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सरकार से ममता राष्ट्रपति से कटुता

सार

संविधान के नाम पर बनी सरकार देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति पद की गरिमा और सम्मान के खिलाफ़ काम करने से भी नहीं चूकती. राष्ट्रपति और राज्य के मुख्यमंत्री के बीच प्रोटोकॉल और कार्यक्रम स्थल बदलने पर सामने आया नज़ारा व्यक्तियों से ज्यादा संविधान का अनादर कर रहा है..!!

janmat

विस्तार

    आदिवासी, महिला राष्ट्रपति बंगाल में इंटरनेशनल संथाल कॉन्फ्रेंस में पहुंचती हैं. बंगाल सरकार बिना वाजिब कारण के उनका कार्यक्रम स्थल बदल देती है. राष्ट्रपति भी पुराने कार्यक्रम स्थल को देखने पहुंच जाती हैं. कि कहीं वह स्थान छोटा तो नहीं है. जब उन्होंने देखा कि आदिवासी समाज के कार्यक्रम के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थल को बदल गया है. तो उन्होंने अप्रसन्नता व्यक्त की. 

    आदिवासी समाज का भोलापन नहीं होता तो शायद वह अपनी टिप्पणी को टाल भी सकती थीं, लेकिन सीएम ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति पर जो टिप्पणी की, वह सियासी कुमति का सबसे बड़ा उदाहरण है. राष्ट्रपति राजनीति का पद नहीं है. राजनीति उसे चुनती जरूर है, लेकिन वह संविधान का संरक्षक होता है. सियासत में संविधान की माला सभी जपते दिखना चाहते हैं, लेकिन आचरण तो संविधान के सम्मान पर ग्रहण लगाता ही दिखाई पड़ता है. महिला आदिवासी और राष्ट्रपति के अपमान का मामला हो तो फिर ममता को घेरने में बीजेपी कैसे पीछे रह सकती है. पीएम नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इस दुर्भाग्यजनक घटना को संविधान की आत्मा पर हमला बताया. 

    सरकारों के लिए ईश्वर-अल्लाह संविधान ही होता है. संविधान से ही सरकारों को शक्ति और काम करने का अवसर मिलता है. संविधान गरिमा और मर्यादा के अनुरूप सरकार चलाने की सन्मति प्रदान करता है. सियासी कुमति से संवैधानिक सन्मति सदमे में है. चुनाव के लिए कोई भी आचरण क्या सही माना जा सकता है? ममता बनर्जी स्वयं राष्ट्रपति के साथ हुए घटनाक्रम को बंगाली अस्मिता के साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं. यह मुद्दा भी चुनाव में ममता सरकार के अहंकार को स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

    ममता बनर्जी राष्ट्रपति के कार्यक्रम में न स्वयं पहुंचती है और न ही प्रोटोकॉल में किसी मंत्री को भेजती हैं. यह उनकी कार्यशैली का हिस्सा है. ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है. बंगाल में बाढ़ के समय जब पीएम नरेंद्र मोदी निरीक्षण के लिए गए थे, इसके उपरांत समीक्षा के लिए बैठक में बंगाल के मुख्य सचिव को बुलाया गया था. ममता बनर्जी ने सीएस को जाने से रोक दिया था. जिस पर भारत सरकार के कड़े रुख के कारण सीएस ने त्यागपत्र दे दिया था. ममता बनर्जी ने उन्हें अपना सलाहकार बना लिया था. 

    राजनीतिक दलों में टकराहट तो स्वभाविक हो सकती है, लेकिन संवैधानिक रूप से बनी सरकार केंद्र की सरकार राज्यपाल और राष्ट्रपति के साथ टकराहट का रुख अपनाए यह तो संविधान की भावना के पूरी तरह से खिलाफ है. ममता बनर्जी राजनीतिक रूप से क्रांतिकारी रही हैं. उनकी सफलता आक्रामकता पर ही खड़ी है. उसी से उन्होंने वामपंथी सरकार का परिवर्तन किया. क्रांतिकारी ममता अब अपरिवर्तनकारी हो गई हैं. इसे बंगाल का ही कैरेक्टर कहा जाएगा कि ममता बनर्जी बामपंथी सरकार के खिलाफ़ आंदोलन की क्रांति की थी, जिन कारणों पर अपना आंदोलन खड़ा किया था, उनकी सरकार आने पर सरकार की कार्यशैली में वह सभी कारण न केवल विद्यमान हैं, बल्कि उनमें वृद्धि हुई है. पूरे देश में राजनीति में हिंसा लगभग समाप्त हो गई है. केवल बंगाल अकेला राज्य है जहां हिंसक राजनीति अभी भी चल रही है.

    सीएम ममता बनर्जी एसआईआर के खिलाफ धरना दे रही हैं. वह स्वयं सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ पैरवी करने पहुंच गईं. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को काले झंडे बंगाल में ही दिखाए जा सकते हैं. देश के दूसरे राज्यों में एसआईआर का विरोध विपक्षी दल कर रहे हैं. राज्य सरकार के रूप में विरोध का माहौल केवल बंगाल में ही दिखाई पड़ता है. विरोधी दलों की तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में सरकारें हैं, फिर भी वहां एसआईआर की प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो जाती है. 

    सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के लंबित मामलों पर निर्णय देने के लिए न्यायिक अधिकारियों की ड्यूटी लगाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है. अब जब न्यायिक अधिकारी अंतिम निर्णय कर रहे हैं, तब भी ममता बनर्जी को इस पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह है. 

    बंगाल में चुनाव की प्रक्रिया भी विलंबित होती जा रही है. नई विधानसभा निर्धारित तिथि 7 मई तक गठित हो जाएगी, इसमें भी संदेह दिखाई पड़ रहा है.

    पिछले चुनाव मेंबंगाल में चुनाव फरवरी के अंतिम सप्ताह में घोषित हो गया था. अभी तो एसआईआर की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हुई है. बंगाल में चुनाव समय से पूरे करने के लिए सुप्रीम कोर्ट या भारत सरकार को निर्णय करने की ज़रूरत पड़ सकती है. 

    ममता बनर्जी तीन टर्म से राज्य की सीएम हैं. चौथे कार्यकाल के लिए चुनावी मैदान में जाएंगी. किसी भी पार्टी के लिए इतना लंबा कार्यकाल राज्य के विकास के लिए मील का पत्थर होना चाहिए. इसके विपरीत बंगाल की स्थिति चिंतनीय बनी हुई है. सरकारी प्रक्रिया में करप्शन ने तो सारी हदें पार कर दी हैं. भार्तियों में भ्रष्टाचारऔर मंत्रियों से जुड़े ठिकानों से करोड़ों रुपयों की जब्ती देश ने देखी है. वोट बैंक पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा केंद्र बंगाल ही बना हुआ है.

    राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल और उनकी गरिमा पर बंगाल सरकार और सीएम ममता बनर्जी का रवैया उनकी तानाशाही प्रवृत्ति को दिखाता है. जब संविधान का संरक्षक ही उनकी राजनीति का शिकार बन जाता है तो फिर राजनीतिक दलों में संघर्ष के चरम की कल्पना की जा सकती है. सत्ता की लालसा में संवैधानिक पदों पर बैठे राजनेताओं का असंवैधानिक आचरण बढ़ता ही जा रहा है.

    अहंकार सबका चूर-चूर हो जाता है. चुनाव जीत कर भी ममता बनर्जी संविधान को हराने का काम कर रही हैं संविधान की हार लोकतंत्र पर बड़ा प्रहार है.