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सरकार, ये पलायन क्यों ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 03 Feb

सार

भारत की आर्थिक वृद्धि दर विश्व की मुख्य अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक रहेगी और जल्द ही जापान और जर्मनी को पछाड़कर भारतीय अर्थव्यवस्था 2030 से पहले दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी बन जाएगी, यह अनुमान वैश्विक बैंकिंग मूल्यांकन एजेंसी मॉर्गन स्टेन्ली द्वारा प्रस्तुत भविष्यवाणी दर्शा रही है. फिर देश में पलायन को बढ़ावा क्यों मिल रहा है..!

janmat

विस्तार

०प्रतिदिन विचार-राकेश दुबे                          

20/01/2023

भारत के नीति-नियंताओं ने ऐसी नीतियां चलाईं जिससे देश में पलायन को बढ़ावा मिल रहा है। यूँ तो कहने को भारत का लक्ष्य वर्ष 2027-28 तक 5 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनने का है तब सवाल उठता है कि  फिर युवा, यहां तक अति-अमीर भी, बड़ी संख्या में देश से पलायन करने की कोशिश में क्यों लगे हैं? क्या वे इस संभावना को लेकर उत्साहित नहीं हैं ? भारत की आर्थिक वृद्धि दर विश्व की मुख्य अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक रहेगी और जल्द ही जापान और जर्मनी को पछाड़कर भारतीय अर्थव्यवस्था 2030 से पहले दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी बन जाएगी। यह अनुमान वैश्विक बैंकिंग मूल्यांकन एजेंसी मॉर्गन स्टेन्ली द्वारा प्रस्तुत भविष्यवाणी दर्शा रही है। फिर देश में पलायन को बढ़ावा क्यों मिल रहा है? 

बड़ी संख्या में भारत के नागरिक भारतीय नागरिकता त्यागकर विदेशों में बसने के मौके तलाश रहे हैं। इनमें वे  अति-धनी भी हैं, जिनके पास निवेश के लिए 10 लाख डॉलर से ज्यादा की तो केवल नगदी ही है। संसद में बताया गया है कि 2011 के बाद से 16 लाख से ज्यादा अमीरों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी है, इनमें पिछले साल की 1,83,741 की संख्या शामिल है। वर्ष 2014-22 के बीच 12.5-15 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी है।

जब से विकसित मुल्कों ने अति-धनाढ्यों के लिए निवेशक-श्रेणी के तहत अपनी सीधी नागरिकता देने की राह खोली तो भारत से धीरे-धीरे और ज्यादा गिनती में अमीर लोग बेहतर रहन-रहन और काम-धंधे के माहौल की खातिर विदेश जाकर बसने लगे। इस वर्ग के परिवारों के बाहर जा बसने से हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था में आ रहा घाटा विदेशी मुल्कों के लिए फायदेमंद बन गया।

फिर  विदेशों की ओर पलायन करते युवाओं की गिनती की करें, वे भी उच्च शिक्षा पाने के लिए, तो यह साफ दर्शाता है कि भारत में शिक्षा का स्तर किस कदर शोचनीय है, और रोजगार के मौके भी यथेष्ट नहीं हैं, ऐसे में युवा विदेशों में अपना बेहतर भविष्य देख रहे हैं। उच्च शिक्षा का स्तर सुधारने की बजाय बहुत-सी राज्य सरकारें विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले इच्छुकों की मदद अलग ढंग से करने में भी लगी हैं। उच्च शिक्षा के लिए अपने बच्चों को विदेश भेजने वालों में अधिकांश वह हैं जिन्होंने इस हेतु अपने खेत बेचे या जायदाद गिरवी रखी या कर्ज उठाए हैं। विदेश में पढ़ाई करवाने का औसतन खर्च 25-30 लाख आता है अर्थात‍् घरेलू अर्थव्यवस्था से निकलकर इतना धन विदेशी मुल्कों को मिल रहा है। डब्ल्यूटीओ के प्रावधानों के तहत युवा छात्रों को विदेशी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाने की राह खोली, जिससे मेजबान मुल्क की अर्थव्यवस्था में वृद्धि होती  है।

पिछले कई सालों में पंजाब, केरल और अब हरियाणा से भी, कुशल श्रमिकों का प्रवाह विदेशों की ओर लगातार हो रहा  है। जहां पहले इन राज्यों  से जाने वाले मुख्यतयः काम-धंधे के लिए करने जाया करते थे वहीं अब पलायन का केंद्र शिक्षा है। पंजाब से, तकरीबन 1.5 लाख विद्यार्थी हर साल विदेश जा रहे हैं, केरल से यह संख्या लगभग 35000 है। अब तो हरियाणा में भी पढ़ाई के लिए विदेश जाने का चाव बढ़ने लगा है, वहां भी ‘आइल्ट‍्स’ करवाने और वीसा दिलवाने की ‘दुकानें’ दिखती है।

विदेशों में पढ़ाई के लिए पहली प्राथमिकता कनाडा, अमेरिका, यूके, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, इटली और न्यूज़ीलैंड को है। जो बच्चे वहां प्रवेश पाने में सफल नहीं हो पाते वे रूस, जॉर्जिया, लात्विया, बेलारूस और उज़बेकिस्तान जैसे अनेकानेक पूरबी यूरोपियन देशों का रुख करते हैं। यूक्रेन पर रूस की चढ़ाई के तुरंत बाद भारत सरकार को वहां पढ़ रहे लगभग 22,500 छात्र, जिनमें अधिकांश मेडिकल शिक्षा ले रहे थे, किसी तरह निकालकर लाने का इंतजाम करना पड़ा था।इसे चाहे तो इसे ‘ब्रेन-ड्रेन’ कह लें, लेकिन पढ़ाई के लिए पंजाब, केरल और हरियाणा से विदेश जाने की दौड़ से जवान पीढ़ी की उपस्थिति में कमी हो रही है। इस दर पर, जल्द ही ये राज्य ‘वृद्ध आश्रम’ में तब्दील हो जाएंगे। 

हमारी शिक्षा प्रणाली में व्याप्त कमियां और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने की विफलता किस तरह समग्र विकास पाने में बहुत बड़ा अंतर पैदा कर देती है, रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वे का हवाला देकर कहा है कि वित्तीय वर्ष 2015-16 और 2019-21 के बीच, पांच सालों में, एक किसान के स्वामित्व वाले रकबे में औसतन 22 प्रतिशत की कमी हुई है। छोटे किसान की जोत भूमि भी 8.5 प्रतिशत सालाना घटी है। यह कमी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने का खातिर जमीन बेचने से भी बनी है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) और एक यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी, 2020 से अक्तूबर, 2022 के बीच, लगभग 3 सालों में, 1.2 करोड़ अतिरिक्त लोग बेरोजगार हुए हैं। सबसे अधिक प्रभाव 15-39 साल के युवा वर्ग पर पड़ा है। पहले की सीएमआईई की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में काम करने लायक 90 करोड़ लोगों की श्रमशक्ति में अधिकांश ने नौकरी की तलाश करनी बंद कर दी है। कुल मिलाकर देखें तो, यह युवाओं में बढ़ते मोहभंग का कारण दर्शाता है। यही वजह है कि विकास दर फिर से लय पकड़ेगी और अगले कुछ सालों में हमारी अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी,परंतु  ऐसे दावे भी युवाओं को आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं ।