‘मैं धमकियों से नहीं डरता’, मानव-मल उठाने को मजबूर 41,000 बंधुआ मज़दूरों को दिलाई सम्मानजनक ज़िन्दगी!

“अगर एक इंसान भी देश में मल उठा रहा है या बंधुआ मज़दूर है तो यह हमारे पूरे देश के लिए शर्म की बात है। जो लोग इस काम के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाते वे भी उतने ही दोषी हैं जितना कि इस काम को करने वाले लोग। इसलिए, इस बुराई को खत्म करने के लिए व्यवहारिक बदलाव ज़रूरी है। जितना जल्दी हम बच्चों को इस अमानवीय प्रथा के बारे में समझा पायें उतना अच्छा है।”

यह कहना है 38 वर्षीय सोशल एक्टिविस्ट आसिफ़ शेख का। मध्य-प्रदेश में इंदौर जिले के मुकेरी मोहल्ले के एक दलित परिवार में जन्मे आसिफ़ ने जाति-भेद के चलते बचपन से ही बहुत-सी समस्याओं और अन्याय का सामना किया है। बहुत कम उम्र में ही उन्हें समझ में आ गया था कि यदि उन्हें इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ करना है तो सबको साथ में आगे आकर काम करना होगा। पढ़ाई के साथ-साथ आसिफ़ उन सामाजिक संगठनों से भी जुड़ते गए, जो जाति और धर्म के भेदभाव के विरुद्ध कार्य कर रहे थे। साल 1999 में उन्होंने अपनी उम्र के कुछ छात्रों को इकट्ठा किया और युवा मंच की स्थापना की। यह समूह ऐसे स्थानीय बच्चों को पढ़ाता था जिन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। उन्होंने अपने शहर में बच्चों के लिए ‘नाईट क्लास’ शुरू की और उन्हें बाल-श्रम से मुक्त किया।

जन-साहस संगठन- इसके बाद, साल 2000 में उन्होंने अपने सामाजिक संगठन, ‘जन साहस’ की स्थापना की। उनके इस संगठन का उद्देश्य सभी तरह के बंधुआ मजदूरों, मैला उठाने वालों, जाति-आधारित शारीरिक शोषण का शिकार महिलाओं, और रेप सर्वाइवर्स को किसी ढंग के और अच्छे रोज़गार से जोड़कर एक सम्मानित ज़िंदगी देना है। अब तक यह संगठन 41, 000 मल उठाने वालों को और बंधुआ मज़दूरों को पुनर्वासित करके उनकी ज़िन्दगी संवार चूका है।पर आसिफ़ का यहां तक का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। क्योंकि ये सब प्रथाएं हमारे देश में इस कदर बस चुकी हैं कि इनके खिलाफ कुछ करने के लिए आपको बहुत हिम्मत और साहस की ज़रूरत होती है। आये दिन धमकियाँ मिलना तो जैसे आसिफ़ की ज़िन्दगी का हिस्सा हो गया है। लेकिन शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाओं के बावजूद इस एक्टिविस्ट ने बदलाव की राह को नहीं छोड़ा और अन्याय के खिलाफ़ आज भी उनका संघर्ष जारी है। “अपने काम के दौरान हमारे एनजीओ में कार्यरत सभी लोगों ने कम से कम एक बार तो धमकियों का सामना किया ही है। कुछ गाँववालों ने तो मल उठाने के खिलाफ़ बोलने वाली एक स्थानीय महिला का घर ही जला दिया था। पर यह देखना प्रेरणादायक था कि डर उन्हें रोक नहीं पाया और जो सही है वे उसके लिए काम कर रहे हैं,”

बदलाव की मुहिम- अपने काम के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि सबसे पहले जन साहस की टीम द्वारा पिछड़े इलाकों में जाकर सर्वेक्षण किया जाता है ताकि पता लगाया जा सके कि कितने लोग इस तरह के भेदभाव का शिकार हैं। इसके बाद सभी लोगों को घर-घर जाकर जागरूक करते हैं। यदि कोई किसी को भी मल उठाने या फिर बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर करें, तो उनके खिलाफ़ क्या क़ानूनी कार्यवाही हो सकती है, इस बारे में भी बताया जाता है। हमारे देश में कानून होने के बावजूद लोग अक्सर जागरूकता की कमी के चलते और प्रक्रिया न पता होने के कारण इस गैर-क़ानूनी प्रथा का शिकार बन जाते हैं। इसलिए क़ानूनी प्रक्रिया सबसे पहला और सबसे ज़रूरी कदम है। साथ ही, बहुत बार इस काम में लिप्त समुदायों को भी समझाना बहुत मुश्किल हो जाता है। वर्षों से यह काम कर रहे लोगों को लगता है कि यही ज़िंदगी उनके लिए बनी है।

“एक दूसरी वजह है पैसा, जो लोग इस तरह का काम करते हैं। उन्हें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि हमारे पूर्वजों द्वारा बनाये गये ये रिवाज़ ही सबसे बड़ा सच हैं। जैसे जयपुर में एक समुदाय है, जहाँ पिता और भाई घर की महिलाओं का पैसे के लिए शारीरिक शोषण करते हैं,” उन्होंने बताया, जन साहस से जुड़ने के बाद इन लोगों को पुनर्वासन प्रोग्राम और सरकारी योजनाओं के तहत उन्हें रोज़गार के अन्य विकल्पों से जोड़ा जाता है। आसिफ़ आगे बताते हैं कि पुनर्वासन के बाद भी इन लोगों को समाज में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता है और निरक्षरता इस स्थिति को और बिगाड़ देती है। इसलिए वे अलग-अलग संगठनों और कॉर्पोरेट के साथ जुड़कर इनकी स्किल ट्रेनिंग करवाते हैं। इसके बाद, कोई छोटा-मोटा काम शुरू करने के लिए उन्हें फण्ड दिलाने में भी मदद करते हैं। उदाहरण के लिए एनजीओ अपने राष्ट्रीय ग्रामीण अभियान के तहत सामुदायिक संगठन बनाता है, जो कि मल उठाने की प्रथा के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं। यह एनजीओ स्वयं सहायता समूह भी बनाता है और सरकारी योजनाओं के ज़रिए उन्हें छोटे-मोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंक से माइक्रो-लोन दिलाने में मदद करता है।

रेप सर्वाइवर्स खुद लड़ रहे हैं अपने मुकदमे- इस संगठन ने आज तक लगभग 15, 000 रेप सर्वाइवर्स की भी क़ानूनी कार्यवाही और नौकरी आदि प्राप्त करने में मदद की है। यदि किसी के साथ कोई शारीरिक शोषण हुआ है तो जन साहस की टीम उन्हें सबसे पहले मेडिकल चेकअप के लिए लेकर जाती है और उनका इलाज करवाती है। “भारत में टू-फिंगर टेस्ट साल 2013 में ही बैन हो गया था पर फिर भी आज डॉक्टर इसे करते हैं। इस तरह की कमियों को पकड़ने के लिए हम खुद महिलाओं के साथ अस्पताल जाते हैं,” आसिफ़ ने कहा। इसके बाद पीड़ित की अपराधी के खिलाफ़ रिपोर्ट फाइल करने में और फिर उन्हें क़ानूनी कार्यवाही में भी मदद दी जाती है। एनजीओ इन लोगों को ‘बेयरफुट पैरालीगल्स’ बनने के लिए भी ट्रेन करता है ताकि वे खुद अपना केस लड़ सकें और किसी भी गलती की कोई गुंजाइश न रहे। ट्रेनिंग के बाद, ये महिलाएँ दूसरों की मदद भी कर सकती हैं। इसके अलावा कुछ समय पहले उन्होंने रेप सर्वाइवर्स के लिए डिग्निटी मार्च आयोजित किया था, जिसमें 5000 लोगों ने भाग लिया। तीन महीने तक चलने वाले इस मार्च में उन्होंने 22 जिलों को कवर किया। एक एक्टिविस्ट और गैंग-रेप सर्वाइवर भंवरी देवी ने बताया कि उन्हें उनके शारीरिक शोषण से भी ज़्यादा लोगों द्वारा दिए गये मानसिक तनाव और शर्म ने आहत किया। “मैंने शर्म की वजह से छह गाँव बदले। हमारे साथ जो हुआ हम उसे बदल नहीं सकते, लेकिन हम अपनी बहनों-बेटियों को इस तरह के शारीरिक शोषण का शिकार होने से ज़रूर बचा सकते हैं। साथ ही, हम अपनी साथी बहनों से, जिन्होंने यह शोषण सहा है, अपील करते हैं कि आगे आएं और बोलें क्योंकि यह संघर्ष न्याय के लिए है और सबसे ज़्यादा समाज में अपने खोये हुए सम्मान को वापस पाने के लिए।” इसके पहले भी जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने देश में कई पदयात्राएं की हैं। लोगों को अन्याय के खिलाफ जोड़ने का यह इस संगठन का सबसे प्रभावी तरीका है। साल 2006 में हुई उनकी सबसे पहली यात्रा में 40 महिलाओं ने देवास जिले के 16 गांवों में जाकर लोगों को मल उठाने के खिलाफ़ प्रोत्साहित किया, उन्हें समझाया और नतीजन 60 परिवारों ने यह काम छोड़ दिया।

आसिफ़ ने अब ऐसे समुदायों की नाबालिग लड़कियों को बचाने की पहल शुरू की है जहाँ उन्हें सेक्स-वर्कर बनने के लिए फाॅर्स किया जाता है। एनजीओ अब तक इस तरह की 6, 000 लड़कियों को बचा चूका है। आसिफ़ एक उद्देश्य के साथ जीने वाले व्यक्ति है। उन्हें न तो कभी लोगों के ताने, बातें, व्यवहार और धमकियां रोक पायीं और न ही किसी भी तरह का कोई हमला। उन्होंने हमेशा अपने मन की आवाज़ सुनी है और वे आज भी इन लोगों के लिए एक बेहतर समाज बनाने में जुटे हैं।

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