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लगाम से दूर दोनों, नेता और अफसर

सार

   मौसम की गर्मी रिकॉर्ड तोड़ रही है फिर भी पावर के हीटवेब से कम ही लगती है. दोनों का तापमान असंतुलित हो रहा है. ऐसा बताया जा रहा है. तापमान में बदलाव के कारण मध्य प्रदेश के कई जिले और शहर गर्मी के सारे रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं..!!

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विस्तार

    मौसम की गर्मी से तो आम जनता मुकाबला कर लेती है. प्राकृतिक साधनों का उपयोग कर तापमान को संतुलित कर लेती है. गर्मी के इस महीने में पावर का जो हीटवेब देखने को मिल रहा है, उसमें तो नेता और अफसर दोनों का तापमान अप्रत्याशित ढंग से बढ़ा हुआ है.

    पिछले एक पखवाड़े में मध्य प्रदेश में नेताओं उनके परिजनों और अफसरों के बीच टकराव और तनाव के इतने मामले सामने आए हैं, कि आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है. नेताओं में विधायक ही नहीं मंत्री भी आक्रोश में दिखाई पड़े हैं. जबलपुर में पीडब्ल्यूडी मंत्री ने एक आईएएस अफसर को ऐसा प्रताड़ित किया कि उसे मुख्य सचिव से शिकायत कर संरक्षण मांगना पड़ा.

    जब भी दो लोग भिड़ते हैं तो दोनों की अपनी कहानी और सफाई होती है. जबलपुर में विवाद की शुरुआत स्मार्ट सिटी के युवा आईएएस अफसर और विभाग में कार्यरत एक महिला कर्मचारी के बीच प्रशासनिक बातचीत दुर्व्यवहार तक पहुंचती है. फिर मामला महिला से जुड़े समाज और वहां के विधायक, मंत्री के पास तक पहुंचता है. मंत्री अफसर को अपने बंगले पर बुलाते हैं, बिना उसकी बात सुने मंत्री अपने गुस्से का इजहार करते हैं. कार्यपालिका के तंत्र के अनुसार मंत्री सर्वेसर्वा होता है, लेकिन आईएएस अफसर भी इसका सबसे मजबूत अंग माना जाता है. मंत्री कुछ भी कहे या कुछ भी आदेश दे इंप्लीमेंटेशन तो आईएएस अफसर के हाथ ही होता है.

    मंत्रियों अफसरों के बीच टकराव अक्सर होता रहता है. कहने के लिए तो दोनों लोकसेवक हैं. दोनों जनता की सेवा के लिए हैं. लेकिन इन दोनों के बीच में जो भी आपसी व्यवहार होता है उसमें जनता कहीं नहीं होती. काम जनहित के नाम पर होता है लेकिन इसका वास्तविक हितधारक कौन है, यह समझना मुश्किल होता है. 

    इसके पहले पिछोर के विधायक और युवा आईपीएस अफसर के साथ विवाद और टकराव चर्चा में रहा. सत्ता का अहंकार थार पर सवार होकर कुछ लोगों को सड़क पर कुचल देता है. थार चलाने वाला विधायक का बेटा होता है. पुलिस एसडीओपी एक्शन लेता है, तो फिर विधायक को बुरा लग जाता है. वह आईपीएस की औकात बताने लगते हैं. जब मामला बढ़ता है, संगठन की ओर से विधायक को अनुशासनहीनता के लिए नोटिस दिया जाता है तो फिर मजबूरी में माफी मांगी जाती है.

     दूसरी घटना अलीराजपुर की है, वहां से मंत्री के भाई जिला पंचायत की महिला सीईओ को धमकी देते हैं. उनकी पत्नी जिला पंचायत की अध्यक्ष हैं. पंचायत में आरक्षण के बाद महिलाओं की भागीदारी तो सुनिश्चित हुई है, लेकिन शिकायते भी बनी ही हुई हैं, कि उनके पति या परिवार के कोई दूसरे लोग महिलाओं के कामकाज को कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं.

    जिला कलेक्टर और विधायकों के बीच में टकराव आम बात है. टकराव शुरु होता है, जनहित के नाम पर लेकिन इसके पीछे उनके निजी हित ही जुड़े होते हैं. भिंड में कलेक्टर और स्थानीय विधायक के बीच सार्वजिनक विवाद लंबे समय तक प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्र में चर्चा में बना रहा है.

    नेता और अफसर में से किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. सब अपने-अपने पावर की गर्मी का उपयोग करते हैं. नेताओं और अफसर के बीच जनहित के काम को लेकर टकराव की संभावनाएं तो अब न्यूनतम होती जा रही हैं. जनता से जुड़े जो भी काम हैं, वह सब डिजिटल प्रशासन के अंतर्गत आ गए हैं. अब तो जनता के लोग विधायकों के पास अपने किसी काम के लिए कम ही संख्या में जाते हैं. प्रशासन से जुड़े अपने काम को या तो ऑनलाइन पूरा करने की कोशिश करते हैं या सरकारी तंत्र में काम करने की जो जांची-परखी व्यवस्था है, उसका उपयोग कर लेते हैं. नेताओं का रोल गवर्नेंस में डिजिटल युग के बाद न्यूनतम होता जा रहा है. 

    मंत्री और अफसर दोनों के कार्य संचालन के नियम और अधिकार लिखित हैं. टकराव के जो भी मामले सामने आते हैं, उनमें जनप्रतिनिधि के साथ अफसर की भूमिका भी सवालों के घेरे में होती है. सुप्रीमेसी की कोशिशें भी कई बार टकराव का कारण बनती है. वैसे तो अफसर मंत्रियों और जन प्रतिनिधियों का सहारा लेकर पोस्टिंग और ट्रांसफर को अपने हक में अंजाम तक पहुंचने में लगे रहते हैं. सीमाएं दोनों तरफ से टूट रही हैं. शिष्टता की अपेक्षा तो अब सरकारी तंत्र से करना ही बेमानी लगता है.

    एक और ट्रेंड देखा जा रहा है कि कार्यपालिका का राजनीतिक तंत्र अपने समर्थकों के बीच लोकप्रियता के लिए कई बार जानबूझकर अफसरों को निशाना बनाते हैं. पूरी राजनीति अफसर केंद्रित हो गई है. मन मुताबिक अफसरों को लाना और उनको पदों से हटाना, जनप्रतिनिधियों का पहला और आखिरी एजेंडा होता है. जो अफसर इस सेटिंग में फिट नहीं होते वहीं टकराव की संभावना बढ़ जाती है. 

    मध्य प्रदेश में लंबे समय से बीजेपी सरकार में है. जनप्रतिनिधिओं में अफसरों के प्रति विद्यमान भावनाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सार्वजनिक आंदोलन में सरकार को दिए जाने वाले अपने ज्ञापन को कलेक्टर को देने की बजाय एक कुत्ते के गले में कलेक्टर की पट्टी चिपकाकर उसे ही पहना देते हैं. जब विपक्ष में यह मानसिकता है तो फिर सरकारी पक्ष में तो सत्ता का अहंकार हड़काने की ताकत बढ़ा देता है.

  नेता का अहंकार हो या अफसर का, इसका वास्तविक दुष्परिणाम तो पब्लिक को ही भुगतना पड़ता है. सबके अपने संगठन हैं, जाति की पहचान है. संविधान तो केवल शपथ लेने के लिए जरूरी है.  

    पावर दिखाने के लिए तो अफसर पर रुतबा दिखाना नेताओं का रुटीन बन गया है. सिस्टम में सब कुछ हो रहा है लेकिन जिस जनता ने इसे बनाया है, वही सबसे ज्यादा नेग्लेक्टेड  है.