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प्रशासनिक सर्जरी तभी उपयोगी, जब प्रशासन की प्रवृत्ति बदले, ताश के पलों की तरह फैंटने से कुछ नहीं होगा -दिनेश मालवीय

सार

कुछ बड़े अधिकारी बदले जाते हैं, तब मीडिया की हैडिंग होती है, कि “मुख्यमंत्री ने बड़ी प्रशासनिक सर्जरी की”, आज प्रशासनिक प्रवृत्ति बदलने वाली सर्जरी की ज़रुरत..

janmat

विस्तार

प्रशासनिक सर्जरी एक ऐसा पसंदीदा शब्द है, कि राजनीति और मीडिया में इसका ख़ूब प्रयोग होता है. जब भी कुछ बड़े अधिकारी बदले जाते हैं, तब मीडिया की हैडिंग होती है, कि “मुख्यमंत्री ने बड़ी प्रशासनिक सर्जरी की”. कभी यह नहीं सोचा जाता, कि ताश के बावन पत्ते होते हैं. कितनी भी बार उन्हें फैंटा जाए, लेकिन पत्ते तो उतने ही और वही रहेंगे. जिस बट्टे का जो शतं है, वह जगह बदलने से नहीं बदलता. बेगम बेगम रहेगी और बादशाह बादशाह.  ऐसी परिस्थितियों में प्रशासनिक सर्जरी का कोई ख़ास असर नहीं होता. फर्क तब पड़ेगा, जब सर्जरी से प्रशासनिक प्रवृत्ति बदली जाये. ऐसा कई बार देखने में आया है, कि घुड़सवार की सफल रणनीति और पहल से घोड़े की चाल बदल जाती है. आज प्रशासनिक प्रवृत्ति बदलने वाली सर्जरी की ज़रुरत है.
 
हर साल प्राकृतिक मौसमों की तरह शासन में एक “तबादला मौसम” आता है. इसमें अफसरों और कर्मचारियों के थोकबंद तबादले किये जाते हैं. तबादलों में कथित “पारदर्शिता” दिखाने के लिए अमूमन हर साल एक तबादला नीति बनायी जाती है. तबादला बोर्ड जैसी भी कोई चीज़ है. लेकिन तबादले कैसे होते हैं, यह अब कोई बहुत रहस्य की बात नहीं रह गयी है. इसको देखते हुए एक शब्द “तबादला उद्योग” भी प्रचलित हुआ है. प्रशासन में अफसरों और कर्मचारियों के तबादले आवश्यक माने जाते हैं. यह सही है, कि किसी एक जगह पर बहुत अधिक समय तक पदस्थ रहने पर अफसरों और कर्मचारियों के निहित स्वार्थ विकसित होने का ख़तरा रहता है. लेकिन यह बात सभी लोगों पर लागू होनी चाहिए. ऐसा देखा जाता है, कि कुछ लोगों के बार-बार तबादले होते रहते हैं, जबकि कुछ लोग जिस जगह नौकरी में आते हैं, वहीं से रिटायर हो जाते हैं. इसका कारण समझने के लिए भी बहुत असाधारण समझ की ज़रुरत नहीं है.
 
केंद्र सरकार में अवश्य हर पदस्थी की सीमा तय है, जिसके बाद बदली कर ही दी जाती है. लेकिन राज्य सरकारों में ऐसा नहीं है. भ्रष्टाचार की शिकायत, किसी घटना के कारण या किसी अन्य वजह से किये जाने वाले तबादलों के मामले में यह बात विचार में आती है, कि क्या जिस अधिकारी या कर्मचारी को एक जगह से दूसरे स्थान पर पदस्थ किया जाता, वहाँ उसकी प्रवृत्ति बदल जाती है. क्या वह अपनी नयी पदस्थापना की जगह वही सब नहीं करेगा, जो वह पहले की पदस्थी के दौरान करता था? बात सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं है, अनेक तरह की प्रवृत्तियाँ होती हैं, जो रिटायरमेंट तक नहीं बदलती.
 
मसलन काम को टालना, लोगों को परेशान करना, उनके काम करने में लेतलाली करना, समय का पाबंद नहीं होना, अपने से छोटे कर्मचारियों से बुरा व्यवहार नकारात्मक रवैया, वगैरह. इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए शासन के स्तर पर कुछ प्रयास किये जाते हैं. अनेक तरह के प्रशिक्षण दिए जाते हैं, रिफ्रेशर कोर्स करवाए जाते हैं और इनमें शासकीय सेवकों को बहुत तरह की बातें समझाई जाती हैं. प्रशासनिक सुधार के नाम पर बहुत सारे काम किये जाते हैं, जो आगे चलकर सिर्फ कर्मकाण्ड ही साबित होते हैं. हमारे प्रदेश में तो “सुशासन संस्थान” जैसी एक अलग ही संस्था स्थापित की गयी है, लेकिन कुछ ठोस नतीजे सामने नहीं आ सके हैं. सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है.
 
शासकीय सेवकों की सोच और वृत्ति में सुधार लाने के लिए अध्यात्म का सहारा भी लिया गया. कभी सरकारी अफसरों-कर्मचारियों को  श्री श्री रविशंकर की “सुदर्शन क्रिया” सिखाई गयी, तो कभी आशाराम बापू को बुलाकर उनके प्रवचन करवाये गये. और भी कुछ संतो ने आकर कुछ प्रयास किये.  इसके अलावा और भी प्रयास हुए. बहुत तामझाम के बनाए गए आनंद विभाग (अब  अध्यात्म विभाग) ने भी अनेक प्रयोग किये, जिनमें “अल्प विराम”जैसे कार्यक्रम किये गये. यह बहुत अच्छा प्रयोग था, लेकिन शासकीय सेवकों के ही क्या, किसी के भी चित्त और प्रवृत्ति को बदलना इतना आसान नहीं होता. अब सवाल उठता है, कि शासन-प्रशासन को किस विधि से इस प्रकार चलाया जाए, कि वह जन आकांक्षाओं के अनुरूप काम कर सके? कुछ लोगों की राय है, कि कठोरता और दण्ड से ऐसा होना संभव है. लेकिन यह भी कोई कारगर उपाय नहीं साबित होता. जब तक मनुष्य के भीतर से स्वयं ही अनुशासन पैदा नहीं हो, बाहर से थोपा हुआ कोई भी अनुशासन वांछित परिणाम नहीं दे सकता.
 
पूरे देश के हर राज्य में कमोवेश स्थिति यही है,कि अपने काम करवाने के लिए आम लोग दफ्तर-दफ्तर टल्ले खाते फिर रहे हैं. कतिपय “अनुष्ठान” होने पर ही कोई काम हो पाता है. किसी कर्मचारी द्वारा गलत काम किये जाने की शिकायत भी कोई काम नहीं आती, क्योंकि उसे “ऊपर” से संरक्षण मिला होता है. छोटे-छोटे से उदाहरण हमारे सामने हैं. जब कोई मंत्री या मुख्यमंत्री गांवों के दौरे पर जाते हैं, तो उन्हें इतने शिकायती आवेदन मिलते हैं, कि उन्हें बोरों में भरकर लाया जाता है. आवेदन देने वाले ख़ुश होकर आस लगाते हैं, कि अब उनकी समस्या का समाधान हो जाएगा. लेकिन कुछ समय बाद या दुराशा साबित हो जाती है. जन शिकायतों के निवारण के लिए अलग से विभाग तक बनाया गया. यह तो नहीं कह सकते, कि यह नाकाम हो गया, लेकिन बहुत कामयाब भी नहीं कहा जा सकता.
 
सुशासन के लिए सूचना प्रौद्योगिकी आधारित उपाय भी बहुत आशा के साथ किये गए. लेकिन उस व्यवस्था को चलाने का काम भी तो उन्हीं लोगों के पास है, जिनकी प्रवृत्ति केवल टालने की है. यह ज़रूर एक बहुत अच्छी बात है, कि सभी अधिकारी या कर्मचारी ऐसे नहीं होते. इनमें ऐसे लोग भी हैं, जो भ्रष्टाचार नहीं करते (या जिन्हें इसका मौक़ा नहीं मिलता). ऐसे भी लोग हैं, जो उनके पास समस्या लेकर आने वाले लोगों की समस्या का समाधान करने के लिए पूरी निष्ठा से प्रयास करते हैं. ऐसी स्थिति में जो काम उनके स्तर पर होना होता है, वह तो हो जाता है, लेकिन इसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के पास फाइल जानी हो, तो इस बात की गारंटी नहीं है, कि बिना “अनुष्ठान” के काम हो ही जाए.
 
लेकिन ऐसी अच्छी प्रवृत्ति के लोग कम ही होते हैं. सामान्यत: लोग टालू प्रवृत्ति के ही होते हैं या परपीड़क टाइप के होते हैं. ऐसी स्थिति में जन सेवकों की प्रवृत्ति बदलने के लिए क्या किया जाए, यह किसी की समझ में नहीं आता. किस तरह एक ऐसी कार्य संस्कृति विकसित की जाए, जो आम लोगों के हित में काम करें. खैर सबकी प्रवृत्ति को बदलना तो इतना आसान नहीं है,लेकिन यदि ऊपर बैठे लोग कोई आदर्श सामने रखें, तो इसका असर हो सकता है. सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह तबादला करने से  कुछ हासिल नहीं होने वाला. स्थान बदलने से व्यक्ति नहीं बदलता.