देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस किसानों के लिए राज्य में आंदोलन करती है. कांग्रेस सरकार को ज्ञापन देने के अनुशासन को भी नहीं निभाती. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सीहोर में किसानों के लिए मांगों का ज्ञापन एक कुत्ते के गले में लटका देते हैं..!!
कांग्रेस में लोकतंत्र के लिए इससे घटिया सोच क्या हो सकती है. कुत्ते के गले में कलेक्टर लिखकर टांग दिया जाता है. उसी को ज्ञापन दिया जाता है और यह भी कहा जाता है कि उनका ज्ञापन सीएम तक पहुंचा देना. इससे दो संदेश निकलते हैं पहला तो यह कि किसानों के जिस मुद्दे पर आंदोलन किया जा रहा है उस मांग को अनुशासन पूर्वक प्रशासन को देना भी कांग्रेस उचित नहीं समझती. दूसरा संदेश यह भी हैकि कांग्रेस अपने अहंकार में प्रशासन की कुत्ते के साथ तुलना करती है. इसके पहले भी छिंदवाड़ा में ऐसा ही वाकया हुआ था, वहां भी कुत्ते के गले में ज्ञापन लटकाया गया था.
कांग्रेस में पशुता के प्रति अट्रैक्शन नया नहीं है. राज्य स्तर के नेता ही नहीं कांग्रेस का दारोमदार संभालने वाले राहुल गांधी भी कांग्रेस नेताओं की तुलना रेस, बारात लंगड़े घोड़े के रूप में रेखांकित करते हैं. कार्यकर्ताओं को बहादुर बताने के लिए भी तुलना बब्बर शेर से ही करनी पड़ती है. एमपी के कांग्रेस नेता कुत्ते को प्रशासन का प्रतीक मानते हैं. दोनों बार यह व्यवहार नेता प्रतिपक्ष के स्तर पर ही किया गया है. आंदोलन का कॉल कांग्रेस संगठन की ओर से दिया जाता है. संगठन और विधायक दल के बीच में रिश्ते कभी भी बहुत अच्छे नहीं रहते हैं. पीसीसी प्रेसिडेंट और नेता प्रतिपक्ष अपने आप को सीएम इन वेटिंग मानते हैं. इसीलिए संगठन के आंदोलन को किसी ना किसी रूप में कमजोर किया जाता है. कुत्ते के गले में ज्ञापन देना पूरे आंदोलन की गंभीरता को ही समाप्त करता है.
कुत्ते अपनी असीम वफादारी तेज सूंघने- सुनने की क्षमता और इंसानी भावनाओं को समझने के लिए जाने जाते हैं. वह ऐसे सामाजिक प्राणी हैं, जो सुरक्षा, स्नेह और साथीपन प्रदान करते हैं. कुत्ते जैसा इंटेलिजेंट प्राणी दूसरा नहीं होता. कांग्रेस अगर कुत्ते के गुणों को ही अपने आचरण में गंभीरता से लाने का प्रयास करे तो उसकी दुर्दशा थोड़ी कम हो सकती है. कांग्रेस से वफादारी की उम्मीद तो कोई भी नहीं करता है.
कांग्रेस में ना सुनने की क्षमता दिखती है और ना ही जन समस्याओं को सूंघने की शक्ति बची है. जब कांग्रेस आम इंसान की जन भावनाओं से ही डिस्कनेक्ट है, तो फिर वह कुत्ते की भावनाओं को कैसे समझ सकती है. कांग्रेस में नेता ही बचे हैं. कार्यकर्ता और सेवा भावना तो लुफ्तप्राय है. कांग्रेस में वही सफल दिखता है जो पद और परिवार से जुड़ा है. पीसीसी प्रेसिडेंट भी समर्थन मूल्य को लेकर कांग्रेस के प्रदर्शन में दो जिलों में गए, लेकिन उनकी ओर से कुत्ता ज्ञापन नहीं सौंपा गया है. ज्ञापन सौंपने की यह नई शैली कांग्रेस के मानसिक दिवालियापन का ही संकेत दिखाई पड़ती है.
किसी भी राजनेता का ऐसा अहंकार अंततः पार्टी पर ही भारी पड़ता है. कांग्रेस में अनुशासन जैसी कोई चीज बची नहीं है. राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग पर भी जब कांग्रेस कोई कार्रवाई नहीं कर पाती तो ऐसे अनैतिक आचरण पर तो कोई सवाल-जवाब का प्रश्न ही नहीं उठता.
मध्य प्रदेश की कांग्रेस पुराने और नए चेहरों के बीच फंसी हुई है. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह अब रिटायरमेंट के रास्ते पर हैं. जो युवा नेतृत्व संगठन और विधायक दल का नेतृत्व कर रहे हैं, वह पार्टी को दिशा देने में अब तक तो कुछ खास नहीं कर पाए हैं. जिनको भी पद मिल जाता है, वह सबसे पहले अपने आप को सीएम इन वेटिंग डिक्लेयर कर देता है.
कांग्रेस में न्यायालय के आदेश पर दो विधायकों की सदस्यता अधर में लटक गई है. दतिया के विधायक का वित्तीय घोटाले का मामला लंबे समय से अदालत में विचाराधीन था. दिल्ली के कोर्ट ने 3 साल की सजा सुनाई. एमएलए, एमपी को 2 साल से अधिक सजा अदालत से मिलते ही सदस्यता समाप्त होने का ऑटोमेटिक प्रावधान कानून में उपलब्ध है. उसी के तहत सदस्यता समाप्त की गई. लंबे समय से मुकदमा चल रहा था, तब ना तो विधायकदल और ना ही कांग्रेस संगठन की ओर से संबंधित विधायक से जानकारी ली गई और ना ही कोई मदद की गई.
एमपी में कांग्रेस बिना कमांडर की फौज जैसा व्यवहार करती दिखाई पड़ती है. पद पर बैठे नेता जो चाहते हैं वैसा व्यवहार करते हैं. उनके मिस कंडक्ट पर भी कोई सवाल नहीं पूछा जाता. कुत्ते को ज्ञापन देने की घटना कितनी गंभीर है, लेकिन फिर भी कांग्रेस में सब चुप्पी साधे हुए हैं. प्रशासन को कुत्ते के प्रतीक के रूप में दिखाना कांग्रेस के लिए क्या सामान्य घटना है?
प्रशासन के साथ मानहानिकारक व्यवहार राजनेताओं का शगल बन गया है. अपनी अथॉरिटी बताने के लिए राजनेता इस तरह का आचरण करते हैं. सार्वजनिक जीवन में आचरण ही सबसे बड़ी ताकत होती है. जो भी पब्लिक लाइफ में सफल होना चाहते हैं, उनको कुत्ते की भावनाओं को समझने और उसके गुणों को व्यवहार में उतरना सबसे महत्वपूर्ण है. अगर कोई राजनेता कुत्तों से वफादारी सीख ले तो फिर राजनीति की बुराइयां उसे छू भी नहीं पाएंगी.
काम करने का तरीका व्यक्ति के चाल-चलन और नैतिक मूल्यों को स्पष्ट करता है. आचरण ही सामाजिक मापदंड निर्धारित करता है. कुत्ते को कलेक्टर का प्रतीक बताना व्यक्तिगत जीवन में बर्ताव और चरित्र प्रकट करता है. खुद के आंदोलन का खुद ही मजाक कांग्रेस में ही बनाया जा सकता है.