अगर मध्य प्रदेश विधानसभा में नारी वंदन अधिनियम परिसीमन के साथ लागू करने की शक्ति होती तो इसे लागू करने का मार्ग प्रशस्त हो गया होता. विधानसभा के विशेष सत्र में सरकार की ओर से इस पर लाया गया शासकीय संकल्प ध्वनि मत से पारित हो गया है..!!
इस सत्र के होने या नहीं होने से महिला आरक्षण लागू होने पर कोई प्रभाव नहीं होने वाला है. बीजेपी की केंद्र सरकार ने तो पहले ही नारी वंदन अधिनियम पारित कर 33% आरक्षण का नियम बना दिया है. लोकसभा में जो बिल पारित नहीं हुआ, वह यह था कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया को पूरा किया जाए. सभी राज्यों में समानुपातिक सीटों में वृद्धि की जाए. इन बढ़ी हुई सीटों पर महिला आरक्षण लागू किया जाए.
केंद्र सरकार चाहती थी कि इसे 2029 के चुनाव में लागू कर दिया जाए. जब यह पारित नहीं हुआ तो फिर इस पर महिला हितेषी और विरोधी साबित करने की राजनीति प्रारंभ हुई. स्वाभाविक रूप से बीजेपी ने कांग्रेस सहित दूसरे विरोधी दलों को महिला आरक्षण बिल गिराने के लिए दोषी मानते हुए महिला विरोधी साबित करने का प्रयास किया.
लोकसभा में बिल गिरने के तुरंत बाद बीजेपी की महिला सांसदों ने प्ले कार्ड के साथ प्रदर्शन किया था. उसी से यह तय हो गया था, कि अब सभी राज्यों में बीजेपी महिला आरक्षण को राजनीति का मुद्दा बनाएगी. इसके लिए भाजपा द्वारा राज्यों में जन आक्रोश प्रदर्शन भी किए गए. इन प्रदर्शनों में सीएम और मंत्री भी शामिल हुए. इसी जन आक्रोश को सदन के रिकॉर्ड में लाने के लिए शायद यह विशेष सत्र बुलाया गया.
सदन में जो प्रस्ताव पेश किया गया उसमें भी यही कहा गया है, कि नारी शक्ति बंदन अधिनियम को परिसीमन के साथ लागू करने के लिए संकल्प सदन पारित करता है. बीजेपी परिसीमन के साथ महिला आरक्षण लागू करना चाहती है, तो कांग्रेस वर्तमान सीटों पर ही महिला आरक्षण देने की बातकर रही है. कांग्रेस की यह बात भी केवल राजनीति प्रेरित है. महिला आरक्षण अब तक लागू नहीं हो पाने के पीछे यही विवाद रहा है.
यह आरक्षण वर्तमान सीटों पर दिया जाए या परिसीमन में नई सीटें बढ़ाकर दिया जाए. वर्तमान सीटों में देने से जब पुरुषों के लिए लोकसभा और विधानसभा में सीटें कम मिलेंगी तो फिर इस तूफान को नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा. कोई राजनीतिक दल कुछ भी कहे, लेकिन महिला आरक्षण परिसीमन के साथ ही लागू होगा. नारी शक्ति वंदन अधिनियम जो 2023 में पारित किया गया, उसमें भी यह प्रावधान है, कि वर्ष 2026 की जनगणना के बाद नया परिसीमन होगा. उसके बाद ही महिला आरक्षण प्रभावशील होगा.
परिसीमन के बाद महिला आरक्षण लागू करने पर सभी दलों की सर्वानुमति रहेगी. अब विवाद यह उत्पन्न हुआ है, कि नई जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया प्रारंभ होगी, तो महिला आरक्षण कानून 2029 में लागू नहीं हो पाएगा. बीजेपी निश्चित रूप से इस तरह का प्रयास कर अपनी पार्टी को महिला हितैषी साबित करने में लगी हुई है. इसी लक्ष्य के साथ यह विशेष सत्र भी आयोजित किया गया लगता है. कांग्रेस ने भी सदन के भीतर महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए वर्तमान सीटों पर इसे देने का मुद्दा उठाया है. कांग्रेस का इस संबंध में लाया गया अशासकीय संकल्प गिर गया है.
यह तो निश्चित है कि महिला सेंटीमेंट इस आरक्षण के लिए क्रेडिट बीजेपी को ही दे रहा है. कांग्रेस और दूसरे दल भी इससे चिंतित हैं. लोकसभा में बिल गिरने के बाद बंगाल और तमिलनाडु में इसे चुनाव का बड़ा मुद्दा बनाया गया. प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर टीएमसी और डीएमके को कटघरे में खड़ा करने में कोई कमी नहीं रखी. कांग्रेस भी शायद यह समझती है, कि महिलाओं में अगर मैसेज पार्टी के खिलाफ गया तो इसका उन्हें राजनीतिक नुकसान हो सकता है.
इसीलिए कांग्रेस हर मंच पर यह साबित करने की कोशिश कर रही है, कि पार्टी महिला आरक्षण विरोधी नहीं है. महिला आरक्षण का एजेंडा बीजेपी ने सेट कर दिया दिया है. अब कांग्रेस को यह साबित करना है, कि वह महिला आरक्षण विरोधी नहीं है.
राज्य के कांग्रेस नेताओं के साथ ही राहुल गांधी भी महिलाओं के बीच इस तरह की सफाई पेश कर रहे हैं. नई दिल्ली में युवा, महिला छात्राओं के साथ नारी शक्ति वंदन बिल के विरोध का कारण बताते हुए वह कहते हैं कांग्रेस महिला आरक्षण विरोधी नहीं है. कांग्रेस ने तो परिसीमन के एजेंडे का विरोध किया. राहुल गांधी यह भी कहते हैं कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा. यह अलग बात है कि परिसीमन तो होगा ही और उसका आधार भी जनसंख्या होगी. दक्षिण और उत्तर भारत के राज्यों में संतुलन बनाने के लिए परिसीमन के पहले समानुपातिक वृद्धि को लेकर फैसला करना पड़ेगा.
मध्य प्रदेश विधानसभा में संकल्प पारित करने का तात्कालिक उद्देश्य राजनीतिक ही लगता है. इस संकल्प से महिला आरक्षण की वर्तमान स्थितियो में कोई बदलाव नहीं आएगा. अगर मध्य प्रदेश सरकार यह संकल्प नहीं भी पारित करती तब भी केंद्र सरकार का कमिटमेंट कमजोर नहीं होगा. पीएम नरेंद्र मोदी ने तो राष्ट्र के नाम संबोधन में मजबूती से कहा है कि उनकी सरकार महिला आरक्षण लागू करने के लिए अडिग है. विशेष सत्र परसेप्शन बनाने के लिए हो सकता है. इससे ये फायदा ज़रूर हो सकता है, कि पब्लिक सेंटीमेंट में महिला आरक्षण को लेकर पॉजिटिव प्रेशर बढ़ाया जाए. यही प्रेशर उन राजनीतिक दलों को मजबूर कर सकता है जो अब तक परिसीमन के साथ नारी वंदन अधिनियम का विरोध कर रहे हैं.
संसदीय व्यवस्था की गुणवत्ता के लिए आरक्षण के अलावा भी कुछ बड़ा करने की आवश्यकता है. चुनावी राजनीति और बहुमत का गणित कई बार जरूरी बदलाव को रोक देते हैं.
विधायिका पॉलिटिकल स्कोरिंग का मंच नहीं हो सकता. यहां तो राज्य के विकास के लिए नीति और कानून बनाए जाते हैं. विधायिका का चंदन खुशबू के तरीके से अगर महकेगा तो नारी वंदन की दिशा में जो भी ज़हर है वह अपने आप प्रभावहीन हो जाएगा.