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वाशिंगटन में शूट, भारत में जुबानी गोले

सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के डिनर में शूट आउट से दुनिया भर में हैरानी है. तो कांग्रेस भारत में उसे भी अपनी जुबानी गोले दागने का जरिया बना रही है. महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायक कह रहे हैं, ट्रंप पर गोलियां चलनी ही थीं. साथ ही यह भी कह रहे हैं भारत में भी लोगों की यही भावना है..!!

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विस्तार

    विधायक विजय वडेट्टीवार ने कहा कि जैसी करनी वैसी भरनी. भारत में भी जनता का मूड कुछ अलग नहीं है. वॉशिंगटन की घटना की जांच में यह सामने आया है कि हमलावर लोन वुल्फ अटैकर था. इसका मतलब वह किसी आतंकवादी संगठन से नहीं जुड़ा था. वह व्यवस्था से नाखुश था. व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश के कारण उसने इस घटना को अंजाम दिया. 

    दुनिया के किसी भी कोने में व्यवस्था के खिलाफ कोई भी आक्रोश हो कांग्रेस को भारत में व्यवस्था विरोध से जोड़ने में देर नहीं लगती है. नेपाल में जब जन विद्रोह हुआ था तब भी कांग्रेस यही कह रही थी. अब तो अमेरिकी राष्ट्रपति पर जानलेवा हमले की कोशिश को भी कांग्रेस के नेता भारत की जनता का मूड बताने का प्रयास कर रहे हैं.

    कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक अदावत और टकराहट स्वाभाविक है. विपक्ष के नाते जन आक्रोश उभारने का प्रयास भी जायज ठहराया जा सकता है, लेकिन अगर मानसिकता इस स्तर पर पहुंच जाए कि दुनिया के किसी कोने में जानलेवा हमले को भारत की जनता का मूड बताने दुस्साहस किया जाए तो फिर यह न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि कांग्रेस की विकृत मानसिकता का प्रमाण है. 

    महाराष्ट्र के विधायक की सोच कांग्रेस की जड़ से ही निकली है. जब नेपाल में घटनाक्रम हुआ था तब राहुल गांधी भी इसी तरीके की बात और सोशल मीडिया पोस्ट कर रहे थे. उन्होंने तो सार्वजनिक भाषण में यहां तक कहा कि वह दिन दूर नहीं है, जब देश के युवा पीएम नरेंद्र मोदी को डंडे मारेंगे. उनका घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा. 

    राजनीतिक विरोध के चलते कम से कम व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति पर जानलेवा हमले की कामना और उसे भारत के मूड से जोड़ना सर्वथा आपत्तिजनक है. कांग्रेस में ऐसा ट्रेंड बन गया है, भाजपा संघ और पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ जो भी नेता सीमा क्रॉस करेगा, उसको पार्टी से ज्यादा प्रोटेक्शन मिलने लगेगा. जब उनके नेता राहुल गांधी ही ऐसी भाषा और शब्दों का उपयोग करते हैं जो राजनीतिक शिष्टता से कोसों दूर होती है. जिनका वह कोई प्रमाण दे नहीं पाते हैं, तो फिर दूसरे नेताओं को तो उसका अनुसरण करना ही है. 

    राहुल गांधी स्वयं बताते हैं कि भारत की विभिन्न अदालतों में उन पर 36 मुकदमे चल रहे हैं. अधिकांश मामले उनके भाषणों और उनके द्वारा लगाए गए मानहानिकारक आरोपों पर आधारित हैं. राहुल गांधी आजकल शायद वोट चोर गद्दी छोड़ का अपना नारा भूल गए हैं. संवैधानिक रूप से जनादेश प्राप्त देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसा नारा राष्ट्रीय पार्टी के नेता प्रतिपक्ष जैसे गंभीर पद पर बैठे व्यक्ति से देश अपेक्षा नहीं करता है. महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायक आपत्तिजनक बयान देकर ना केवल राजनीतिक रूप से कांग्रेस में सुरक्षित रहेंगे बल्कि उन्हें शाबासी भी मिल सकती है. 

    लोकतंत्र लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर ही चलेगा. जनादेश ही उसकाअंतिम निर्णय होता है. कोई व्यक्ति व्यवस्था नहीं बनता. व्यक्ति को तो जनादेश व्यवस्था का नेतृत्व सौंपता है. जिस तरह के नेरेटिव केंद्र सरकार और पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस के नेता और राहुल गांधी फैलाने की कोशिश करते हैं. उसको जनादेश हमेशा नकारता रहा है. 

     देश में जनाक्रोश होना स्वाभाविक प्रक्रिया है. देश का हर नागरिक किसी भी व्यवस्था से पूरी तरह से खुश नहीं हो सकता है. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता नहीं हो सकती. राहुल गांधी हमेशा यह कहते हैं कि बीजेपी से कांग्रेस ही लड़ सकती है. यह सही भी हो सकता है लेकिन राजनीतिक लड़ाई तो राजनीतिक ढंग से ही होगी. डेमोक्रेटिक स्ट्रक्चर में हीं करनी पड़ेगी. किसी भी लीडर की सोच पर अगर डेमोक्रेसी मोहर नहीं लगाती, तो उसे अपनी सोच बदलनी ही पड़ेगी. पिछले लोकसभा चुनाव के बाद अब तक हुए विधानसभा के चुनावों में भाजपा ने जीतने का रिकॉर्ड बनाया है तो कांग्रेस ने हारने का.

    अब पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, इन राज्यों में अगर कांग्रेस अपेक्षित परिणाम नहीं हासिल कर पाती तो इसके लिए उसके विरोधी नहीं बल्कि उसको अपनी कमजोरी पर नजर डालनी चाहिए.

    राहुल गांधी कह रहे हैं कि ममता बनर्जी की सरकार में करप्शन है. टीएमसी की गुंडागर्दी है. कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की हत्या पर राहुल गांधी इतने नाराज हैं, कि सोशल मीडिया पोस्ट में भी टीएमसी की गुंडागर्दी पर बड़ा सवाल खड़ा किया है.

    बंगाल में अगर राजनीतिक पंडितों को राहुल गांधी और बीजेपी के नेताओं की भाषा एक जैसी लग रही है, तो परिणाम के बाद ममता बनर्जी हार या जीत दोनों स्थितियों में राहुल गांधी से तो दो-दो हाथ जरूर करेंगी. 

    कांग्रेस के विधायक समझ जाते हैं कि देश का मूड वर्तमान सरकार के खिलाफ है. जनता का मूड यही है कि वॉशिंगटन शूट आउट जैसा भारत में भी किया जाए. यह मूड  किसी और को नहीं दिखता, सिवाय कांग्रेस के. जितने भी चुनाव होते हैं, उनके परिणाम जनता का मूड बीजेपी के पक्ष में बताते हैं.

   कांग्रेस अगर जनता का मूड समझती होती तो सही निर्णय लेती, सही नेतृत्व और राज्यो में नेता चुनती, सही मुद्दे उठाती. जनभावनाओं के साथ अपने को जोड़ने में सफल होती. जब ऐसा करती तो उसके पक्ष में ईव्हीएम भी बोलता.

    जुबानी गोली-बारी से जनता का वोट नहीं बदलता. कम से कम शूट आउट की बात तो कांग्रेसियों को नहीं करना चाहिए. भारत में शूट आउट की दुर्भाग्यजनक में कांग्रेस ने अपने दो महान नेताओं इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को खोया है.