीं है तो फिर राहुल गांधी ममता के विरोध में रैली करके उनके खिलाफ जो भी अभियान चला रहे हैं, इसका फायदा तो बीजेपी को ही मिलेगा.
ममता बनर्जी शुरू से ही राहुल गांधी की लीडरशिप पर सवाल खड़े करती रही हैं. उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन में चुनाव नहीं लड़ा. इंडी गठबंधन का उपयोग अब केवल मोदी और बीजेपी के विरोध में सामूहिक ताकत दिखाने का है. यह केवल दिल्ली में उपयोग करने के लिए बची है.
केरल में लेफ्ट पराजित होता है, तो निश्चित रूप से दिल्ली में इंडी गठबंधन इससे प्रभावित हो सकता है. इसके पहले गठबंधन में शामिल आम आदमी पार्टी इससे बाहर हो चुकी है. गुजरात में अभी हाल ही में पंचायत और निकायों के चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से पराजित हुई. गुजरात में बीजेपी दशकों से शासन में है. निश्चित रूप से सत्ता विरोधी रुझान भी होगा, लेकिन कांग्रेस में ऐसी ताकत नहीं बची है, कि वह एंटी-इनकमवैंसी को भी बीजेपी के खिलाफ भुना सके. कांग्रेस की तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति बीजेपी के लिए दूसरे समुदाय के ध्रुवीकरण का काम करती है. जो सबसे पहले गुजरात में शुरु हुआ था. अब वह उत्तर भारत के राज्यों में स्थापित हो चुका है. अब इसका विस्तार दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में हो रहा है. असम में भी इसी का प्रभाव देखा जा सकता है.
केरलम में भी बीजेपी अपना जनाधार बढ़ा रही है. केरलम की राजधानी त्रिवेंद्रम में बीजेपी का महापौर बनना बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. इस विधानसभा चुनाव में निश्चित रूप से बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो फिर अगले चुनाव तक लेफ्ट वहां से गायब हो सकता है और मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच सिमट सकता है. ऐसी स्थिति बनने पर बीजेपी की ग्रोथ को अचानक बूस्ट मिल सकता है.
कांग्रेस तो अपनी हार की भी समीक्षा नहीं करती. दूसरी तरफ बीजेपी अपनी जीत के कारणों की भी समीक्षा करती है. उसी समीक्षा पर काम करना उसकी ताकत है. इसीलिए राज्य दर राज्य कांग्रेस को पछाड़ते हुए, वह आगे बढ़ रही है. एक और ट्रेंड कांग्रेस के खिलाफ जाता है कि उनकी सरकारें जिस राज्य में बन जाती हैं, वह अक्सर दोबारा रिपीट नहीं होतीं. इसके विपरीत बीजेपी की सरकारें प्रोइनकमवैंसी के चलते कई बार रिपीट होती हैं.
राज्य दर राज्य कांग्रेस बीजेपी को न केवल वॉकओवर दे रही है बल्कि उन राज्यों में कांग्रेस का गेमओवर होता जा रहा है. जहां एक बार कांग्रेस सत्ता की पटरी से उतरी वहां फिर उसके लौटने की संभावना खत्म हो जाती है.
कांग्रेस का डीएनए गठबंधन की राजनीति का विरोधी रहा है. कांग्रेस केवल गठबंधन की सरकार चला सकती है, विपक्ष के रूप में गठबंधन चलाना उसकी सोच में नहीं है. इंडी गठबंधन भी इसी का शिकार है.
पांच राज्यों के परिणामों के बाद गठबंधन का जो स्वरूप है, वह भी बिखर सकता है मैदान में लड़ते गठबंधन की सहयोगी दिल्ली में कमरे में लड़ते दिखाई पड़ सकते हैं.