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निर्विरोध चुनाव में ही मीनाक्षी जीतेंगी

सार

कांग्रेस के क्षत्रपों और राहुल गांधी के बीच राज्यसभा के टिकट की खींचतान का पहला राउंड क्षत्रप हार गए हैं. राहुल गांधी ने अपनी पसंदीदा मीनाक्षी नटराजन को प्रत्याशी घोषित कर दिया है..!! 

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विस्तार

    राज्यसभा की तीन सीटें रिक्त हुई हैं. कांग्रेस की सीट दिग्विजय सिंह के रिटायरमेंट के बाद खाली हुई है. विधानसभा में सदस्य संख्या के हिसाब से कांग्रेस का एक सीट जीतना सुनिश्चित लग रहा है. फिर भी बीजेपी में तीसरा कैंडिडेट उतारने के लिए बैठकों का दौर चल रहा है. अगर बीजेपी राज्यसभा के लिए तीसरा कैंडिडेट उतारती है, तो फिर कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग हो सकती है. कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग का वायरस एक्टिव है.

    जब से राज्यसभा निर्वाचन की चर्चा शुरु हुई है, तब से ही कांग्रेस खेमे से ऐसी खबरें आ रही थीं, कि किसी ऐसे नेता को प्रत्याशी बताया बनाया जाए जो विधायकों को मैनेज करने की क्षमता रखता है. ऐसी क्षमता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में ही मानी जाती है. कमलनाथ ने अपनी पूरी फील्डिंग की थी, उन्होंने क्रॉस वोटिंग का डर दिखाकर टिकिट हासिल करने में कोई कमी नहीं छोड़ी. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को जय और वीरू की जोड़ी के रूप में राज्य में जाना जाता है.

    केरलम और कर्नाटक में क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपना दबाव बनाकर राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान को डिसीजन बदलने के लिए मजबूर किया. मध्य प्रदेश के क्षत्रप भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ रहे थे, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली. विधायकों के विद्रोह के खलनायक के रूप में कमलनाथ पहले से ही स्थापित हैं. अगर उन्होंने विधायकों को मैनेज करने की अपनी क्षमता दिखाई होती तो सीएम रहते उनके खिलाफ कांग्रेस में विद्रोह नहीं होता. कांग्रेस की सरकार के पतन के पीछे विधायकों का विद्रोह ही रहा है. 

    दिग्विजय सिंह जब राज्य में मुख्यमंत्री थे, तब सरकार उनकी थी लेकिन सिस्टम कमलनाथ चला रहे थे. कमलनाथ की सरकार के समय भी ऐसा ही कहा जा रहा था कि सरकार कमलनाथ की है, लेकिन सिस्टम दिग्विजय सिंह के कंट्रोल में है. राहुल गांधी ने दबाव में नहीं आते हुए अपना कैंडिडेट उतार दिया है, लेकिन उसकी जीत बीजेपी की रणनीति पर निर्भर करेगी. बीजेपी अगर तीसरा कैंडिडेट राज्य में उतारती है तो फिर कांग्रेस कैंडिडेट के जीतने की संभावना कम हो जाएगी.

    सारा दारोमदार बीजेपी की रणनीति पर निर्भर है. विधायक दल और कांग्रेस संगठन के बीच में भी रिश्ते सामान्य दिखाई नहीं पड़ते हैं. कांग्रेस के विधायकों में भी स्थानीय नेतृत्व के प्रति नाराजगी देखी जा सकती है. राज्यसभा कैंडिडेट के चयन में भी हाईकमान और स्टेट लीडरशिप के बीच मतभेद की ख़बरें हैं. मीनाक्षी नटराजन लोकसभा सांसद रह चुकी हैं. उन्हें राहुल गांधी की टीम का मेंबर माना जाता है. जो नाम कांग्रेस की ओर से सामने आ रहे थे उनमें  कमलेश्वर पटेल, अरुण यादव और कमलनाथ बताए जाते हैं.

    मीनाक्षी नटराजन जातिगत गणित में भी फिट नहीं बैठती हैं. महिला कोटे में उन्हें अवसर मिला होगा. लेकिन राज्य की राजनीति से वह अब लगभग कटी हुई हैं. राज्य की चुनावी राजनीति में उनका कोई भी योगदान नहीं दिखाई पड़ता है. पार्टी संगठन को मजबूत करने में भी उनका रोल नहीं दिखता है. ऐसी हालत में उन्हें टिकट देने से विधायक दल में फूट की संभावना बढ़ सकती है.

    बीजेपी ने राज्यसभा प्रत्याशी चयन में राष्ट्रीय स्तर के एक लीडर को मौका दिया है, तो दूसरी तरफ पार्टी के लिए लंबे समय से काम करने वाले एक साधारण कार्यकर्ता रजनीश अग्रवाल को मैदान में उतारा है. रजनीश अग्रवाल अपनी प्रतिक्रिया में कहते हैं कि उन्हें तो उम्मीद भी नहीं थी, वह ना तो दिल्ली गए और ना ही पार्टी नेताओं के चक्कर लगाए. बीजेपी में देवतुल्य कार्यकर्ताओं की बात तो होती है लेकिन मुझे लगता है, कि इसी पार्टी में देवतुल्य नेतृत्व हो सकता है. 

    जो किसी भी कार्यकर्ता का मूल्यांकन कर उसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी और अवसर दे उनका चयन इतना अप्रत्याशित है, कि कोई भी राज्य का नेता उन्हें टिकट दिलाने का दावा नहीं कर सकता. पार्टी कैडर के लिए इतना बड़ा मैसेज है, कि ईमानदारी से काम करते रहने पर सेवाओं का मूल्यांकन बीजेपी में होता है. यह पहला अवसर नहीं है, भाजपा ऐसा करती रही है. जब आलोक संजर को भोपाल लोकसभा से प्रत्याशी बनाया गया था तब भी ऐसा ही किया गया था. बीजेपी तो नए नेतृत्व को आगे लाने की कोशिशों में लगी रहती है. पार्टी ने तो स्टेट प्रेसिडेंट और चीफ मिनिस्टर के चयन में भी कई बार इसी तरह से चौंकाया है. 

    राज्यसभा मैं दो तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए बीजेपी लगातार प्रयासरत है. दूसरे दलों के सांसद बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. जिस भी राज्य में एक भी सीट जीतने की संभावना है, वहां बीजेपी प्रत्याशी उतारने से पीछे नहीं रहेगी.

    मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सीट इसी तरह की हो गई है. क्षेत्रीय क्षत्रप भी राहुल गांधी के प्रत्याशी को हराने में कोई कमी नहीं रखना चाहेंगे. निर्णय बीजेपी नेतृत्व को करना है. अगर तीसरा कैंडिडेट उतारने का बीजेपी फैसला करती है, तो उसे यह ध्यान रखना होगा, कि तीसरा प्रत्याशी राज्य का ही ताकतवर लीडर हो. ऐसा प्रत्याशी हो जिसे कांग्रेस के विधायक भी अच्छी तरह से जानते पहचानते हों. उसके ऐसे रिश्ते हों, कि कुछ विधायक तो उसके प्रत्याशी घोषित होते ही क्रास वोटिंग के लिए तैयार हो जाएं. 

    नामांकन की अंतिम तिथि 8 जून है. तीसरे कैंडिडेट का ऐलान भी अगर होगा तो जल्दी ही हो जाएगा. निर्विरोध निर्वाचन होता है तो फिर मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा में पहुंच जाएंगी. 

    कांग्रेस में राज्यसभा प्रत्याशी की उठापटक से आगामी राजनीति को भी समझा जा सकता है. पार्टी में युवा और बुजुर्ग नेताओं के बीच में कनफन्ट्रेशन पहले से ही है. अब तो दोनों पूर्व मुख्यमंत्री राज्य में ही सक्रिय रहेंगे. हाईकमान ने एक तरह से उनकी चुनावी राजनीति पर ब्रेक लगा दिया है. 

    रिटायरमेंट की उम्र में भी नायक नहीं तो खलनायक की राजनीति करने की ताकत तो बची ही रहती है.