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सरकार के पतन और गठन में पहली बार हिंदुत्व बना पैमाना

सार

भारत में पहली बार किसी राज्य में राजनीतिक उठापटक में हिंदुत्व सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व में चल रही महाविकास अघाड़ी सरकार को हिंदुत्व छोड़ने के कारण प्राण दंड की सजा मिल रही है। शिवसेना जिस हिंदुत्व पर सवार होकर महाराष्ट्र में सत्ता तक पहुंची है उसी हिंदुत्व के शेर का शिवसेना अब शिकार होती दिख रही है। 

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विस्तार

शेर की सवारी करना आसान नहीं होता। हिंदू हृदय सम्राट के नाम से विख्यात बाला साहब ठाकरे ने महाराष्ट्र में हिंदुत्व की राजनीति को एक नया मुकाम दिया था। ठाकरे परिवार की विरासत संभाल रहे उद्धव ठाकरे ने न मालूम किस नासमझी और अहम में कांग्रेस और एनसीपी के साथ समझौता कर सरकार बनाई। उनका यह कदम आज शिवसेना को इस हालात में पहुंचा चुका है कि शिवसेना के अधिकांश विधायक और सांसद उद्धव ठाकरे को छोड़कर बागी हो गए हैं।  

महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा और शिवसेना हिंदुत्व के आधार पर एक दूसरे के साथ लंबे समय तक राजनीति करते रहे। साल 2019 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन से चुनाव लड़ने के बाद मुख्यमंत्री के पद को लेकर कुछ विवाद इतना बढ़ा कि दोनों के बीच गठबंधन टूट गया।

राजनीतिक अपरिपक्वता के कारण उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। वह खुद तो मुख्यमंत्री बन गए लेकिन उनके विधायक और सांसद ठगे हुए महसूस करते रहे। ढाई साल से उनकी सरकार राज्य में चल रही है और उनके विधायक इतनी बड़ी संख्या में असंतुष्ट हैं, इसका अंदाजा ठाकरे सरकार को नहीं हो सका। इससे यह बात समझी जा सकती है कि महाराष्ट्र में सरकार किस ढंग से चल रही है। 

जो नेता अपनी पार्टी में इतने बड़े विद्रोह को ही समझ नहीं पाया वह सरकार का संचालन कैसे कर रहा होगा? कांग्रेस और एनसीपी के मंझे हुए नेता शिवसेना के मुख्यमंत्री के कंधे पर बंदूक रखकर अपने हित साधते रहे और शिवसेना के विधायक और कार्यकर्ता ठगे जाते रहे।

जिस समय महाराष्ट्र की सरकार बनी थी उस समय इस बेमेल गठबंधन को लेकर सवाल खड़े किए गए थे। बाला साहब ठाकरे ने हमेशा कांग्रेस और एनसीपी के खिलाफ राजनीति की, उनके कांग्रेस और एनसीपी के विरोध में भाषण और विचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। सत्ता के लिए उन सबको भुलाया गया। 
 
शिवसेना से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा भी राजनीतिक रूप से जली हुई महसूस करती रही। महाराष्ट्र विधानसभा में सबसे बड़ा दल होने के बाद भी उसे विपक्ष में बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा। एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले तीन दल शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार बना ली।

महाराष्ट्र में जो राजनीतिक तूफान आया हुआ है उसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। निश्चित रूप से भाजपा महाराष्ट्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में है तो इस राजनीतिक उठापटक से उसे दूर नहीं रखा जा सकता लेकिन अब तो ऐसा ही लग रहा है उद्धव ठाकरे के हाथ से शिवसेना खिसक रही है। 

एकनाथ शिंदे अब बाला साहब के वास्तविक राजनीतिक वारिस के रूप में स्थापित हो रहे हैं। महाराष्ट्र में चल रही गठबंधन सरकार का भविष्य क्या होगा यह तो वक्त आने पर पता चलेगा लेकिन इतना तो स्पष्ट है यह सरकार चलना अपने आप में ही बहुत मुश्किल है।

सारी राजनीतिक घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण बात जो उभर कर आई है वह है विचारधारा और हिंदुत्व की राजनीति। शिवसेना के बागी विधायक यह आरोप लगा रहे हैं कि पार्टी ने हिंदुत्व की विचारधारा को छोड़कर ऐसे लोगों के साथ मिलकर सरकार बनाई है जो हिंदुत्व विरोधी हैं। मतलब साफ है कि महाराष्ट्र में अब राजनीति हिंदुत्व वर्सेस अन्य हो गई है। 

हिंदुत्व राजनीति का मुख्य मुद्दा बन गया है। ऐसी परिस्थितियां भारतीय राजनीति में आ रहे बदलाव का संकेत कर रही हैं। अभी तक ऐसा कहीं भी नहीं हुआ कि विचारधारा के नाम पर सरकार गवानी पड़ी हो। आजादी के बाद केंद्र और राज्यों में अधिकांश समय कांग्रेसी सरकार काम रही हैं। जनता पार्टी के समय जब कांग्रेस के विरोध में विपक्षी दलों ने सरकार बनाई थी, उस समय जनसंघ-भाजपा की भागीदारी थी। यह सरकार पूरे समय इसलिए नहीं चल सकी क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता को लेकर सवाल उठते रहे। वहां भी विचारधारा के लिए जनसंघ और भाजपा को कई बार सत्ता का बलिदान करना पड़ा। 

विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासनकाल के दौरान तो मंडल और कमंडल विवाद विचारधारा में टकराव का प्रमुख कारण बना था। देश में आज भारतीय जनता पार्टी राजनीति की मुख्यधारा में काम कर रही है। कांग्रेस धीरे-धीरे नेपथ्य की ओर जा रही है। इस सब के बावजूद भाजपा ने हिंदुत्व की राजनीति को कभी भी सरकार के गठन या पतन के लिए मुख्य आधार नहीं बनाया। ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई राजनीतिक दल विचारधारा के नाम पर टूट रहा है। शिवसेना के बागी लगातार यह कह रहे हैं कि पार्टी ने हिंदुत्व को छोड़ दिया है। इसलिए वह पार्टी से अलग होकर बाला साहब ठाकरे के हिंदुत्व को आगे बढ़ाने का काम करेंगे। 

महाराष्ट्र में शिवसेना पार्टी के अंदर जो घटनाक्रम चल रहा है उससे एक और बात स्थापित हो रही है कि परिवारवादी राजनीति में जब विरासत किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में जाती है जो कि राजनीतिक रूप से अपरिपक्व है जिसके अंदर लीडरशिप का गुण नहीं है तो पार्टी निखरती नहीं टूटती है और अंततः अपने वजूद के लिए संघर्ष करती है। उद्धव ठाकरे की राजनीतिक परिपक्वता भी सवालों के घेरे में हैं। शिवसेना की टूट को टूट नहीं बल्कि नेता के विरुद्ध पूरी पार्टी का विद्रोह माना जा सकता है। 55 विधायकों में से अगर 41 विधायक विद्रोह कर रहे हैं तो यह तो टूट नहीं बल्कि पार्टी नेतृत्व को हटाकर नया नेतृत्व स्थापित करने जैसा है। 

2019 में विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में खंडित जनादेश प्राप्त हुआ था किसी भी दल को बहुमत नहीं था। शिवसेना भाजपा गठबंधन को बहुमत मिला था दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ी थी लेकिन राजनीतिक विवादों के कारण शिवसेना भाजपा से अलग हो गई थी तब से लेकर आज तक महाराष्ट्र राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना हुआ है।

महाराष्ट्र में ढाई साल से जो सरकार चल रही है उसमें भ्रष्टाचार और प्रशासन के ऐसे कीर्तिमान सामने आए हैं जो राज्य की इमेज को धक्का पहुंचाने वाले हैं। महाराष्ट्र के कई मंत्री भ्रष्टाचार और घोटालों के मामले में जेल में है एक पुलिस कमिश्नर मंत्री पर घूस लेने का आरोप लगाते हैं। पुलिस अधिकारी मंत्रियों के लिए पैसा वसूली का काम करते हैं। यह सारे घटनाक्रम पब्लिक डोमेन में हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई आज सरकारी वसूली का केंद्र बनी हुई है। 

महाराष्ट्र में अब सवाल शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार को बचाने का नहीं है बल्कि शिवसेना के वजूद को बचाए रखने का है। साथ ही महाराष्ट्र का राजनीतिक घटनाक्रम हिंदुत्व की राजनीति के लिए सुखद है। भारत के बहुसंख्यक समुदाय में बढ़ रही राजनीतिक जागरुकता भविष्य में राजनीतिक स्थिरता और समानता का नया इतिहास लिखेगी।