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राज्यवार संख्यावाद से बदल जाएगा अल्पसंख्यकवाद 

सार

जब भी कोई चीज बनाई जाती है तब उसके दूरगामी परिणामों को ध्यान रखा जाता है, कई बार ऐसी गलतियां हो जाती है जो वक्त के साथ ही समझ आती हैं। मोदी सरकार बनने के बाद धीरे-धीरे राष्ट्र से जुड़े ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनसे सरकार, अदालत और जनता सब का सिर चकरा रहा है। जिस रास्ते पर चलकर पूर्व सरकारों ने अपने महल खड़े किए थे वह रास्ते ही राष्ट्र की एकता के रास्ते में बड़ी बाधा बन रहे हैं। 

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विस्तार

ऐसे कई मामले हैं लेकिन ताजा मामला अल्पसंख्यक घोषित करने के वर्तमान कानूनों के आधार की विधिक समीक्षा और उसी आधार को जिलों तक लागू करने का है। राज्यों में संख्या के आधार पर हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने के संबंध में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। इसमें सरकार का कहना है कि अल्पसंख्यकों की पहचान का मामला संवेदनशील गंभीर और दूरगामी परिणाम वाला है। 

सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग कानून 2004 को चुनौती दी गई है। याचिका में राज्य और जिला स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 को भी चुनौती दी गई है। इस मामले में अल्पसंख्यकों को परिभाषित करने और जिला स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा निर्देश की मांग की गई है। 

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से दोनों मामलों में जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। केंद्र सरकार ने राज्यों से अभिमत मांगा था। अभी तक 14 राज्यों ने अभिमत दिया है बाकी राज्यों ने अभिमत नहीं दिया है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से समय मांगा है ताकि राज्यों से अभिमत  प्राप्त कर अदालत में पेश किया जा सके। 

पहले यह नहीं सोचा गया होगा कि अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए बनाए गए कानून भी कभी देश के गले की फांस बन जाएंगे। राष्ट्रीय स्तर पर संख्या के आधार पर अल्पसंख्यकों की पहचान करने के लिए कानून बनाए गए हैं, उसी के अनुसार अभी तक कार्यवाही की जा रही है। इसी के तहत विभिन्न समुदायों को अल्पसंख्यकों के रूप में मान्यता और विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं। 

इसी कानून को आधार बनाते हुए जनसंख्या के हिसाब से राज्यों और जिला स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान का मुद्दा उठाया  गया है। जनसंख्या के हिसाब से कई राज्यों में राष्ट्रीय आधार पर घोषित अल्पसंख्यक समुदाय अब बहुसंख्यक हो गया है। राष्ट्रीय स्तर पर जिन्हें बहुसंख्यक माना जाता है वे जनसंख्या के हिसाब से अल्पसंख्यक हो गए हैं। 

भारत में हिंदुओं को बहुसंख्यक माना जाता है लेकिन कई राज्य ऐसे हैं जहां हिंदुओं की जनसंख्या काफी कम है। मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब और नागालैंड जैसे कई राज्य और लद्दाख-कश्मीर में हिंदुओं की जनसंख्या अल्पसंख्यक है। ऐसे में अल्पसंख्यक पहचान के लिए जनसंख्या के आधार पर बनाए गए कानून हिंदुओं के मामले में लागू करने की मांग की जा रही है। 

वैसे तो अस्तित्व में हर जीव मौलिक और बेजोड़ है। किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकती। दुनिया में किसी भी दो इंसान की हाथ की रेखाएं एक जैसी नहीं होती। जहां इतनी स्वायत्तता का जीवन है वहां संख्या को जोड़कर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति केवल सतही कही जाएगी। जाति, संप्रदाय, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक और बांटने वाली प्रवृत्तियों का कारण मुख्यतः राजनीतिक ही माना जाता है। 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनाव शासन प्रणाली का बुनियादी आधार है। चुनाव में संख्या बहुमत का कारण बनती है इसीलिए सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी तरीके से बहुमत को जोड़कर शासन के सूत्र तक पहुंचना राजनीति का ध्येय बन गया है। राजनीति आज ऐसे मुकाम पर खड़ी है जहाँ तुष्टीकरण और संतुष्टिकरण मर्यादाओं और सीमाओं को खंडित कर रहा है। 


भारत में विभिन्न कानूनों का कोई एक सर्वमान्य आधार समझ में नहीं आता। कुछ मामलों में जनसंख्या को जिला स्तर पर आधार मानकर सरकारी व्यवस्थाएं की गई हैं। भारत में अनुसूचित जाति और जनजाति देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं लेकिन जनजाति क्षेत्र उनकी जनसंख्या की बहुलता वाले इलाकों को ही घोषित किया गया है। 

यहां तक कि जिला स्तर के पदों में आरक्षण की व्यवस्था भी आरक्षित समुदाय की उस जिले में जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होती है। ऐसे मामलों में आरक्षण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50% की सीमा की बाध्यता नहीं होती। इस मामले में जिला स्तर पर संख्या को स्वीकार किया जाता है तो फिर अल्पसंख्यक दर्जा देने के लिए जिला स्तर पर जनसंख्या को स्वीकार क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

जब कोई व्यवस्था बन जाती है तो उसमें बदलाव बहुत कठिन होता है। जनसंख्या में वृद्धि और जनसंख्या का असंतुलन आज बड़े मुद्दे के रूप में हमारे सामने खड़ा हुआ है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकारों पर दबाव बढ़ रहा है। जनसंख्या का स्वरूप बदलना भी चिंता का कारण बना हुआ है। जनसंख्या के असंतुलन के कारण राजनीतिक संतुलन बदल जाता है। जनसंख्या असंतुलन का कारण ख़ास समुदाय में अधिक जनसंख्या बढ़ना व अन्य स्थानों से जनसंख्या का दूसरे स्थानों पर पलायन है। 

भारत अकेला ऐसा देश है जहां देश में रहने वाले हर व्यक्ति का कोई रजिस्टर नहीं है। भारत सरकार द्वारा जब इसके लिए पहल की गई और CAA तथा NRC का कानून लाया गया तो उसका विरोध किया गया। आज तक इन कानूनों को लागू नहीं किया जा सका है। 

भारत में जनसंख्या विस्फोट का दूरगामी असर होने वाला है। अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान के लिए जिला स्तर पर संख्या को आधार बनाया जाएगा तो परिस्थितियों में असंतुलित बदलाव की संभावना हो सकती है। यह ऐसा मामला है जिसे ना निगला जा सकता है और ना उगला जा सकता है। भारतीय राजनीति में चुनाव की प्रक्रिया के चलते राष्ट्रीय हित के बुनियादी विषयों पर सहजता से फैसले होना संभव भी नहीं लगते।