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सियासी स्वार्थ पर न चढ़े, संविधान की बलि

सार

लोकसभा विधानसभा सीटों के परिसीमन को लेकर विपक्षी दलों की बेचैनी समझ से परे है. राहुल गांधी सहित विपक्ष के सभी नेता महिला आरक्षण विधेयक गिराने के लिए मोदी सरकार द्वारा इसे परिसीमन से जोड़ने का एजेंडा करार दे रहे हैं..!!

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विस्तार

    परिसीमन जनसंख्या के आधार पर लोकसभा, विधानसभा सीटों की संख्या और सीमाओं का निर्धारण करता है. इसके लिए स्वतंत्र परिसीमन आयोग बनाया जाता है. यह एक सर्वोच्च संवैधानिक प्रक्रिया है. भारत में सीटों की संख्या का परिसीमन वर्ष 1976 में किया गया था. उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा यह संशोधन किया गया था कि, वर्ष 2026 तक परिसीमन की यह प्रक्रिया फ्रीज रहेगी. जबकि संविधान में नई जनगणना के बाद जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रावधान है.

     देश में जब परिसीमन किया गया था उस समय कुल आबादी लगभग पचपन करोड़ थी. यह आबादी बढ़कर एक सौ चालीस करोड़ हो गई है. राष्ट्रीय जनगणना कोरोना के कारण वर्ष 2021 में नहीं हो पाई थी. यह प्रक्रिया प्रारंभ हुई है. अगले साल तक जनगणना के आंकड़े आने की उम्मीद है. 

   कांग्रेस ने जब इमरजेंसी के दौरान परिसीमन के संवैधानिक प्रावधान को वर्ष 2026 तक के लिए फ्रीज किया था, तब उसने नहीं सोचा था कि, तब केंद्र में बीजेपी की सरकार होगी. 

     विपक्षी दल इस बात से घबराहट में है कि अगर बीजेपी सरकार परिसीमन की प्रक्रिया को पूरा करती है तो वह लोकसभा, विधानसभा की सीटों को इस हिसाब से निर्धारित करेगी, जिससे कि, लंबे समय तक उनकी जीत सुनिश्चित हो सके. कांग्रेस वोटर से ज्यादा सीटों का तुष्टिकरण करना चाहती है. ऐसी सीटें चाहती है, जिसमें उनके वोट बैंक की ताकत बनी रहे. स्वाभाविक रूप से बीजेपी प्रयास कर सकती है कि, सीटों की संख्या और सीमाओं का निर्धारण इस हिसाब से किया जाए, जिसमें विपक्षी दलों का वोट बैंक किसी भी सीट पर ऐसी स्थिति में ना रहे, जो अपने बलबूते पर किसी भी पार्टी को विजयी बनाने की क्षमता रखता हो. 

    यह बदलाव भले ही संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन कांग्रेस और दूसरे दल इसको रोकना चाहते हैं. उन्हें  लगता है कि, इससे उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ जाएगा. विपक्षी दल मुख्य रूप से परिसीमन के विरोध में यह आवाज उठा रहें हैं कि, इससे उत्तर और दक्षिण के बीच में खाई बढ़ जाएगी. राजनीतिक शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा.

    दक्षिणी राज्य ऐसा मानते हैं कि, उनके क्षेत्र में जनसंख्या नियंत्रण बेहतर ढंग से किया गया है. उत्तर में बेतहासा जनसंख्या बढ़ी है. बीजेपी उत्तर भारत में तो अपने पैर जमा चुकी है लेकिन परिसीमन पर कांग्रेस और विपक्ष की राजनीति उसे दक्षिण में अपने पांव जमाने का मौका देगी. 

    विरोधी स्थापित करने के लिए जितनी ताकत से आरोप लगाया जाता है, प्रतिक्रिया भी उतनी ताकत से ही होती है. बीजेपी क्योंकि दक्षिण में प्रवेश चाहती है, इसलिए वह तो पूरी कोशिश करेंगी कि, दक्षिणी राज्यों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय न हो. केंद्र सरकार में दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश भी सहयोगी पार्टी है. उनके साथ मिलकर परिसीमन की प्रक्रिया में बीजेपी दक्षिण के हितों के लिए पूरी कोशिश करेंगी.

    महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का जो बिल लाया गया था, उसके पीछे भी दक्षिण भारत और उत्तर के राज्यों के बीच संतुलन का लक्ष्य रहा है. सभी राज्यों में अनुपातिक समानता की संख्या बढ़ाने का ही प्रस्ताव किया गया है. अगर केवल जनसंख्या के आधार पर सदनों की सीटों का निर्धारिण किया जाएगा, तब निश्चित रूप से दक्षिण में सीटें कम रहेंगी. 

    परिसीमन पर विवाद मुद्दों से ज्यादा बीजेपी और दूसरे दलों के बीच घोर अविश्वास और राजनीति का दिखाई पड़ता है. जनसंख्या बनाम विकास पर तो फार्मूला विशेषज्ञों द्वारा निकाला जा सकता है. राजनीतिक प्रतिनिधित्व में परिसीमन से असंतुलन न हो इस पर विचार किया जा सकता है. यह प्रक्रिया परिसीमन आयोग द्वारा और इसके फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है. 

    हमारा संविधान एकमत और एक समान मूल्य की बात करता है. परिसीमन फ्रीज होने के कारण आज विधानसभा सीटों में मतों की गणना में काफी असंतुलन है. कोई लोकसभा सीट आठ लाख की है तो कोई 40 लाख की. राहुल गांधी महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने को बीजेपी की साजिश बताते हैं. बीजेपी इस के जरिए राजनीतिक और इलेक्ट्रोरल स्ट्रक्चर को बदलना चाहती है.   

    सरकार चाहती है कि, परिसीमन 2011 की जनसंख्या पर किया जाए. सभी राज्यों में सीटों का निर्धारण 50% वृद्धि के साथ कर दिया जाए .यह बहुत ही तार्किक प्रस्ताव है. इसके विरोध का उद्देश्य समझ से परे है. अगर जनसंख्या का आधार होगा तो वर्ष 2011 में तो दक्षिण उत्तर राज्यों में असंतुलन वर्ष 2027 की जनगणना के आंकड़ों से तो कम ही होगा. 

    ऐसी हालात में विपक्ष क्यों नई जनगणना की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन पर अड़ा हुआ है. इससे तो दक्षिण राज्यों को ही नुकसान होगा.

    राहुल गांधी और पूरे विपक्षी दल अपने स्टैंड से खुद ही उलझ गए हैं. परिसीमन को रोकना असंवैधानिक होगा. राहुल गांधी अगर ऐसा मानते हैं कि, वर्ष 2029 के चुनाव में विपक्षी दलों की जीत और सरकार बनाने की कोई संभावना है तो विधानसभा के चुनाव परिणाम से उन्हें सबक लेने की जरूरत है.

   सियासी स्वार्थ पर संविधान की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती. परिसीमन लोकतंत्र और संविधान की जान है. हर जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या और सीमाओं में बदलाव होना ही चाहिए. अगर इंदिरा गांधी ने परिसीमन को फ्रीज नहीं किया होता तो अपने कार्यकाल में ही यह प्रक्रिया पूरी कर चुकी होती. उसे इसके लिए बीजेपी सरकार से डरने की आवश्कयता नहीं होती.

    मोदी ने नया संसद भवन बना दिया है इसलिए सीटों की संख्या बढ़ने पर सांसदों की बैठने की तो कोई समस्या नहीं है.