जन्म लेते ही हँसा वह बालक — और जान लिया उसने जगत का सत्य

राजकुमार आनंद की अलौकिक गाथा — जो पूर्वजन्म की स्मृति लेकर आये , मोह को तज गया, और महाकाल की कृपा से छठे मनु के रूप में इतिहास में अमर हो गये ।

सृष्टि के इतिहास में ऐसे क्षण विरले ही आते हैं जब कोई प्राणी जन्म लेते ही उस परम सत्य को जान लेता है, जिसे बड़े-बड़े योगी और तपस्वी वर्षों की साधना के बाद भी नहीं समझ पाते। ऐसा ही एक अलौकिक क्षण था — जब राजा अनमित्र और रानी गिरिभद्रा के पुत्र आनंद ने माता की गोद में पहली साँस लेते ही मुस्कुराया। यह मुस्कान कोई साधारण शिशु की निश्चिंत मुस्कान नहीं थी — यह था ज्ञान का उद्घोष, पूर्वजन्म की स्मृति का जागरण, और संसार के मोह के प्रति एक बालसुलभ किंतु गहन वैराग्य।

राजा अनमित्र धर्मात्मा, पराक्रमी और सूर्य के समान तेजस्वी थे। उनकी रानी गिरिभद्रा अत्यंत सुंदर और प्रिय थीं। जब उनके पुत्र ने जन्म लिया और माता ने उससे हँसने का कारण पूछा, तो उस नवजात शिशु ने जो कहा, वह आज भी आत्मा को झकझोर देता है — "माता, यह सारी सृष्टि स्वार्थ की है। एक बिल्ली रूपी राक्षसी अपने स्वार्थ से मुझे उठाना चाहती है, और आप भी मेरा पालन करके मुझसे अपेक्षाएँ रखती हैं।

राक्षसी का षड्यंत्र और सत्य की विजय

माता गिरिभद्रा पुत्र के ऐसे वचन सुनकर नाराज हो सूतिकागृह से बाहर चली गईं। इसी अवसर का लाभ उठाकर उस बिल्ली रूपी राक्षसी ने आनंद को उठाया और राजा विक्रांत की रानी हैमिनी के शयनकक्ष में रख दिया। साथ ही राजा विक्रांत के असली पुत्र को ले जाकर बोध नामक ब्राह्मण के घर पर छोड़ दिया। राजा विक्रांत ने उस बालक को अपना पुत्र समझकर उसका नाम आनंद रखा और उसका यज्ञोपवीत संस्कार भी किया,परंतु सत्य को कितने समय तक दबाया जा सकता है? यज्ञोपवीत के अवसर पर जब गुरु ने आनंद को माता को प्रणाम करने को कहा, तब उस बालक ने पुनः अपनी अलौकिक ज्ञानशक्ति का परिचय दिया। उसने स्पष्ट कहा — "मुझे जन्म देने वाली माता गिरिभद्रा हैं। माता हैमिनी तो चैत्र की माँ हैं, जो ब्राह्मण बोध के घर पर है।" सबके आश्चर्यचकित होने पर आनंद ने पूरा वृत्तांत सुनाया। राजा विक्रांत ने ब्राह्मण बोध से अपने सच्चे पुत्र चैत्र को वापस लाकर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया। आनंद को ससम्मान

विदा किया गया ।

राजमहलों और उत्तराधिकार की राजनीति को तज कर आनंद उस पवित्र भूमि की ओर चल पडे  जहाँ स्वयं महाकाल विराजते हैं — उज्जयिनी का महाकाल वन। यह वही भूमि है जिसे महाभारत और पुराण 'मोक्ष की नगरी' कहते हैं। यहाँ इंद्रेश्वर के पश्चिम में स्थित एक शिवलिंग की आनंद ने घोर आराधना की। उसकी तपस्या इतनी तीव्र और निष्काम थी कि स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया — "तुम यशस्वी छठे मनु — चाक्षुष मनु — के रूप में जन्म लोगे।" उस बालक के भक्तिभाव के कारण वह शिवलिंग तब से आनंदेश्वर के नाम से जाना जाता है।

चाक्षुष मनु — और अंग्रेजी के 'Man' का रहस्य

वैदिक काल-गणना में कुल चौदह मनु माने गए हैं। प्रत्येक मनु एक मन्वंतर का अधिपति होता है और उस काल में मानवजाति एवं सृष्टि का संचालन उन्हीं के नेतृत्व में होता है। यह जानना अत्यंत रोचक है कि अंग्रेजी का 'Man' (मनुष्य) शब्द वास्तव में संस्कृत के 'मनु' से ही उद्भूत हुआ है। मनु अर्थात — मनन करने वाला, विवेकशील प्राणी। इंडो-यूरोपीय भाषाई परंपरा में यह शब्द 'मनु' से यात्रा करते हुए विभिन्न रूपों में पूरे विश्व में फैला।

वर्तमान में हम सातवें मनु — वैवस्वत मनु — के मन्वंतर में हैं। आनंद जिस चाक्षुष मनु के रूप में जन्म लेने का वरदान पाए, वे छठे मन्वंतर के अधिपति थे — ठीक वर्तमान मन्वंतर से पूर्व के। चाक्षुष मन्वंतर में एक और दिव्य घटना घटी — भगवान विष्णु ने 'वैराज' नामक प्रजापति और उनकी पत्नी 'देवसंभूति' के पुत्र के रूप में 'अजित' नाम से अवतार लिया। 'अजित' का शाब्दिक अर्थ है — वह जिसे कोई जीत न सके, अर्थात अजेय। इस अवतार का प्रमुख उद्देश्य था — क्षीरसागर के मंथन के समय देवताओं की सहायता करना, ताकि अमृत की प्राप्ति हो सके। इस प्रकार चाक्षुष मन्वंतर वह स्वर्णिम काल था जब आनंद जैसे निष्काम तपस्वी ने शासन किया और विष्णु के अवतार ने स्वयं देवताओं को अमरत्व का मार्ग दिखाया।

आज के युग में आनंद की प्रासंगिकता

यह पौराणिक कथा केवल अतीत की गाथा नहीं है — यह आज के युग में भी उतनी ही जीवंत और प्रेरणादायी है। आज भी समूचे भारत में और विश्व के अनेक देशों में ऐसे बच्चे जन्म लेते हैं जो पिछले जन्म की बातें बताते हैं, ऐसे स्थान और व्यक्तियों को पहचानते हैं जिन्हें उन्होंने इस जन्म में कभी देखा नहीं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से लेकर श्रीलंका तक — ऐसे प्रकरण समाचारों में आते रहते हैं। सनातन धर्म ने हजारों वर्ष पूर्व ही इस सत्य को पहचाना था कि आत्मा अमर है, वह बार-बार जन्म लेती है, और कभी-कभी पूर्वजन्म की स्मृतियाँ उसके साथ आती हैं।

आनंद की कथा से हमें एक और अमूल्य शिक्षा मिलती है — कि सच्चे ज्ञान के सामने न राजसिंहासन टिकता है, न वंश का अहंकार। जिस बालक को दो राजाओं ने पाला, जिसे उत्तराधिकार मिल सकता था, उसने सब त्यागकर शिव की शरण ली। और उस त्याग का फल क्या मिला? स्वयं महाकाल ने उसे मनवंतर का अधिपति बनने का वरदान दिया।

सनातन धर्म का सत्य यही है — त्याग से ही सर्वोच्च प्राप्ति होती है। जो सब छोड़ता है, उसे सब मिलता है।

महाकाल वन — आज की उज्जयिनी — का यह माहात्म्य अपरंपार है। यहाँ की भूमि में ऐसे अनगिनत प्रसंग समाए हुए हैं जो बताते हैं कि जो साधक यहाँ सच्चे हृदय से शिव की उपासना करता है, उसे न केवल इस जन्म में, बल्कि अनेक जन्मों तक उनकी कृपा मिलती रहती है। आनंदेश्वर लिंग इसी सत्य का जीता-जागता प्रमाण है।

आने वाली पीढ़ियों को यह जानना चाहिए कि सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं है। यह एक विज्ञान है — आत्मा का विज्ञान, काल का विज्ञान, सृष्टि के चक्र का विज्ञान। जब बालक आनंद ने माता की गोद में जन्म लेते ही कहा था कि यह सृष्टि स्वार्थ की है — तो वह केवल एक शिशु का बोल नहीं था। वह युगों की साधना का निचोड़ था। और महाकाल ने उस निचोड़ को पहचाना, और आनंद को वह दर्जा दिया जो सृष्टि में सर्वोच्च है — एक मनु का।