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अमल नहीं करा सकते तो पाबंदी का क्या फायदा -दिनेश मालवीय

सार

सवाल यह है, कि जब किसी पाबंदी पर अमल नहीं कराया जा सकता, तो पाबंदी लगाने का औचित्य ही क्या है?

janmat

विस्तार

इस साल दीपावली पर एक आशा दुराशा और भोली नादानी साबित हुयी. यह माना जा रहा था, कि देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा पटाखों के लिए जो निर्देश दिए हैं, उनका लोग निष्ठा से पालन करेंगे. लेकिन यह गलत साबित हो गया. पूरी रात पटाखों के ज़ोरदार धमाके होते रहे. बारूद की घातक दुर्गंध ने प्राणदायी वायु प्राणघातक रूप लेने लगी.

दिल्ली की जो जानकारी सामने आयी है, वह बहुत चिंताजनक है. भोपाल में भी रातभर धमाके होते रहे. यह कतिपय स्तर तक के धमाकों वाले पटाखे सीमित समय तक चलाने की इज़ाज़त दी गयी थी, लेकिन इसका बिल्कुल पालन नहीं हुआ. देश के दूसरे शहरों में भी कमोवेश यही स्थिति रही.

अब सवाल यह है, कि जब किसी पाबंदी पर अमल नहीं कराया जा सकता, तो पाबंदी लगाने का औचित्य ही क्या है? इससे सरकार का बचा खुचा इकबाल भी मिट्टी मिल जाता है. क्या प्रशासन को यह दिखा नहीं, कि पटाखों की दुकानों पर प्रतिबंधित पटाखे बिक रहे हैं? क्या वास्तव में अधिकारी इतने बेखबर हैं? ऐसा लगता तो नहीं है. बात कुछ अलग ही लगती है.

कथित “बुद्धिजीवियों” की नादानी

इस विषय में कथित “बुद्धिजीवियों” की नासमझीपूर्ण बातों की भी बहुत बड़ी भूमिका रही. उन्होंने सोशल मीडिया पर जमकर यह अभियान चलाया, कि “ख़ूब पटाखे चलाओ”. इससे भी बड़ी भूल या शरारत यह हुयी, कि इसे धर्म से जोड़ दिया गया. कुतर्क दिया गया, कि ने साल पर और क्रिसमस पर पटाखे चलते हैं, तो दीपावली पर इन पर पाबंदी क्यों? इस बात में कुछ सच्चाई अवश्य है, लेकिन इस बात को दूसरे ढंग से भी कहा जा सकता था.

वैसे देखा जाए, तो किसी भी त्यौहार या ख़ुशी के मौके पर पटाखे चलाने और बारूदी विस्फोट करने की ज़रुरत ही क्या है?प्राचीनकाल से ही भारत में  त्यौहार इस प्रकार मनाने की परंपरा रही है, कि उनसे प्रकृति के संरक्षण का संदेश प्रसारित हो. अब तो इसके एकदम विपरीत ही हो रहा है. अब त्यौहार प्रकृति का नुकसान ही अधिक कर रहे हैं. हर चीज का स्वरूप विकृत हो रहा है.

आम जनता और निहित स्वार्थ वाले “बुद्धिजीवियों” से तो कोई उम्मीद की जाना व्यर्थ है. सरकार को देश में पटाखों और विस्फोटक सामग्री के निर्माण और सार्वजनिक उपयोग को भी पूरी तरह बंद कर देना चाहिए.

बिहार में शराबबंदी की दुर्दशा

दीपावली पर बिहार में ज़हरीली शराब पीने से अनेक लोगों की मौत की बहुत हृदयविदारक खबर भी आयी. उस राज्य में नीतीश सरकार ने शराबबंदी लागू की, जिसका ख़ूब ढिंढोरा पीटा गया. लेकिन प्रतिबन्ध लगने के बाद स्थिति और ख़राब हो गयी. जिसे शराब पीना है, वह तो किसी न किसी तरह उसकी जुगाड़ कर ही लेता है. आसपास के राज्यों से शराब की जमकर तस्करी होती है. लोग अपने स्तर पर भी शराब बनाने लगते हैं. कई लोग शराब बनाने की प्रक्रिया में या उसमें मिलाई जाने वाली सामग्री में इस प्रकार गड़बड़ी करते हैं, कि उपभोक्ता तक पहुँचते-पहुँचते वह ज़हरीली हो जाती है.राज्य सरकार और प्रशासन तो अपनी सफाई देते ही रहेंगे, लेकिन अपनी प्रशासनिक दक्षता में कमी को दूर करने की कोई  गंभीर कोशिश नहीं करेंगे.

शराबबंदी के पीछे सोच तो अच्छी ही रही है, लेकिन व्यावहारिक नहीं है. प्राचीनकाल से ही कहीं किसी राज्य में ऐसा नहीं रहा, कि वहां मदिरा पर पाबंदी लगायी गयी हो. महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भी मदिरा पर पाबंदी नहीं थी. चाणक्य ने “अर्थशास्त्र” में कहा है, कि मदिरा पीने वालों को अच्छी गुणवत्ता की मदिरा मिलनी चाहिए. उनके लिए सुविधाजनक ढंग से मदिरापान की व्यवस्था कि जानी चाहिए. इसमें चाणक्य की मानव स्वभाव की व्यवहारिक का पता चलता है. 

गुजरात में बिहार  से बहुत पहले शराबबंदी लागू है. लेकिन जिसे जहाँ भी शराब चाहिए होती है, वह उसे बहुत आसानी से मिल जाती है. यह बात किसीसे छिपी नहीं है. इससे तो अच्छा था, कि शराबबंदी के  बजाये, ऐसे कदम उठाये जाते, जिनसे लोगों में शराब पीने की आदत कम होती. अच्छी गुणवत्ता की शराब मिलती. इसका अवैध निर्माण और व्यापार नहीं होता. इससे मदिरा से सरकार को मिलने वाले राजस्व में भी कमी नहीं आती.

इस प्रकार निष्कर्ष रूप से यही कहा जा सकता है, कि किसी चीज पर अगर पाबंदी लगाई जाती है, तो उस पर पूरी सख्ती से अमल कराया जाना चाहिए. ऐसा नहीं होने पर आम लोगों का  सरकारी फरमानों और कानूनों पर विश्वास उठ जाता है.