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पॉलीटिकल एफीलिएशन और फ्रेश अपॉइंटमेंट, निष्पक्षता पर उठते सवाल

सार

ब्यूरोक्रेसी और जुडिशयरी में ‘कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट’ शब्द बहुत चर्चित है। न्यायिक क्षेत्र में तो अक्सर ही न्यायाधीशों को किसी विशेष प्रकरण से खुद को अलग करते देखा गया है। ब्यूरोक्रेसी में भी कई बार नियुक्तियों और निविदाओं में अपने सगे संबंधियों के जुड़े होने पर ब्यूरोक्रेट स्वयं को उस प्रक्रिया से अलग कर लेते हैं। इस को ‘कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट’ कहा जाता है। 

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विस्तार

सेवा में रहते हुए निष्पक्षता के लिए ऐसे मापदंड अपनाए जाते हैं तो फिर सेवा से रिटायरमेंट के बाद पॉलिटिकल एफीलिएशन और अपॉइंटमेंट के मामलों में संबंधित व्यक्ति के सेवा में रहते हुए किए गए फैसलों और निर्णय की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पिछले दिनों राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उनके साथ चलते हुए नजर आए। इसी प्रकार भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने मुख्य अतिथि के रूप में अपना ओजस्वी भाषण दिया।  

वैसे तो भारत जोड़ो यात्रा को भी गैर राजनीतिक कहा जा रहा है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो गैर राजनीतिक संगठन है ही लेकिन दोनों का राजनीतिक अंतर्संबंध सर्वविदित है। केंद्र और राज्य सरकारों में सेवानिवृत्ति के बाद जुडियशरी और ब्यूरोक्रेसी को नियुक्ति के लिए अनेक पद उपलब्ध हैं। रिटायरमेंट के बाद पॉलिटिक्स में ब्यूरोक्रेसी के अनेक लोगों ने हाथ आजमाएं हैं। यह किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं है। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी सरकारों के समय रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट का पॉलिटिकल उपयोग किया है। आज तो स्थिति यहां तक हो गई है कि राजनीतिक दलों के संगठन उनके द्वारा संचालित दूसरे संगठनों में सेवानिवृत्त नौकरशाहों का बोलबाला बना हुआ है। 

जहां तक सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक या किसी अन्य संगठन में शामिल होने का प्रश्न है, इस पर कानूनी रूप से कोई रोक नहीं है। यह जरूर है कि सरकारी अधिकारियों के सामान्य नियमों के अंतर्गत सेवानिवृत्ति के बाद अपने कामकाज से जुड़े निजी संस्थानों में एक निश्चित अवधि तक काम करने से रोकने का प्रावधान है। अक्सर यह देखा गया है कि सार्वजनिक उपक्रम डूबते हैं और उनके कर्ता-धर्ता उससे जुड़े निजी उपक्रमों में बड़े ओहदों पर आनंद उठाते रहे।  बीएसएनएल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 

बीएसएनएल आज अपने पतन के कगार पर है लेकिन निजी ऑपरेटर दिन दोगुना रात चौगुना गति से बढ़ते जा रहे हैं। निजी कंपनियों में कई पदों पर सार्वजनिक उपक्रमों के रिटायर्ड लोग मिल जाएंगे। आम चर्चा तो ऐसी होती रही है कि निजी कंपनियों के फायदे के लिए जानबूझकर सरकारी उपक्रमों को डुबाया जाता है और बाद में फिर डुबाने के इस इन्वेस्टमेंट का रिटायरमेंट के बाद लाभ लिया जाता है। 

भारत के वर्तमान राजनीतिक परिवेश पर अगर नजर डाली जाए तो साफ़ दिखाई पड़ता है कि केंद्र और राज्यों में सेवानिवृत्त ब्यूरोक्रेट, मंत्री और मुख्यमंत्री जैसे पद पर सुशोभित रहे। वर्तमान में भी केंद्र में कई मंत्री हैं, जो रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट हैं। यहां तक कि सेना प्रमुख रहे व्यक्ति भी राजनीति में आकर मंत्री का पद सुशोभित कर रहे हैं। यह गलत है या सही है, चर्चा इस बात की नहीं है। बहस इस बात की है कि सेवा में रहते हुए पदों पर जो निर्णय लिए गए या कार्य किए गए क्या वह भविष्य की किसी आशा और प्रोत्साहन की संभावना से लिए गए? रिटायरमेंट के बाद की परिस्थितियों और लाभदायक स्थितियों को क्या अतीत के फैसलों से जोड़कर देखा जाना चाहिए?
 
न्यायिक क्षेत्र में तो सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बहुत सारे पद उपलब्ध हैं। उन पदों पर नियुक्तियों की लालसा में फैसले क्या सरकार के पक्ष में हो सकते हैं? जुडियशरी में यह बात काफी लंबे समय से डिस्कशन का विषय बनी हुई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई को जब केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में नामांकित किया गया था तो उसकी व्यापक आलोचना हुई थी। पद पर रहते हुए जिस तरह का आचरण प्रतिबंधित है तो क्या सेवानिवृत्ति के बाद भी यह प्रतिबंध कायम रहना चाहिए?

सरकारी पदों पर रहने वाला कोई व्यक्ति पद पर रहते हुए राजनीति में शामिल नहीं हो सकता। रिटायरमेंट के बाद उस पर कोई रोक नहीं है। पद पर रहने वाला व्यक्ति राजनीति में जाने की लालसा में पद पर रहते हुए अपने निर्णय और कार्यों से राजनीतिक जमावट कर सकता है। वह अपने काम, पद और पॉवर  से राजनीति के सह संबंध स्थापित कर सकता है। रिटायरमेंट के बाद प्रोत्साहन की संभावना फैसलों को प्रभावित कर सकती है। 

राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो आज रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट, कलाकार और दूसरे बुद्धिजीवी भी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर स्पष्ट रूप से विभाजित दिखाई पड़ेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुलामी की मानसिकता को छोड़ने का देशवासियों से आह्वान किया है। उनका कहना है कि यह मानसिकता हमें आगे बढ़ने से रोकती है। राजनीतिक विचारधारा की गुलामी आज बुद्धिजीवियों में ज्यादा दिखाई देती है। 

जन धन से जीवन में सब कुछ हासिल करने वाले लोगों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद पॉलीटिकल एफीलिएशन और नियुक्तियों के लिए कोई स्पष्ट और संस्थागत व्यवस्था की जानी चाहिए। यह इसलिए जरूरी है कि इसमें 'पिक और चूज' की संभावनाएं नहीं रहेंगी। प्रतिस्पर्धा और समानता के साथ अवसर मिले तो पद पर रहते हुए कोई भी पक्षपात और प्रोत्साहन के लिए काम करने से बचेगा। इससे सिस्टम की शुचिता और पवित्रता स्थापित हो सकेगी।