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कर्ज माफ़ी या किसानों के साथ छल काफी? सरयूसुत मिश्र

सार

किसानों से कर्ज माफी का वायदा कर सत्ता में आने वाली कांग्रेस की 15 महीने की सरकार ने, ऋण माफी के नाम पर किसानों के साथ बड़ा छल किया है. किसानों का जितनी राशि का ऋण माफ नहीं किया, इसकी एवज में उससे अधिक राशि की क्रियान्वित किसान हितैषी योजनाओं को रोका गया..!

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विस्तार

कमलनाथ सरकार द्वारा 16 मार्च 2020 को विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण में बताया गया था कि प्रथम चरण में 20 लाख 22 हजार 731 ऋण खातों पर 7154 करोड़ के ऋण माफ किए गए| इसी वित्तीय वर्ष में कांग्रेस की सरकार ने 5936 करोड की किसानों के लिए चल रही योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं किया| इसके अलावा सहकारी बैंकों और कृषि साख सहकारी समितियों की 2000 करोड़ रूपये की अंश पूंजी को कर्ज माफ़ी में समायोजित कर दिया| 

किसी भी सरकार का इससे खराब प्रदर्शन क्या हो सकता है की चल रही योजनाओं के लिए राशि होने के बावजूद उसका लाभ किसानों को ना पहुंचा सके| यह शायद इसलिए किया गया होगा क्योंकि ऋण माफी के वायदे को पूरा करने का दिखावा करने के लिए सरकार को अधिक राशि खर्च करनी थी| 

ऋण माफी में और भी कई तरह की विवादास्पद स्थितियां बनी हुई हैं| जानकारी के मुताबिक़ जिन किसानो ने ऋण चुका दिए थे उन्हें भी कर्जमाफी योजना में जोड़ लिया गया| तत्कालीन सरकार के  कर्ज माफ़ी की राजनीति के कारण हुए वित्तीय नुकसान से सहकारी बैंक आज तक नहीं उबर सके हैं| 

कांग्रेस की सरकार ने राज्यपाल के अपने अभिभाषण में “जिला सहकारी केंद्रीय बैंक एवं प्राथमिक कृषि साख सहकारी संस्थाओं को, वाणिज्य बैंकों के समकक्ष बनाए जाने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम बनाने” का वायदा किया था| इसके साथ ही इन संस्थाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाए जाने के लिए 1000 करोड़ रुपए अंश पूंजी के रूप में उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया था|

देखें अपने अभिभाषण में तत्कालीन राज्यपाल ने क्या कहा था? 

 

अभिभाषण में ये भी बताया गया था कि  2000 करोड रुपए बैंकों को अंश पूंजी के लिए आगे और उपलब्ध कराए जाएंगे| कांग्रेस की सरकार 20 मार्च 2020 को पतन हो गया था| तो फिर आगे राशि उपलब्ध कराने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता| इसका मतलब है कि कर्ज  माफी के नाम पर जो राशी बताई गई है उसमें बैंकों की 2000 करोड़ रूपये की अंश पूंजी को शामिल कर दिया गया है| इसी कारण बैंक आज दुरावस्था को पहुंच गए हैं|

कांग्रेस की सरकार ने किसानों के हित में चल रही जिन योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं किया उनमें कृषक समृद्धि योजना के 999 करोड़ शामिल है| इस योजना के अंतर्गत किसानों को समर्थन मूल्य पर खरीदी गई उपज पर प्रोत्साहन राशि दी जाती है| योजना की राशि इस प्रकार सीधे किसानों को प्राप्त होती है| लेकिन कांग्रेस की सरकार ने इस योजना का क्रियान्वयन नहीं किया| पांच हॉर्स पावर के कृषि पंप, थ्रेशर तथा एक बत्ती कनेक्शन को निशुल्क प्रदाय की प्रतिपूर्ति के लिए बजट में उपलब्ध राशि का 669 करोड़ भी कांग्रेसी सरकार उपयोग नहीं कर पाई|

भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के 31 मार्च  2020 को समाप्त हुए वर्ष के लिए विधानसभा में प्रस्तुत किए गए प्रतिवेदन में, किसान कल्याण तथा कृषि विकास व सहकारिता विभाग के मद में कांग्रेस सरकार ने,  जिन योजनाओं की राशि का उपयोग नहीं किया, उनका विवरण दिया गया है|

इसमें फार्म वाटर मैनेजमेंट, सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, भावांतर फ्लैट रेट योजना, मुख्यमंत्री फसल ऋण माफी योजना, कृषकों को अल्पकालीन ऋण पर ब्याज अनुदान, मुख्यमंत्री समाधान योजना, मुख्यमंत्री कृषक सहकारी ऋण सहायता योजना, सहकारी बैंकों को अंश पूंजी जैसी महत्वपूर्ण योजनायें शामिल हैं| वित्तीय वर्ष 2020-21 के महालेखाकार के लेखा प्रतिवेदन में इन सारी योजनाओं के संबंध में उपलब्ध राशि और खर्च नहीं की गयी राशि का विवरण दिया गया है| 

किसानों की चल रही योजनाओं को बर्बाद कर ऋण माफी के नाम पर किसानों के साथ राजनीति को क्या कहा जाएगा? बैंकों और कृषि साख सहकारी समितियों की अंश पूंजी को ऋण माफी में समायोजित कर देना क्या इन संस्थाओं को तबाह करने का प्रयास नहीं है?

भारत किसानों का देश है लेकिन हमेशा किसान ही ठगे जाते हैं| किसानों के नाम का दिखावा करने से कोई भी दल नहीं चूकता| लेकिन वास्तव में किसानों के जीवन में बेहतरी के लिए न मालूम कितना समय इंतजार करना पड़ेगा? खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा सुन सुनकर लोगों के कान पक गए हैं| लेकिन खेती अभी भी घाटे का सौदा बना हुआ है|

मध्य प्रदेश में ऋण माफी की राजनीति स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा के कार्यकाल में शुरू हुई थी| सबसे पहले पटवा जी ने किसानों की ऋण माफी की थी| उस समय कांग्रेस ने ऋण माफी को छलावा बताते हुए व्यापक विरोध किया था| पटवा सरकार का ऋण माफी का तीर भी बेकार गया था|

साल 1993 में जब विधानसभा के चुनाव हुए थे तब  दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार सत्तारूढ़ हुई थी| कमलनाथ के लिए ऋण माफी का वायदा सत्ता में लाने का कारण बना था| ऋण माफी का गोलमाल और झोलझाल वाला आदेश और क्रियान्वयन उनके सत्ता से बाहर जाने का संयोग बना| 

तत्कालीन कांग्रेस सरकार के नुमाइंदे और कांग्रेस पार्टी लगातार अभी भी ऋण माफी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहे हैं| वर्ष 2023 में होने वाले चुनाव में ही उनकी कर्ज माफी की राजनीति की सफलता या असफलता का सही अंदाजा लग सकेगा| किसानों के साथ छलावे हमेशा राजनीतिक दल को विपक्ष की तरफ ले जाते हैं| 

पहली बार मध्य प्रदेश में हुई ऋण माफी के भी यही नतीजे सामने आए थे| गांव गरीब किसान की केवल बात करने से अब राजनीतिक सफलता नहीं मिलेगी| इनके लिए ईमानदारी से काम करना होगा| काम ऐसा करना होगा, “जो दिखे भी” केवल कागजी गोलमाल पर आधारित ना हो|

सरकारों को मुफ्त की योजनाओं से दूरी बनानी होगी, स्टेट बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य ऐसी मुफ्त योजनाओं पर खर्च कर रहे हैं जो आर्थिक रूप से वहनीय नहीं हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कई राज्य किसान कर्ज माफी जैसी लोकलुभावन योजनाओं पर बहुत अधिक राशि खर्च कर रहे हैं। इन योजनाओं को पूरा करते दिखने के लिए कई बार वो इस तरह का गोलमाल भी करते हैं जो एक दिन सामने आ ही जाता है|