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बेचारे ग़रीब अमिताभ बच्चन, संजय दत्त, अजय देवगन आदि, “संत” प्रकाश झा.. दिनेश मालवीय

सार

हमारे फिल्मी महानायक और नायक कितने ग़रीब हैं, ये उन चीज़ों का विज्ञापन कर रहे हैं, जो पूरे समाज, विशेषकर नौजवानों की शारीरिक-दिमागी सेहत के साथ ही उनके चरित्र के लिए बहुत नुकसानदायक हैं.

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विस्तार

बेचारे ग़रीब अमिताभ बच्चन, संजय दत्त, अजय देवगन आदि, “संत” प्रकाश झा.. दिनेश मालवीय



टेलीविजन पर एक कार्यक्रम देखते हुए, मुझे ख़याल आया, कि हमारे फिल्मी महानायक और नायक कितने ग़रीब हैं! बताइये, उन्हें फिल्मों से इतनी भी आमदनी नहीं हो रही, कि उन्हें विज्ञापनों से पैसा कमाने की मजबूरी आन पड़ी. वैसे विज्ञापनों से पैसा कमाना कोई अपराध नहीं है और न यह प्रोफेशनल एथिक्स के खिलाफ है. फिर मेरे मन में उनके प्रति विपरीत विचार क्यों आया ?


यह इसलिए आया, क्योंकि ये सभी बड़े सितारे अपना सामाजिक दायित्व नहीं निभा रहे हैं. ये उन चीज़ों का विज्ञापन कर रहे हैं, जो पूरे समाज, विशेषकर नौजवानों की शारीरिक-दिमागी सेहत के साथ ही उनके चरित्र के लिए बहुत नुकसानदायक हैं. अगर ये लोग किसी प्रोडक्ट को इंडोर्स करने से पहले उसके सामाजिक और नैतिक पहलू को देख लें, तो क्या वे अपने देश और समाज की बड़ी सेवा नहीं कर रहे होंगे ?


ज़रा एक बानगी देखते हैं, कि कौन फिल्मी सितारा किन चीजों का विज्ञापन कर रहा है. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन “कमला पसंद” रणबीर कपूर के साथ  पान मसाले का विज्ञापन कर रहे हैं. अजय देवगन और शाहरुख खान भी “ विमल” पान मसाले को इंडोर्स कर रहे हैं. टाइगर श्रॉफ “पान बहार” की बिक्री बढ़ाने में लगे हैं. सलमान खान “राजश्री” पान मसाला बेच रहे हैं.


और हाँ, देश के लाड़ले संजू बाबा यानी संजय दत्त, लाखों लोगों के दिल की धड़कन ऋतिक रोशन, बिहारी बाबो शॉटगन यानी शत्रुघ्न सिन्हा शराब के विज्ञापन कर रहे हैं. आज के आधुनिक देशभक्त कहे जाने वाले अक्षय कुमार भी पीछे नहीं हैं. वह एक चड्डी का विज्ञापन कर रहे हैं, जिसकी भाषा द्विअर्थी है. अपने परिवार के साथ इस विज्ञापन को देखते हुए झेंप होने लगती है. वैसे कानूनन देखा जाए, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. उपरोक्त चीजें न तो देश में प्रतिबन्धित हैं और न इनका उपयोग करने वालों की तादाद कम है. यह प्रोफेशनल एथिक्स के खिलाफ भी नहीं है.


लेकिन सवाल तो यह है, कि इन कलाकारों के पास पैसे की क्या कमी है ? इन्हें अपनी फिल्मों से ही इतनी आमदनी होती है, कि इनकी आने वाली कई पीढ़ियाँ धनवान बनी रहेंगी. माना कि पैसा कमाने की कोई सीमा नहीं होती. कोई कितना भी पैसा कमाए, किसी का पेट क्यों दुखना चाहिए ? लेकिन ऐतराज़ पैसा कमाने से नहीं, उसके तरीक़े से है.


यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है, कि पान मसाले के उपयोग से केंसर बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इसके खिलाफ जन जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. हालाकि, सवाल यह भी है कि अगर सरकार जानती है, कि ऐसा हो रहा है, तो इन पर पाबंदी क्यों नहीं लगाती ? खैर, सरकार की जो भी मजबूरी हो, लेकिन उन लोगों की क्या मजबूरी है, जिन्हें करोड़ों लोग, खासकर नौजवान अपना आदर्श मानते हैं ? शराब का प्रचलन बढ़ना भी युवा पीढ़ी के हित में नहीं है.  


इन विज्ञापनों को करना इन सितारों की कोई मजबूरी नहीं है. यह सिर्फ समाज के प्रति दायित्व बोध की कमी है. पुराने महानायकों को देखिये, उन्होंने विज्ञापन किये ही नहीं. दिलीप कुमार, देवानंद, राज कपूर, राजकुमार, संजीव कुमार आदि ने या तो कोई विज्ञापन किये ही नहीं और अगर किये, तो इस बात का बहुत ध्यान रखा, कि इससे समाज में क्या संदेश जाएगा.


आज के लगभग सभी फिल्मी सितारे बहुत पढ़े-लिखे और देश-दुनिया की खबर रखने वाले लोग हैं. इन्हें कुछ भी सिखाने की ज़रुरत नहीं है. इन्हें सब पता है. देश के लोगों ने इन्हें सिर आँखों पर बैठाया है. इतना सबकुछ होने के बाद भी ये देश और समाज के प्रति अपने दायित्यों के प्रति इतनी ग़ैर-ज़िम्मेदार क्यों हैं ? इस बात पर ये लोग खुद ही आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण करें तो बेहतर होगा. इन्हें इस तरह के विज्ञापन प्रस्तावों को सिरे से नकार देना चाहिए.


“संत” प्रकाश झा


हाल ही में भोपाल में “आश्रम” नाम की वेब सीरीज की शूटिंग के दौरान बजरंग दल के कुछ लोगों ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया, जो अभद्रता की श्रेणी में आता है. इस घटना को लेकर अनेक बुद्धिजीवी प्रकाश झा की तारीफ़ और बजरंग दल की आलोचना करते नहीं थक रहे. कुछ तो इस तरह की घटनाओं का इंतज़ार ही करते रहते हैं, ताकि एक राजनैतिक विचारधारा की आलोचना कर सकें. लेकिन इन बुद्धिजीवियों की कलम से एक शब्द भी प्रकाश झा के विरोध में नहीं निकला.


इनमें से कोई भी यह नहीं कह रहा, कि प्रकाश झा को फिल्म निर्माण में इस बात का ध्यान रखना चाहिए, कि किसी भी धर्म का गलत ढंग से प्रस्तुतिकरण नहीं हो. हिन्दू ही नहीं, किसी भी धर्म की गलत छवि क्यों पेश की जाए ? जिस बात को वह सत्य समझते हैं, उसे इस तरह भी बताया जा सकता है, कि उससे किसी पूरे समुदाय के बारे में गलत धारणा नहीं बने.


“आश्रम” वेब सिरीज में सत्य दिखाने के नाम पर अश्लील दृश्य दिखाने की बात भी सामने आयी है. इसकी छूट किसी को नहीं दी जा सकती. सरकार कुछ नहीं करेगी, तो किसी को तो कुछ करना ही पड़ेगा. हर कोई अपने ढंग से विरोध करता है. पढ़ने में यह भी आया है, कि इस घटना के एक दिन पहले बजरंग दल के कुछ लोगों ने झा से मिलकर उन्हें समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें बाहर से ही भगा दिया गया.  


इसके अलावा बुद्धिजीवियों ने यह नहीं देखा, कि प्रकाश झा के मुंह पर सिर्फ स्याही लगायी गयी. किसी और धर्म के साथ उन्होंने ऐसा किया होता, तो खून खराबा हो गया होता. उनका जीना मुश्किल हो जाता. ये लोग “सहिष्णुता” की बात कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं समझ रहे, कि कोई समाज अपने धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का अपमान कब तक सहन कर सकता है ?


चन्दन की लकड़ी को भी बहुत रगड़ो, तो उसमें से भी चिंगारी निकलने लगती है. इसी भोपाल शहर में एक सिनेमाघर में एक पुलिसकर्मी का हाथ कटे जाने की घटना इन्हें याद नहीं है. इसके बाद भी, जिन लोगों ने झा के साथ ऐसा व्यवहार किया, उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की ही जा रही है.


प्रकाश झा हिन्दी फिल्मोद्योग के बहुत पढ़े-लिखे और प्रगतिशील लोगों में गिने जाते हैं. उन्होंने बहुत अच्छी फ़िल्में बनायी हैं, जो व्यावसायिक रूप से भी काफी सफल रही हैं. हो सकता है इस वेब सीरीज को बनाने के पीछे उनका मकसद अच्छा हो, लेकिन अच्छा काम भी गलत तरीके से करने पर गलत हो जाता है. यह तो माना ही जाना चाहिए, कि झा का मकसद पैसा कमाना है, वह कोई “संत नहीं हैं.