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केंद्र-राज्य संबंध: कुछ विचारणीय बिंदु 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 20 Jul

सार

केंद्र-राज्य संबंध में निरंतर ह्रास जारी, विकास और प्रशासन दोनों ही प्रभावित...

janmat

विस्तार

केंद्र-राज्य संबंध ऐसा क्षेत्र हैं, जिसमें निरंतर ह्रास जारी है और जिसके परिणामस्वरूप विकास और प्रशासन दोनों ही प्रभावित होते हैं। आज भारत विश्व का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश और सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। मध्य-आय वाले मुल्क में बदलाव के क्रम को बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि आने वाले दशकों में भी यह विकास गाथा सतत और ऊर्जावान बनी रहे। करोड़ों लोगों को गरीबी और न्यून आय श्रेणी से ऊपर उठाना अत्यंत कठिन काम है। इसी को लेकर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच शहर की सिविल सेवाओं की निगरानी और नियंत्रण पर हक को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में दायर किए गए केस में आये फैसले से यह विवाद खत्म हो सकते हैं ।

वैसे यह बहुत दुरूह है, ग्रामीण समाज और कृषि आधारित आर्थिकी का बतौर शहरी और औद्योगिक रूपांतरण करना। नीति निर्धारण, व्यवस्था, जवाबदेही और सामान्य कानून-व्यवस्था संचालन हेतु संस्थानों का विकास और सुदृढ़ीकरण एक ऐसी बुनियाद है जिसपर कोई देश निर्मित होता है । इसके लिए केंद्र-राज्य संबंध अच्छे बने रहने की अहमियत बहुत है। देश में पहले भी विभिन्न राजनीतिक दलों की केंद्र सरकारें रही हैं, लेकिन राज्यों की शक्ति धीरे-धीरे संकुचित करते हुए ताकत अपने पास केंद्रित करने की प्रवृत्ति सब सरकारों की रही है। केंद्र की एजेंसियों की भांति राज्यपाल का इस्तेमाल बतौर एक औजार राजनीतिक मामलों में दखलअंदाजी करने में बढ़ता चला गया। राज्यपाल का पद बनाने का मंतव्य था, कि वह भारत सरकार का प्रतिनिधि बनकर अपने संवैधानिक दायित्व निभाएगा और केंद्र-राज्य सरकार के बीच संबंधों को मधुर रखेगा । आज अधिकांश राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच रिश्ते कटु हैं और यह बात सार्वजनिक रूप से सबको मालूम  है। राजभवनों में जिस किस्म के राजमर्मज्ञ भाव की मौजूदगी होनी चाहिए, वह गायब है और राजनीतिक कार्यकर्ता बनने का रुझान हावी हो रहा है। इसलिए राज्य सरकारें एक अनुभवी और सक्षम शख्सियत की नेक सलाह से वंचित हैं।

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का अंग है और केंद्रीय सरकार का मुख्यालय भी वहीं है, इसलिए प्रशासनिक शक्ति के बंटवारे को लेकर सदा अस्पष्टता रही है जब से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है, केंद्रीय गृह मंत्रालय समय-समय पर आदेश जारी करता आया है, नतीजतन शासन चलाने के अधिकार उप-राज्यपाल के हाथों में केंद्रित होते चले गए और निर्वाचित सरकार कमजोर बनती गई। इससे दिल्ली सरकार के लिए न केवल तबादले और नियुक्तियां करने में अड़चनें पैदा हुईं बल्कि नीति निर्धारण और क्रियान्वयन में भी रोड़े अटके। इससे एक-दूसरे पर दोषारोपण और प्रत्युत्तर जमकर चले व आपसी कलह सार्वजनिक हुई। 

ज्यादातर वित्तीय मामलो में राज्यपाल-सूबे की सरकार के बीच तनातनी अधिक दिखाई देती है। हालांकि वित्त-प्रबंधन राज्यों का विषय है लेकिन राष्ट्रीय खजाने की चाबी केंद्र सरकार के हाथ में होने की वजह से अधिकांश सूबों को न्यायोचित और समान वितरण के लिए उसका मुंह ताकना पड़ता है। जीएसटी व्यवस्था लागू होने बाद यह लाचारी और अधिक बढ़ गयी। आपसी तनाव तब और उभरकर सामने आते हैं जब केंद्र और राज्यों में एक-दूसरे के विरोधी दलों की सरकारें सत्तासीन हों। ऐसे रिश्तों में परस्पर शक बहुत बढ़ जाता है। संबंधित राज्य सरकार को हमेशा लगता है कि उसके न्यायोचित हक से उसे वंचित रखा जा रहा है। यही वह क्षेत्र है जहां धन जारी करने में अधिक पारदर्शिता होना जरूरी है।

दूसरी ओर, जारी किए गए पैसे के खर्च को लेकर राज्य सरकार की उचित जवाबदेही होना जरूरी है। अभी तो केंद्र सरकार के पास राज्यों द्वारा किये खर्च की निगरानी के लिए समुचित तंत्र नहीं है, नतीजतन, प्राप्त धन का दुरुपयोग होता है या अन्यत्र किसी मद में खर्च किया जाता है। धन वितरण और खर्च न्यायोचित हो और इनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। एक अन्य क्षेत्र जिसमें केंद्र-राज्य सरकार के बीच धन और तालमेल में बहुत सुधार करने की आवश्यकता है, वह है आपदा प्रबंधन– प्राकृतिक हो अथवा मानव निर्मित। जरूरतमंद तक सहायता पहुंचाने को धन और एजेंसियों की जरूरत होती है और इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को समर्थ बनना जरूरी है।