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तीन मुख्यमंत्री ओबीसी से फिर भी समाज राजनीतिक रूप से पिछड़ा। आरक्षण के लिए सर्वे तो फिर जातिगत जनगणना में क्या झगड़ा? क्या पिछड़ा वर्ग आयोग जाति का आंकड़ा तय कर सकता है- सरयूसुत मिश्र

सार

देश में ओबीसी पॉलिटिक्स आज चरम पर है। केंद्र से लेकर हर राज्य और राज्य का मुख्यमंत्री ओबीसी हितैषी दिखना चाहता है। ओबीसी को स्थानीय संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मामले विभिन्न अदालतों में चल रहे है। मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय ने तो कितने बार फैसले दिए है, जिनमें नौकरियों में 14% आरक्षण को ही स्वीकार किया है..!

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विस्तार

कई बार पीएससी को अपनी चयन सूची बदलने की कार्यवाई करना पड़ा है। इसी प्रकार का मामला स्थानीय संस्थाओं और पंचायतों के चुनाव को लेकर भी चल रहा है। महाराष्ट्र सरकार के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने पुराने आरक्षण के आधार पर ही चुनाव कराने का फैसला दिया है।

मध्य प्रदेश सरकार की ओर से नगरीय निकायों और पंचायतों में आरक्षण देने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि बहुत जल्दी इस बारे में निर्णय आ जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने ओबीसी रिजर्वेशन पर ट्रिपल टेस्ट के मापदंडों की बात कही है। ओबीसी आरक्षण के लिए राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक आधार पर मापदंडों को पूरा करने पर ही आरक्षण की बात कहीं गई है।

मध्यप्रदेश में पिछड़े वर्गों के हित में काम करने के लिए गठित पिछड़ा वर्ग आयोग ने सभी 52 जिलों में ओबीसी का सर्वे एवम् डाटा स्टडी करने के बाद राज्य सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में प्रदेश में ओबीसी वोटर 48% बताते हुए, अब 27 नहीं 35 परसेंट आरक्षण की सिफारिश की गई है।

राज्य सरकार ने आयोग की सिफारिश स्वीकार करते हुए यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण की सरकार की मांग के समर्थन में प्रस्तुत कर दी है। मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है जहां लंबे वक्त से ओबीसी वर्ग के मुख्यमंत्री शासन संचालित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ओबीसी वर्ग से आते है फिर भी राज्य में यह समाज राजनीतिक रूप से पिछड़ा माना जा रहा है।

यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है कि पिछड़ा वर्ग आयोग को क्या जाति जनसंख्या निर्धारित करने का अधिकार है? अगर यह अधिकार राज्यों के पिछड़ा वर्ग आयोग के पास है तो फिर जाति जनगणना कराने से केंद्र सरकार ने क्यों मना कर दिया।बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से जाति जनगणना कराने के लिए मिलकर मांग की थी। फिर भी यह मांग स्वीकार नहीं की गई।

देश की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता के लिए काम कर रहे लोग जाति जनगणना को समाज और राष्ट्र को कमजोर करने वाला मानते है। योगी आदित्यनाथ यूपी चुनाव में 80 और 20 के बीच में मुकाबले का संदेश देते हुए 80 के बीच एकजुटता बनाने में सफल रहे। जातीय राजनीति 80 के वर्गों के बीच एकजुटता को निश्चित रूप से प्रभावित करेगी।
 
हिंदुत्व की राजनीति के समर्थक जातीय जनगणना के नुकसान को समझते है। इसलिए केंद्र सरकार शायद इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रही है। इन परिस्थितियों के बावजूद मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने यह जातीय सर्वे कैसे तैयार कर लिया? आयोग ने कौन से अध्ययन के आधार पर ओबीसी के आर्थिक राजनीतिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को सिद्ध कर दिया है?

मध्यप्रदेश में ओबीसी के अंतर्गत शामिल जातियां समाज के प्रभावशाली और समृद्ध रूप से किसानी करने वाली जातियां है। प्रदेश में लोधी, लोधा, किरार, धाकड़, पाटीदार, गुर्जर, मीना, माली, सैनी, कुशवाहा जैसी प्रभुत्व वाली जातियां पिछड़े वर्ग में आती है। इन जातियों को पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ भी प्राप्त होता है।

ओबीसी में क्रीमी लेयर की भी व्यवस्था है। अन्य वर्गों जिन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है। उनमें क्रीमी लेयर का प्रावधान शायद इसलिए नहीं है क्योंकि इन जातियों को परंपरागत रूप से पिछड़ा माना जाता है। पिछडे वर्ग में शामिल बड़ी आबादी समाज में अपना प्रभुत्व रखती है। इसलिए उस वर्ग के गरीब लोगों को लाभ देने के लिए व्यवस्था नियमों में की गई है।
 
पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी सिफारिशों में नगरीय निकायों और पंचायतों में ओबीसी वर्ग को 35% आरक्षण देने की सिफारिश की है। प्रदेश में इन संस्थाओं के चुनाव 3 सालों से नहीं हो पा रहे है। आरक्षण के विवाद को लेकर वर्तमान सरकार किस स्तर तक कमिटेड है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रिपल टेस्ट के नाम पर आरक्षण बढ़ाने के सरकार के प्रयास पर सवाल किया था। तब सरकार की ओर से यह कहा गया था कि पंचायतों में बिना ओबीसी का आरक्षण बढ़ाएं चुनाव नहीं कराए जाएंगे। स्थानीय स्तर पर शासन की संवैधानिक व्यवस्था नगरी निकाय और पंचायत के चुनाव नहीं होना क्या कानून का राज माना जाएगा?

समाज के कमजोर वर्गों को आरक्षण देना न केवल न्यायोचित है बल्कि बराबरी के लिए जरूरी है। लेकिन आरक्षण अगर राजनीति का विषय बन जाए तो फिर इससे समाज को फायदा कम होता है। मध्यप्रदेश में पक्ष और विपक्ष दोनों इस बात में एक दूसरे के आगे निकलने में लगे हुए हैं कि ओबीसी आरक्षण का श्रेय किसको मिले। भाजपा की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि ओबीसी को 14% से बढ़ाकर 27% आरक्षण देने का फैसला उसकी सरकार द्वारा किया गया है। कांग्रेस की ओर से भी ऐसा ही दावा किया जा रहा है कि 15 महीने की उनकी सरकार में ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने का निर्णय लिया गया था।

उच्च न्यायालय लोक सेवा आयोग की नियुक्तियों में 27% आरक्षण देने मांग को ठुकरा चुका है। न्यायालय ने तो यहां तक कहा है कि लोक सेवा आयोग को अपनी सिलेक्शन लिस्ट में फेरबदल करना होगा। यदि आबादी के हिसाब से और जाति के हिसाब से आरक्षण सुनिश्चित करना है तो फिर जाति जनगणना से परहेज करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

एक बार जाति जनगणना हो जाए ताकि सभी जातियों को अधिकृत रूप से यह जानकारी मिल जाए कि उनकी आबादी कितनी है। राज्य में उनका क्या प्रतिशत है और उन्हें क्या उस प्रतिशत में शासकीय लाभ प्राप्त हो रहे है? जब समाज और राष्ट्र की एकजुटता से ज्यादा राजनीतिक लाभ दृष्टिकोण बन जाए तब जातियों का खुला खेल रोकने की कोशिश क्यों करनी चाहिए?