• India
  • Sat , Mar , 14 , 2026
  • Last Update 10:14:AM
  • 29℃ Bhopal, India

टॉक्सिक राजनीति संकट में भी निभाती पैनिक रीति

सार

अमेरिका इजरायल ईरान युद्ध का असर भारत में चौके चूल्हे तक पहुंच रहा है. एलपीजी गैस की किल्लत और कीमत के नाम पर पैनिक फैलाया जा रहा है. केवल राजनीतिक दल ही नहीं आम लोग भी इसके शिकार हैं..!!

janmat

विस्तार

    जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग आपदा में अवसर तलाशने में जुट गई है. केंद्र और राज्य सरकारें भले ही दावा कर रही हैं कि डोमेस्टिक उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी का संकट नहीं आने दिया जाएगा लेकिन कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई रोक दी गई है. होटल और रेस्टोरेंट वाले परेशान हैं. भारत में एलपीजी गैस का प्रोडक्शन ही सीमित है तो फिर अगर युद्ध जारी रहा तो गैस और तेल का संकट बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता.

    एनर्जी किसी भी देश की अर्थव्यवस्थाऔर नेशनल सिक्योरिटी का आधार है. इस मामले में भारत आजादी के इतने वर्षों बाद भी ना आत्मनिर्भर नहीं है और ना ही इसकी कोई संभावना दिख रही है. दूसरे देश से आ रही गैस से चौका चूल्हा जल रहा है. यानी हमारा चौका-चूल्हा ही स्वतंत्र नहीं बल्कि आज भी परतंत्र है.

    देश की गति भी आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है. कुछ रिजर्व स्टाक भले ही हो लेकिन जब युद्ध रुकेगा तभी यह संकट भी कम हो सकता है. जिस तरह से आयल रिफाइनरीज पर हमले किए जा रहे हैं. युद्ध रुकने के बाद भी स्थिति सामान्य होने में महीनों लग जाएंगे.

    सरकारों को एनर्जी सिक्योरिटी में आत्मनिर्भरता के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता पर काम करने की जरूरत है. यह प्राकृतिक संसाधन है, ऐसा नहीं है कि भारत में इनकी संभावना नहीं है, केवल शोध और खोज की दिशा पर ज्यादा राशि और विशेषज्ञों को लगाना जरूरी है. इस युद्ध ने लोगों को उनके चौके और चूल्हे की दूसरे देश पर निर्भरता से परिचित कराया है. उनकी स्पीड भी उनके नियंत्रण में नहीं है. डीजल-पेट्रोल मिलना बंद हो जाएगा तो जीना दूभर हो जाएगा. महंगाई और बेरोजगारी भी बढ़ेगी. 

    जो संसाधन हमारे पास नहीं है, सरकार उसका प्रोडक्शन तो नहीं कर सकती केवल प्रबंधन और वितरण की प्राथमिकता के साथ ही जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग पर नियंत्रण सरकार की जिम्मेदारी है. इसमें अगर कोई भी ढिलाई होगी तो लोग सरकार को माफ नहीं करेंगे.

    सरकार की ओर से राहत के प्रयास और सप्लाई के वैकल्पिक प्रबंध किये जा रहे हैं, एलपीजी के नए रूट और प्रयास प्रारंभ हुए हैं. भारतीयों में यह मानवीय स्वभाव थोड़ा ज्यादा है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए उपयोग की वस्तु को जमा करके रखता है, नागरिकों की ओर से भी बिना आवश्यकता के एलपीजी जुटाने  की मानसिकता इस संकट को बढ़ाएगी. 

    जब भी संकट के हालात होते हैं तो ऐसे ही दृश्य दिखाई पड़ते हैं. कोरोना संकट के समय भी ऑक्सीजन के लिए मारामारी से कई लोगों में अपनी जानें गंवाई. भारत ने इस संकट का बाकी देशों की तुलना में बेहतर ढंग से मुकाबला किया था. जब देश में नोटबंदी हुई थी तब भी पैनिक पैदा किया गया था. नोट बदलने के लिए लंबी-लंबी लाइन और राजनीतिक दलों के डरावने बयान से देश में हालात खराब हुए थे. यद्यपि जब स्थितियां बहाल हुई तो इस बदलाव के लिए जिम्मेदार राजनीतिक दल पर लोगों ने चुनाव में भरोसा दिखाया. इससे एक बात साबित होती है कि राजनीतिक दल किसी भी संकट की स्थिति में अपनी राजनीति का पैनिक बटन चालू कर देते हैं. 

    एलपीजी और तेल के संभावित संकट पर भी इसी तरह की पैनिक पॉलिटिक्स हो रही है. विपक्षी दल संसद परिसर में रसोई गैस और तेल संकट को लेकर बैनर पोस्टर लहरा रहे हैं. राहुल गांधी इसके लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार बता रहे हैं. पीएम नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि राहुल गांधी देश में पैनिक फैलाने का काम कर रहे हैं.

    अगर एलपीजी के संकट को ही देखें तो इसके लिए क्या सरकार की कोई नीति या आदेश जिम्मेदार है या अमेरिका इजरायल ईरान युद्ध? भारत सरकार की नीति स्पष्ट है कि देशों के बीच विवादों का समाधान बातचीत से होना चाहिए.  राहुल गांधी अगर इसे भारत सरकार की विदेश नीति की असफलता के रूप में साबित करना चाहते हैं तो क्या इससे क्या संकट का समाधान हो जाएगा?

    विश्व में आज जो दौर दिखाई पड़ रहा है और इस युद्ध ने हमें जो सबक दिया है वह अपनी जरूरत के लिए आत्मनिर्भर होने का है, जो नेचुरल रिसोर्सेस अभी हमारे पास उपलब्ध नहीं है, उनकी खोज पर ज्यादा अटेंशन देना होगा. कोई भी देश केवल सेना से सुरक्षित नहीं हो सकता, सेना को भी एनर्जी सिक्योरिटी चाहिए, उनकी मोबिलिटी और वीपन भी बिना एनर्जी अपना लक्ष्य नहीं साध सकते.

    अभी एलपीजी  का संकट ऐसा नहीं है कि इसके लिए पैनिक के हालात बनाए जाएँ. संकट है लेकिन वितरण और प्रबंधन की सतर्कता से इसको नियंत्रित किया जा सकता है. पेट्रोल और डीजल के मामले में तो अभी ऐसा कोई संकट दिखाई नहीं पड़ता है.

    सरकारों को ब्लैक मार्केटिंग पर सख्त नजर रखनी होगी. आम लोगों को भी पैनिक से बचने की जरूरत है. एलपीजी के मामले में भारत अब तक स्वतंत्र ही नहीं हुआ है. रसोई गैस और डीजल-पेट्रोल के लिए उसकी परतंत्रता दूसरे देशों पर कायम है. इस दिशा में अब तक प्रयास नहीं किए गए तो इसके लिए राजनीति ही जिम्मेदार है.

    देश को यह तो सोचना ही पड़ेगा कि चौके-चूल्हे की परतंत्रता कैसे खत्म हो? यह दीर्घकालीन योजना का विषय है.  पूरी दुनिया को वही ताकतें कंट्रोल करेंगी जिनका एनर्जी पर कंट्रोल है. विश्व में युद्ध का प्रमुख कारण भी यही है. एनर्जी सिक्योरिटी पर परतंत्रता को न्यूनतम करने के लिए वैकल्पिक साधनों की ओर आगे बढ़ना देश की मांग है.