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MP चुनाव: कांग्रेस के लिए कैसे बनेगी सत्ता की राह ?

सार

सूबे में बीते साढ़े तीन दशक के बीच हुए चुनावी नतीजों और उनके आंकड़ों का आकलन बारीकी से किया जाए तो इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस ने 1998 के बाद 2018 के विधानसभा चुनावों यानि तीस साल बाद अपने वोटों के आंकड़े को चालीस पार पहुंचाया था, लेकिन यह भी सच है कि भाजपा से पांच सीटें ज्यादा जीतने के बावजूद कांग्रेस मत प्रतिशत में भाजपा से बारीक अंतर से पिछड़ गई थी..!!

janmat

विस्तार

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव 2023 के अंतिम चरण के बतौर 17 नवंबर को हुए मतदान के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच भोपाल की सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के दावे-प्रतिदावे तो जमकर हो रहे हैं लेकिन सत्ता की राह इतनी आसान नहीं हैं, खासतौर से कांग्रेस के लिए। यदि उसे पिछली विधानसभा के चुनावी परिणामों की तरह भाजपा से आगे निकलने या अपने बूते बहुमत के आंकड़े को पार करना है तो उसे अपने पक्ष में 42 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं का भरोसा जीतना होगा और भाजपा के मत प्रतिशत को 40 प्रतिशत के नीचे ले जाना होगा। सवाल यही है कि जमीनी लड़ाई पर यह मुमकिन हुआ है या हो सकता है?

सूबे में बीते साढ़े तीन दशक के बीच हुए चुनावी नतीजों और उनके आंकड़ों का आकलन बारीकी से किया जाए तो इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस ने 1998 के बाद 2018 के विधानसभा चुनावों यानि तीस साल बाद अपने वोटों के आंकड़े को चालीस पार पहुंचाया था। लेकिन यह भी सच है कि भाजपा से पांच सीटें ज्यादा जीतने के बावजूद कांग्रेस मत प्रतिशत में भाजपा से बारीक अंतर से पिछड़ गई थी। कांग्रेस ने 1 करोड़ 55 लाख 95 हजार 153 वोट हासिल करते हुए अपने मत प्रतिशत को 36.79 फीसदी से करीब चार फीसदी ज्यादा बढ़ाते हुए 40.89 फीसदी वोट प्राप्त किए थे। इसके विपरीत भाजपा का वोट प्रतिशत 45.19 फीसदी से घटकर 41.02 पर आ गया था और उसकी सीटों का आंकड़ा भी 165 से नीचे उतरकर 109 पर जा पहुंचा था। कांग्रेस की बात करें तो उसकी सीटें 58 से कुलांचे मारते हुए 114 तक पहुंचा लेकिन फिर भी बहुमत के आंकड़े में दो की कमी रह गई। और उसे अपने बागियों और बसपा के सहयोग से सरकार बनाना पड़ी थी।

कांग्रेस के विधानसभा चुनावों में चालीस फीसदी के आंकड़े को पार करने की बात करें तो 1998 में उसने 41.13 प्रतिशत वोट पाए थे। लेकिन तब की बात अविभाजित मप्र की कहानी है जब कांग्रेस के प्रभाव वाला छत्तीसगढ़ का हिस्सा मध्यप्रदेश में समाहित था। इसके बाद हुए चुनावों की बात करें तो 2003 में कांग्रेस विभाजित मप्र में मिलने वाले मतों का हिस्सा 31.70 फीसदी रह गया था। यानि करीब साढ़े नौ फीसदी नीचे। 2008 का विधानसभा चुनाव आया तो 2003 के मुकाबले 1.85 फीसदी बढ़ा लेकिन भाजपा का वोट प्रतिशत गिरने के चलते कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 38 से बढ?र 71 तक जा पहुंचा। 2008 में कांग्रेस और भाजपा के बीच मत प्रतिशत का अंतर छह फीसदी से थोड़ा कम रह गया था। 

भाजपा को 2008 में 38.09 प्रतिशत वोट मिले थे। साल 2013 की बात करें तो कांग्रेस ने 2008 के मुकाबले चार फीसदी वोट ज्यादा (36.79) बढ़ाया। लेकिन भाजपा ने 2008 के मुकाबले अपने मत प्रतिशत को सात फीसदी से ज्यादा ( 45.19) बढ़ाते हुए अपनी सीटों का आंकड़ा 165 कर पहुंचा दिया और कांग्रेस 58 पर सिमट गई। यानि 2003 से 2013 के बीच कांग्रेस का मत प्रतिशत 31.70 से 36.79 के बीच रहा जबकि भाजपा के वोट 38.09 से 45.19 के बीच रहे। यानि 2003 के बाद 2013 में कांग्रेस भाजपा से सात फीसदी से ज्यादा वोटों से पिछड़ गई। आंकड़ों के इस आईने के प्रकाश में देखें तो भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर पिछले चुनाव के 0.13 से लेकर साढ़े नौ फीसदी के बीच रहा है। अब इस अंतर को पाटते हुए भाजपा को हराने या बहुमत पाने के लिए कांग्रेस को न सिर्फ 2018 के 40.89 फीसदी के आंकड़े को छूना है न सिर्फ उसे 42 के पार ले जाना है, बल्कि भाजपा के मतों के आंकड़े को 40 फीसदी के नीचे रखना है।

बसपा- गोंगपा गठजोड़ भी बड़ा खतरा 
कांग्रेस के लिए एक और खतरा बहुजन समाज पार्टी से है जिसने पिछले चुनाव में मात्र 5 पांच फीसदी (19 लाख 11 हजार 642 ) वोट हासिल किए थे। 2013 में बसपा को मिले वोटों के लिहाज से देखें तो यह करीब डेढ़ फीसदी कम था। उसे तब 21 लाख 28 हजार 333 वोट के साथ 4 सीटें मिली थीं। इसके पहले 2008 में 9 फीसदी वोटों के साथ उसे 7 सीटें मिली और उसके खाते में 22 लाख 62 हजार 119 वोट आए। जबकि 2003 में बसपा ने मात्र दो सीटें हासिल कीं लेकिन उसने 18 लाख 52 हजार528 वोटों के साथ 10.61 फीसदी वोट जुटाए। इस लिहाज से देखें तो बसपा कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा नहीं बनती दिखती। लेकिन इस बार वह 178 सीटों पर चुनाव लड़ने के साथ 22 सीटों पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ मैदान में है। इसमें कोई शक नहीं कि गोंगपा पहले के मुकाबले बिखरी है। 

पिछले चुनाव में वह 1.77 फीसदी वोटों के साथ 6 लाख 75 हजार 648 वोट और दो सीटें ले गई थी। लेकिन इस बार वह गोंगपा के साथ मिलकर कुछ ज्यादा सीटें ले जा रही है लेकिन उससे ज्यादा सीटों पर वह कांग्रेस के लिए वोट कटवा साबित हो सकती है। सवाल यही है कि बसपा और गोंगपा के दलित -गौंड आदिवासी गठजोड़ के भंवरजाल से निकलकर कांग्रेस 3 दिसंबर को होने वाले मतदान में जीत हासिल कर सकेगी? इस चुनाव ने बसपा ने सतना की रैगांव, सतना तथा नागोद सीट के साथ ही रीवा की सिरमौर, सेमरिया और मुरैना सीट पर जीत के लिए जोर मारा है तो गोंगपा ने दमोह की जबेरा सीट के साथ महाकौशल की आधा दर्जन से ज्यादा सीटों पर हलचल मचाई है।