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दास्तान.. रिवर्स गियर में किए गए एक सफर की!

आशीष दुबे आशीष दुबे
Updated Tue , 29 Feb

सार

'आज तुम याद बेहिसाब आए...!

janmat

विस्तार

चुनाव के पहले यदि संभावनाएं काम करती हैं तो चुनाव के बाद सिर्फ मेहनत बोलती हैं। मप्र के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बरक्स यह बात साफ जाहिर होती है। भाजपा ने जिस लैंड स्लाइड बहुमत के साथ सरकार में वापसी की राह तैयार की, वह उसकी कभी बोलकर और कभी खामोशी से हुई मेहनत का नतीजा है। मगर वही लैंड स्लाइड कांग्रेस की राहें रोककर खड़ा हो गया है, कब तक और कितने समय के लिए फिलहाल तो कोई भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं है।

हार के सही कारण तलाशने आज मप्र कांग्रेस बैठी है, तो वही सही तरीके से इसे जान पाएगी, वह इन कारणों को कितना जाहिर करती है और कितना छिपाती है, यह उसकी मर्जी और अधिकार होगा। मगर, तय है कि अब मप्र में कांग्रेस को पुनर्गठन की राह पकड़नी ही होगी, विकल्पहीनता का बहाना भी नहीं चलेगा, यह नई कांग्रेस गढ़ने का वक्त है। हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने मेहनत नहीं की या उसके पास मुद्दे नहीं थे। बस, चंद महीने पहले सक्रियता दिखाना पर्याप्त नहीं था। वह भी तब, जबकि उसके सामने सबसे बड़ी चुनाव मशीनरी थी। यह जरूर है कि उसके मुद्दों में से कुछ हाइजैक हो गए, भाजपा के लिए काम भी कर गए, लेकिन प्यार, जंग और अब सियासत में यह सब जायज है। बेहतर होता कि जवाबी तौर पर उसके पास सटीक दांव होता, प्लान बी, सी या डी होता व किलर इंस्टिक्ट भी, जो भाजपा के पास है। अंदरखाने कमलनाथ का नेता-कार्यकर्ताओं से सीमित संपर्क, सीमित संवाद व असीमित ऑरा भी नुकसान का एक कारण माना जा रहा है।

फिलहाल तो कांग्रेस का सफर 2023 से 2008 का नजर आता है, यानि रिवर्स गियर वाला। पार्टी फिर वहीं नजर आ रही है, जहां दिसंबर 08 में थी। उस वक्त भी अक्टूबर तक सब पॉजिटिव लगता था, संभावनाएं बार- बार पीसीसी पर दस्तक दे रही थीं, यहां से मंत्रालय तक एक नयी राह निकलती नजर आ रही थी। इस बार भी ऐसा ही था, जनता भी अनमनी थी, सारे ज्वलंत मुद्दे उसकी पेशानी पर परेशानी की तरह नजर आते थे, मगर शुरूआत में टिकटों का और बाद में चुनाव प्रबंधन ही मुद्दों समेत 08 जैसा लड़खड़ाता नजर आया। इस बार भी, जनता कैसे भाजपा से कन्विंस हो गई, यह कांग्रेस के लिए केस-स्टडी की तरह होना चाहिए, जबकि कांग्रेस ने मप्र से बेहतर टक्कर भाजपा को एंटी इंकम्बेंसी से जूझते छत्तीसगढ़ व राजस्थान में दी।

खास बात यह है, कि भाजपा मप्र में इस तरह लड़ी जैसे साढ़े अठारह साल से विपक्ष में हो और कांग्रेस इस तरह लड़ती नजर आई जैसे साढ़े अठारह साल से सत्ता में हो ! शायद यही इस दास्तान का मर्म है। वैसे, आज समीक्षा में कांग्रेस व कमलनाथ को शिवराज शिद्दत से याद आएंगे, ठीक वैसे ही जैसा, फैज़ ने लिखा था- 'कर रहा था गमे जहां का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए । 'दूसरी ओर कुछ प्रतिकूलताओं के बावजूद भाजपा की टॉप लीडरशिप व मप्र में अपरिहार्य शिवराज की कामयाबी सियासी आख्यान की तरह सामने हैं और फैज़ की ही इन पंक्तियों की तरह है 'दूर थी राह, सर-ब-मंजिल, हम जहां भी पहुंचे कामयाब आए।'