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विकास की दृष्टि पर हावी राजनीतिक दृष्टि 

सार

मध्यप्रदेश 66 साल का हो गया है। 1 नवंबर को मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस है। 22 साल पहले मध्यप्रदेश बंट गया था। जब तक मध्यप्रदेश बंटा नहीं था तब तक राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस का बोलबाला था। जब से छत्तीसगढ़ बन गया तब से बीजेपी का दबदबा बढ़ गया है। छत्तीसगढ़ बनने के बाद किसी भी आम चुनाव में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने में सफल नहीं हुई।

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विस्तार

उमा भारती के नेतृत्व में 2003 में शुरू हुई बीजेपी की शासन यात्रा, कमलनाथ के डेढ़ साल के कार्यकाल को छोड़कर लगातार जारी है। 21वीं सदी के मध्यप्रदेश में शासन व्यवस्था की दृष्टि से अभी तक के काल को शिवराज काल ही कहा जाएगा। विकास की दृष्टि से देखा जाए तो मध्यप्रदेश अपनी संभावनाओं को साकार करने से अभी दूर है। राजनीति और विकास, लीडरशिप की दृष्टि, नीयत और नीति पर निर्भर है। उत्तर भारत के अधिकांश राज्य विकास की दृष्टि के अभाव की राजनीति का शिकार हो गए से लगते हैं। 

दक्षिण भारत के राज्यों में दलीय राजनीति भी विकास को कमजोर करने की बजाय ताकत देती है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में राजनीतिक फेरबदल भी विकास की निरंतरता को प्रभावित नहीं करता है। मध्यप्रदेश में राजनीतिक नेतृत्व हमेशा विकास की दृष्टि में टकराहट का शिकार रहा है। यही नहीं राजनीतिक दृष्टि के अभाव से विकास पर ब्यूरोक्रेटिक मॉडल हावी भी दिखा। इस ब्यूरोक्रेटिक मॉडल में प्रयास और परिणाम से ज्यादा प्रोसीजर और प्रजेंटेशन की प्रधानता रही, जिससे अपेक्षित नतीजे हासिल नहीं किये जा सके। 

कांग्रेस और भाजपा के बीच तो विकास की दृष्टि में टकराहट राजनीतिक विचारधारा का बदलाव माना जा सकता है लेकिन बीजेपी के अंतर्गत ही नीतियों में जिस तेजी के साथ बदलाव हुआ है उसको सामान्य रूप से नहीं देखा जा सकता। उमा भारती जब दिग्विजय सिंह को पराजित कर सत्ता में आईं थी तब उन्होंने ‘पंच ज’ को मध्यप्रदेश के विकास की बुनियाद के रूप में सामने रखा था। सारी सरकारी नीतियां उसी आधार पर बनना प्रारंभ हुई थीं। उमा भारती लंबे समय तक शासन में नहीं रह पाईं। उनके स्थान पर जब बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने ‘पंच ज’ को पूरी तौर से भुला दिया था।

बाबूलाल गौर एक नई रणनीति के साथ आगे बढ़े थे उनकी रणनीति 'गोकुल ग्राम' की परिकल्पना पर आधारित थी। यह परिकल्पना भी लंबे समय तक नहीं चली फिर मध्यप्रदेश में शिवराज काल प्रारंभ हुआ। शिवराज ने प्रदेश में लगातार मुख्यमंत्री रहने का अब तक का सबसे लंबा रिकॉर्ड बनाया है। राजनीतिक स्थायित्व के शिवराज दौर में भी नीतियों में निरंतरता का अभाव देखा जा सकता है। 

मध्यप्रदेश न मालूम कितने दौर के बाद अब आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश की दहलीज पर खड़ा हुआ है। इसके पहले स्वर्णिम मध्यप्रदेश, आओ बनाएं मध्यप्रदेश और लगभग हर साल नए अभियान में मध्यप्रदेश को ले जाते हुए राजनीतिक उपलब्धियां भले ही हासिल कर ली गई हों लेकिन विकास की दृष्टि से मध्यप्रदेश आज भी मध्य में ही खड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश में विकास की जो संभावनाएं हैं उनको साकार करने की दिशा में अभी बहुत कदम बढ़ाए जाना है। विकास के लिए स्थाई सरकार और लीडरशिप बुनियादी आवश्यकता है। इस मामले में मध्यप्रदेश को मौका मिला है। बीजेपी और लीडरशिप के रूप में शिवराज सिंह चौहान लंबे समय से राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं। 

विकास की रणनीति के मामले में अंतिम बार लेटेस्ट रणनीतिक दस्तावेज के रूप में राज्य सरकार ने दिसंबर 2020 में ‘आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश रोड मैप 2023’ जारी किया है। सरकार ने आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का जो ताना-बाना तैयार किया है उसमें ATMAN की अवधारणा है। सरकार द्वारा ए फॉर एस्पिरेशन, टी फॉर ट्रांसफॉरमेशन, एम फॉर मिशन, ए फॉर एक्शन और  एन फॉर नीति का संकल्प बताया है। इस दस्तावेज में सरकार ने ‘लोकल को ग्लोबल और वोकल’ बनाने का भी लक्ष्य रखा है। सरकार ने आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के रोडमैप में भौतिक अधोसंरचना, सुशासन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था एवं रोजगार सुनिश्चित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस दस्तावेज में यह विश्वास व्यक्त किया है कि आगामी 3 वर्षों में मध्यप्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने में सफल होंगे। इन तीन वर्षों में दो वर्ष बीत चुके हैं अब केवल 2023 का वर्ष शेष है जो चुनाव का वर्ष है।

मध्यप्रदेश में गवर्नेंस के क्षेत्र में सुधार परिलक्षित होता है लेकिन जो लक्ष्य है वह अभी बहुत दूर दिखाई पड़ता है। लोगों में विश्वास जगाया जाता है और जब वह पूरा नहीं होता तब नैराश्य पैदा होता है। 2018 के चुनाव परिणाम इसी निराशा के परिणाम के रूप में देखे जा सकते हैं। विकास के काम करना कोई आसान नहीं होता है। किसी भी लक्ष्य को पूरा करना चुनौतीपूर्ण होता है।

मध्यप्रदेश में जो सबसे खराब हालात दिखाई पड़ते हैं कि लक्ष्य और भरोसा तो हिमालय का जगाया जाता है और पहुंच सामान्य  तक ही हो पाती है। चाहे सुशासन का प्रश्न हो, चाहे अधोसंरचना के विकास का मामला हो, अभी बहुत लंबा सफर तय करना है। इससे इनकार नहीं कि सुधार हुआ है लेकिन आगे सुधार की व्यापक संभावनाएं हैं। अर्थव्यवस्था के मामले में मध्यप्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है। देश का कोई भी राज्य आज कर्जों के जाल से बाहर नहीं है। सरकारों की आय से संस्थागत खर्चे ही पूरे नहीं हो पाते हैं फिर विकास के काम को कैसे अंजाम दिया जा सकता है?

प्रदेश में कुछ अभिनव प्रयास किए गए हैं। उन प्रयासों पर मध्यप्रदेश गर्व कर सकता है लेकिन उनका दायरा सीमित है। मध्यप्रदेश के राजनीतिक दलों के बीच प्रदेश के विकास को लेकर भी एक राय नहीं है। कांग्रेस जहां कर्ज माफी को अपना चुनावी दांव मानती है वहीं  बीजेपी भी किसान सम्मान के नाम पर नगद पैसे किसानों को पहुंचाने की रणनीति पर काम करती है। 

अब कांग्रेस कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के नाम पर बरगला रही है। चुनाव तक बीजेपी भी इस दिशा में काट के रूप में कोई ना कोई पहल जरूर कर सकती है। पुरानी पेंशन योजना की बहाली कई राज्यों ने कर दी है। इसलिए मध्यप्रदेश में भी इसका असर पड़ सकता है। किसी भी हालत में पुरानी पेंशन योजना लागू करना राज्य के विकास की दिशा में स्पीड ब्रेकर के रूप में सामने आएगा। 

मध्यप्रदेश भूभाग की दृष्टि से देश का दूसरा एवं जनसंख्या की दृष्टि से पांचवा बड़ा राज्य है। राज्य की शक्ति के रूप में विशाल युवा आबादी,श्रम शक्ति की भागीदारी, समृद्ध संस्कृति, समृद्ध जल संसाधन एवं व्यापक परिवहन नेटवर्क उपलब्ध है। मध्यप्रदेश की विशाल सीमाएं सामाजिक. सांस्कृतिक विविधताएं. विकास की अपार संभावनाएं प्रदान करती हैं। 

मध्यप्रदेश में तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल खजुराहो, सांची के स्तूप और भीम बैठका एवं दो ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर और औंकारेश्वर हैं। महाकाल की नगरी उज्जैन में महाकाल लोक के प्रथम चरण के लोकार्पण और द्वितीय चरण के कार्य के बाद पर्यटन क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। मध्यप्रदेश का विकसित प्रदेश की दहलीज पर ही खड़े रहने से भला नहीं होगा प्रदेश को उससे आगे बढ़ना ही होगा।

शिवराज सिंह चौहान में लीडरशिप है, दृष्टि है और जन भावनाओं से कनेक्ट होने का गुण भी है। मध्यप्रदेश के लिए यह प्राकृतिक अवसर हो सकता है। प्रदेश विकास के मामले में आगे छलांग लगाने की पूरी क्षमता रखता है लेकिन यह तभी संभव होगा जब सभी राजनीतिक दल और नेतृत्व विकास की दृष्टि के साथ ही आगे बढ़ें।