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राजनीतिक यात्राओं का इतिहास, सत्ता के व्यापार में सबसे खास

सार

भारत में राजनीति का इतिहास बहुत पुराना है। रामायण और महाभारत जैसे सनातन धर्मग्रंथों में राजनीति देखने को मिलती है। महाभारत महाकाव्य में तो राजनीति के मॉडल और विवरण मिलते हैं, चाहे चक्रव्यूह रचना हो या चौसर के खेल में पांडवों को हराने की राजनीति हो। राजनीति की सनातन परंपरा आज के राजनेता भी शिद्दत के साथ निभा रहे हैं।

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विस्तार

चुनाव की रणभेरी बजने के पहले ही राजनीतिक यात्राओं का चक्रव्यूह तैयार कर लिया जाता है। सत्तापक्ष जहां अपनी उपलब्धियों का आभासी स्वर्णिम अध्याय दिखाता है वहीं विपक्ष नाकामियों पर सवार होता है। जो भी जनता को प्रभावित करने में सफल हो जाता है, वही सत्ता के व्यापार के शीर्ष पर पहुंच जाता है। जनता के सामने जो भी तथ्य रखे जाते हैं, उनका सच्चाई से कितना संबंध होता है इसकी प्रमाणिकता के लिए जनता के पास कोई हथियार नहीं होता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी लाभ के धंधे में सत्य-असत्य को व्यापार का माध्यम बनाने में लगा रहता है।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव की घोषणा आज हो सकती है। इन दोनों राज्यों में राजनीतिक यात्राओं की शुरुआत हो गई है। किसी भी राज्य में चुनाव की आचार संहिता लगने के पहले मीडिया के लिए सरकारी उपलब्धियों को प्रचारित-प्रसारित करना कमाई का बड़ा साधन माना जाता है। जो भी दिखाया या सुनाया जाता है उसकी सच्चाई मापने के लिए जनता क्या करें, यह बात अभी तक किसी को समझ नहीं आ रही है। 

राजनीतिक यात्राएं धर्म की भावनाओं का भी भरपूर दोहन करती हैं। सारी राजनीतिक यात्राएं मंदिर से शुरू होकर मंदिर पर ही खत्म की जाती हैं। कोई भी यात्रा मस्जिद और चर्च से शुरु नहीं होती। शरीर तंत्र में बहुसंख्यक भावनाओं को प्रभावित करने के लिए बहुसंख्यकों के आस्था केंद्रों का ही उपयोग किया जाता है। राजनीतिक यात्राओं के नाम भी बहुत सोच समझ कर रखे जाते हैं। 

गुजरात में बीजेपी ने इन चुनावों के लिए जो यात्रा शुरू की है उसका नाम ‘गौरव यात्रा’ रखा गया है। यात्रा की शुरुआत करते हुए बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपने भाषण में यात्रा के उद्देश्यों के बारे में बताते हुए कहा कि यह गुजरात के गौरव की यात्रा नहीं है बल्कि गुजरात के गौरव नरेंद्र मोदी के कारण देश का जो गौरव बढ़ा है, उस को जन-जन तक पहुंचाने की यात्रा है।  

इस वक्तव्य के पीछे साफ झलक रहा है कि जनता को मोदी के नाम पर मतदान के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में ऐसी ही यात्रा चल रही है। इन दोनों राज्यों में विपक्ष के रूप में कांग्रेस से ज्यादा आम आदमी पार्टी की सक्रियता दिखाई पड़ रही है। दोनों राज्यों में आप परिवर्तन यात्रा के नाम पर यात्राएं निकाल रही है। विपक्ष हमेशा परिवर्तन के नाम पर, जनाक्रोश के नाम पर, संविधान बचाने के नाम पर यात्राएं तो निकालता है लेकिन सत्ता पर पहुंचने के बाद कमोबेश सब एक जैसा ही चलता रहता है। 

राजनीति किसी भी समाज का अविभाज्य अंग है। महात्मा गांधी ने एक बार टिप्पणी की थी कि राजनीति ने हमें सांप की कुंडली की तरह जकड़ रखा है और इससे जूझने के सिवाय कोई अन्य रास्ता नहीं है। महात्मा गांधी का यह उदाहरण आज की राजनीति पर बहुत सटीक लगता है। चुनाव के बाद सत्ता मिलने पर राजनेता जनता को वैसे ही छोड़ देते हैं जैसे सांप अपनी कुंडली छोड़ देता है। 

राजनीतिक यात्राओं का भारत में बहुत लंबा इतिहास है। भारत के इतिहास में सबसे चर्चित यात्रा स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की ‘दांडी यात्रा’ को माना जाता है। दक्षिण भारत में यात्राओं की शुरुआत आंध्र प्रदेश में 1982 में एनटी रामा राव ने ‘चैतन्य रथम यात्रा’ निकालकर की थी। इस यात्रा का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। इन यात्राओं की सफलता के बाद एनटी रामाराव आंध्र प्रदेश में पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे। आंध्रप्रदेश कांग्रेस के नेता रहे वाईएस चंद्रशेखर रेड्डी ने राज्य की पैदल यात्रा की थी उन्हें भी इस राजनीतिक यात्रा का लाभ मिला और वे चुनाव में विजयी होकर राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। 

भाजपा ने 1990 राम मंदिर निर्माण आंदोलन के लिए राजनीतिक यात्रा निकाली थी। लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या तक ‘रथ यात्रा’ पर निकले थे।  यह यात्रा बिहार में रोक दी गई थी। इस रथयात्रा से बीजेपी को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में एक नई पहचान और जनता के बीच में लोकप्रियता मिली थी। भाजपा की राजनीतिक सफलता में इस यात्रा से बड़ा राजनीतिक मोड़ आया था। राजनीतिक सफलता के लिए कांग्रेस के राहुल गांधी तो अब भारत जोड़ो महायात्रा निकाल रहे हैं। 

गुजरात में 2012 विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने भी सद्भावना मिशन के तहत पूरे राज्य का दौरा किया था। इस मिशन का एक वाकया बेहद चर्चित हुआ था, जब एक मौलाना ने नरेंद्र मोदी को सद्भावना मंच पर ही टोपी पहनाने की पेशकश की थी लेकिन इसे उन्होंने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था। यह दृश्य लाइव देखा गया था। कहा जाता है कि ऐसा कर नरेंद्र मोदी ने सद्भावना मिशन के बीच भी अपनी हिंदुत्ववादी छवि को और मजबूत कर लिया था।  

मध्यप्रदेश में भी राजनीतिक यात्राओं का लंबा दौर चलता रहा है। मध्यप्रदेश में 2003 में बीजेपी की सरकार राजनीतिक यात्राओं के परिणाम स्वरूप ही बनी थी तब उमा भारती ने 'संकल्प यात्रा' निकाली थी। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में हर विधानसभा चुनाव के समय यात्रा निकाली गईं। इन राजनीतिक यात्राओं का नाम कभी ‘जनदर्शन यात्रा’ कभी ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ रखा गया था। अब 2023 के चुनाव के पहले निश्चित रूप से फिर रथ यात्रा निकाली जाएगी। उस यात्रा का नाम 'जन आशीर्वाद यात्रा' या और कुछ भी रखा जा सकता है।

राजनीतिक यात्राओं से राजनेताओं को तो मंजिल मिल जाती है लेकिन जनता वहीं की  वहीं खड़ी रहती है। विकास का पैमाना और आंकड़े तो हमेशा उपलब्धियां बताते हैं लेकिन जमीन की हकीकत और बदलाव बहुत सार्थक दिखाई नहीं पड़ते। आजकल तो चुनाव के पहले राजनीतिक यात्राएं अनिवार्य अंग सी बन गई हैं। आजकल पूरे साल किसी न किसी राज्य में चुनाव चलते ही रहते हैं इसलिए कई बार ऐसा लगने लगता है कि तीर्थ यात्राओं से ज्यादा देश में राजनीतिक यात्राएं चलती रहती हैं। 

लोकसेवा की राजनीति शासन में पद प्राप्त करना और सरकारी पद का उपयोग करने की नीति बन गई है। राजनीति ऐसी है कि ना उसको छोड़ा जा सकता है और ना ही उसको आज के हालातों में स्वीकार्य किया जा सकता है। राजनीति में सुधार आज के समय की मांग है। भारत सरकार और चुनाव आयोग इस दिशा में कारगर प्रयास करे तो राजनीतिक हालात बदल सकते हैं। राजनीतिक यात्राओं को  मछली के लिए चारे जैसा कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा।