संविधान के नाम पर ही वोट बैंक का तुष्टिकरण होता है. अदालत में अपनी हार से उपजे असंतोष को दबाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था. आपातकाल में संविधान की मूल प्रस्तावना में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्द जोड़ा गया था. यह शब्द तुष्टीकरण के आपातकाल के रूप में अभी भी भारत के संविधान पर लागू है. इसको अभी तक हटाया नहीं जा सका है.
यह दोनों शब्द आपातकाल की राजनीति की हमेशा याद दिलाते हैं. इन शब्दों में राजनीतिक विचारधारा परिलक्षित होती है. संविधान में उन प्रावधानों को हटा दिया गया है. जिसका उपयोग कर इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाया गया था. आपातकाल में विपक्षी नेताओं, न्यायालय और पूरी व्यवस्था परनियंत्रण के जरिए धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के शब्दों को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया था. इन शब्दों को संविधान निर्माताओं ने देश के लिए जरूरी नहीं समझा था. जब इनको जोड़ा गया, तब देश को आजाद हुए तीस साल से अधिक समय हो गया था. इस पूरे समय लगभग कांग्रेस की ही सरकारें कायम रहीं. उसका समर्थन धीरे-धीरे वोट बैंक बनने लगा. वोट बैंक के तुष्टिकरण की प्रक्रिया सरकार की व्यवस्था में आगे बढ़ने लगी. यद्यपि उस समय कोई दूसरी विचारधारा राजनीति में उतनी प्रभावकारी नहीं थी लेकिन फिर भी इन दोनों शब्दों को जोड़ने के पीछे तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति ही काम कर रही थी.
देश को इसके जरिए बांटने की कोशिश की गई. इन दोनों शब्दों पर पहले भले ही उतना विरोध नहीं हुआ, लेकिन अब देश की राजनीतिक धारा बदल चुकी है. धर्मनिरपेक्षता के नाम पर संविधान में कुछ समुदायों की धार्मिक परंपराओं और पर्सनल कानूनों को मान्यता दी गई. देश के सभी धर्मों के धर्मस्थलों के लिए एक समान कानून लागू करने के बजाय अलग-अलग व्यवस्था कायम की गई. हिंदुओं द्वारा हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के लिए आज भी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. अभी भी हिंदू मंदिरों का प्रबंधन राज्य सरकारों के अधीन ही काम कर रहा है,
धर्मनिरपेक्ष शब्द का उपयोग करते ही यही आभास निकलता है कि एक खास समुदाय के हित संरक्षण और तुष्टीकरण को प्राथमिकता इन दोनों शब्दों को संविधान की प्रस्तावना से हटाने की चर्चा तो होती है लेकिन देश में विभाजित राजनीतिक विचारधारा के समूहों के दबाव और प्रभाव के चलते फिर इस पर अब तक कोई पहल नहीं हो सकी है.
इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल तो एक सीमित समय में समाप्त हो गया. आपातकाल लगाने की तिथि 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाया जाता है. संविधान की भावनाओं पर जो मानसिक आपातकाल थोपा गया है, उसको खत्म होने में बहुत लंबा समय लगेगा. भारत के राष्ट्रगीत को भी इसी मानसिकता ने छोटे स्वरूप में स्वीकार किया था. ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि पूरे राष्ट्रगीत पर वोट बैंक के समूह को आपत्ति थी. संविधान पर लगे इस आपातकाल को भी हटा दिया गया है. अब वंदे मातरम के पूर्ण छंदों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया है. इसके गायन को अनिवार्य भी बनाया गया है. अभी इस पर भी विवाद चल रहा है.
समाजवाद को भी जिस स्वरुप में समाज पेश किया जा रहा है, उससे सामाजिक आपातकाल की संभावनाएं विकसित हो रही हैं. समाज को जातियों में विभाजित करने का प्रयास समाजवादी राजनीति का केंद्र बन गया है. कास्ट सेंसस समाजवादी राजनीति की विद्रूपता के रूप में हमारे सामने है. पढ़े लिखे और प्रगतिशील राजनेता भी जाति विभाजन को बढ़ाने में अपनी राजनीतिक सफलता देख रहे हैं.
इंदिरा गांधी का राजनीतिक आपातकाल तो इक्यावन साल पहले लगा था और सीमित समय में समाप्त हो गया था. लेकिन जो सोच आपातकाल की राजनीतिक मानसिकता के रूप में देश में विष घोल रही है, उनको जब तक समाप्त नहीं किया जाएगा तब तक संविधान अपनी मूल भावना में देश में लागू नहीं हो पाएगा.
संविधान की किताब हाथ में लेकर संविधान खत्म करने की अफवाह फैलाने का अभियान भी आपातकाल की मानसिकता को ही पोषित कर रहा है. दुर्भाग्यजनक यह है कि जिस मानसिकता ने आपातकाल लगाया था उसी के वारिस संविधान की किताब हाथ में लेकर उसी सोच को अभी भी अपनी राजनीतिक ताकत बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
जो दो विचारधारा इस समय मुख्यतः देश में प्रभावी हैं, उनमें एक कांग्रेस और दूसरी भाजपा की विचारधारा है. भाजपा हिंदुत्व की विचारधारा को अपना मुख्य एजेंडा बताती है, तो कांग्रेस उसके खिलाफ़ सर्वधर्म समभाव, सभी वर्गों के साथ न्याय को अपनी विचारधारा बताती है. उसका मूल दर्शन वोट बैंक के तुष्टीकरण में ही छिपा दिखाई पड़ता है. तुष्टिकरण का यह दृष्टिकोण संविधान में समय-समय पर किए गए संशोधन में भी दिखाई पड़ता है. उन कानूनों में भी इसको पढ़ा और महसूस किया जा सकता है, जिसमें किसी खास समुदाय के लिए ही संरक्षण की व्यवस्था की गई है.
इंदिरा गांधी के आपातकाल को केवल याद करने से काम नहीं चलेगा. संविधान हत्या दिवस मनाने से संविधान का संरक्षण नहीं होगा. संविधान के संरक्षण के लिए उस सोच, कानूनी प्रक्रिया, नियमों को समाप्त करना होगा जो विभाजन को प्रोत्साहित करते हैं. तुष्टिकरण का प्रोटेक्शन करते हैं. जातिवाद को प्रोत्साहित करते हैं.
हाथ में संविधान, संविधान की शपथ लेकर, संविधान के प्रावधानों के सहारे, संविधान को ही कटघरे में खड़ा करना संविधान की अवमानना की श्रेणी में आता है. हाथ कोई भी हो हत्या और रक्षा दोनों के लिए संविधान का ही उपयोग किया जाता है.
आपातकाल भी वही था. प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद भी वही कोशिश है. भेदभाव मिटाकर सबके साथ समानता, सबके लिए एक कानून जब प्रभावशील होगा तभी संविधान पर लागू राजनीतिक और तुष्टिकरण का आपातकाल समाप्त होगा.