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महिलाओं से राजनीतिक प्यार सबका दावा सब हकदार

सार

प्रेम और ममता की प्रतीक नारी शक्ति से राजनीतिक प्यार का दावा और हकदारी देश में नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ रही हैं. आजादी के 75 साल बाद महिला आरक्षण के लिए विधेयक की चर्चा में लोकसभा का हर वक्ता अपनी पार्टी और नेता को इसका जनक बता रहा है. इतने लम्बे समय बाद भी महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व के लिए संवैधानिक आरक्षण नहीं मिला. इसके लिए कोई भी अपने को जिम्मेदार नहीं बता रहा है. हर नेता यही कह रहा है कि नारी शक्ति वंदन विधेयक पर अगर आज संसद में चर्चा हो रहीं है तो यह उनके ही विचारों और अतीत के प्रयासों की जीत है.

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विस्तार

राजनीति में अचानक नैरेटिव महिलाओं के पक्ष में क्यों चला गया है? देश के जितने भी परिवारवादी राजनीतिक घराने हैं उन सभी ने परिवार की राजनीति में भी बेटों को ही आगे बढ़ाया है. राजनीतिक परिवारों में राजनीतिक विरासत जैसे बेटों के लिए ही आरक्षित कर दी गई है. बेटा होने के बाद बेटियों को कभी भी नेतृत्व के लिए आगे नहीं बढ़ाया गया. महिलाएं आज राजनीति के नए नैरेटिव केंद्र बन रही हैं तो इसका श्रेय देश की राजनीति में आए ध्रुवीय परिवर्तन को दिया जाएगा.

एमपी में महिलाएं चुनावी नैरेटिव निर्धारित कर रहीं हैं. किसी राजनेता के लिए मामा और भाई की कमाई मध्य प्रदेश की राजनीति में नया दृश्य निर्मित कर रहा है. एमपी में चुनाव की बारात दरवाजे पर खड़ी हुई है. अब तो दो महीने से भी कम समय बचा है जब जनता जनादेश से अपनी सरकार चुनेगी. एमपी में चुनावी राजनीति महिला मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूम रही है. शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने महिलाओं को केंद्र में रखकर सारी योजनाओं को एक तरफ मोड़ दिया है.

सरकार का खजाना महिला कल्याण की योजनाओं के लिए खोल दिया गया है. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह राज्य के वित्त विभाग के अधिकारियों को पत्र लिखकर धमकी भरे लहजे में अगर यह कह रहे हैं कि राज्य की तमाम योजनाओं को रोककर बीजेपी के चुनावी एजेंडे पर सरकार का सारा पैसा खर्च किया जा रहा है तो इसके पीछे सरकार की महिला कल्याण की योजनाएं और उनके पड़ रहे सकारात्मक प्रभाव का ही असर है. 'लाडली बहना योजना' को पहले कांग्रेस द्वारा हल्के में लेते हुए जवाबी रूप से 'नारी सम्मान योजना' की घोषणा करके ऐसा मान लिया गया था कि शायद सरकार की योजना का चुनावी असर कम कर देंगे. धीरे-धीरे 'लाडली बहना योजना' की राशि बढ़ी अब तो ₹3000 तक ले जाने की घोषणा की जा चुकी है. यह योजना महिलाओं के जनादेश को मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई पड़ रही है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब देखा कि 'लाडली बहना योजना' अपना वांछित असर दिखा रही है तब ₹450 में रसोई गैस देने की योजना भी लांच कर दी. अब तो 'लाडली बहना आवास योजना' भी शुरू कर दी गई है. सरकार की 'लाडली बहना योजना' के लिए उमड़ा प्यार कांग्रेस को रास नहीं आ रहा है. कांग्रेस यह समझ नहीं पा रही है कि इस योजना के काट के लिए कौन सा कार्ड खेला जाए.

कांग्रेस शायद चाहती है कि 'लाडली बहना योजना' के अंतर्गत महिलाओं को जो हर महीने की 10 तारीख को सीधे खाते में 1250 रुपए दिए जा रहे हैं वह चुनाव के पहले एक बार बाधित हो जाए. शायद इसीलिए वित्त विभाग के अधिकारियों को कांग्रेस की सरकार आने पर जांच का डर दिखाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनावी योजनाओं पर राशि का प्रबंध किसी भी तरह से रोका जाए. अब तो बीजेपी के खाते में महिला आरक्षण की उपलब्धि भी शामिल हो गई है. चुनाव की घोषणा के बाद आचार संहिता प्रभावशील होने के उपरांत भी पूर्व से चली आ रहीं 'लाडली बहना योजना' की राशि बहनों के खाते में जानें से नहीं रोका जाए इस पर राजनीतिक विवाद तय हैं. चुनाव आयोग को अंतिम फैसला लेना होगा.

लोकसभा और राज्यसभा में नारी शक्ति वंदन विधेयक पारित होना सुनिश्चित लग रहा है. राज्यों की विधानसभाओं से इसे पारित होने में भी कोई कठिनाई नहीं दिखाई पड़ रही है. महिलाओं को संवैधानिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण का संरक्षण मिलना अब सुनिश्चित है. अब राजनीति ओबीसी महिलाओं को भी आरक्षण देने पर सिमट गई है. ओबीसी राजनीति वर्तमान में बीजेपी के लिए लाभप्रद सिद्ध हो रही है. जब संसद और विधानसभाओं में ओबीसी पुरुषों के लिए ही रिजर्वेशन नहीं है तो फिर महिलाओं को रिजर्वेशन कैसे दिया जा सकता है? जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया में लगने वाले समय के आधार पर महिला आरक्षण की मंशा पर सवाल भी चुनावी मैदान में राजनैतिक हथियार के रूप में ही आजमाए जा रहे हैं.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम मध्य प्रदेश के होने वाले चुनाव में तो अमल में आना नामुमकिन है लेकिन इसका असर जरूर चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगा. मध्यप्रदेश में पहले से ही चुनाव नैरेटिव महिलाओं को केंद्र में रखकर ही गढ़ा गया है. महिलाओं के हक़ में योजनाओं पर खर्च किया जा रहा बेतहाशा पैसा कांग्रेस का तनाव बढ़ाने के लिए पर्याप्त लगता है. भले ही चुनावी राज्यों में नारी शक्ति आरक्षण कानून अमल नहीं हो लेकिन राजनीतिक दलों को चुनाव में पहले की तुलना में अधिक संख्या में महिलाओं को प्रत्याशी बनाना पड़ेगा.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों पर यह दबाव बढ़ जाएगा कि कानून भले ही साल दो साल बाद प्रभावी हो लेकिन कानून बनने के बाद नैतिक रूप से तो महिलाओं को 33% आरक्षण मिल ही चुका है. कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है लेकिन राजनीतिक दल राजनीतिक प्रक्रिया के तहत यह निर्णय ले सकते हैं कि पांच राज्यों और अगले लोकसभा के चुनाव में एक तिहाई सीटों पर महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारना सुनिश्चित करेंगे. राजनीतिक दल अगर यह उदारता दिखाएंगे तो फिर आरक्षण का कानून लागू होने के बाद राजनीति में भागीदारी के लिए महिलाएं पर्याप्त संख्या में उपलब्ध होगी.

महिलाओं के कल्याण पर बुनी गई राजनीतिक जमावट में नारी शक्ति वंदन अधिनियम अधिसूचित होने पर महिलाओं की सक्रियता से चुनाव नतीजे प्रभावित जरूर होंगे. महिलाओं से राजनीतिक प्यार के दावेदार और हकदार राजनेताओं का फैसला महिलाओं द्वारा ही किया जाएगा. महिला आरक्षण का विरोध करने की हिम्मत कोई भी राजनीतिक दल नहीं जुटा सकता. महिला और पुरुष के संवैधानिक संरक्षण में जातिवाद का राजनीतिक जहर घोलने की कोशिश इस ऐतिहासिक उपलब्धि को भी कहीं खट्टा ना कर दे. एमपी में तो पहले से ही ऐसा लग रहा था कि अगली सरकार का फैसला राज्य की महिला मतदाता ही करेंगी.