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अमृत महोत्सव : ये अकाल मौतें रोकी जा सकती हैं

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 29 May

सार

प्रकृति की पूजा करने की बात करने वाले देश में प्रकृति से निरंतर खिलवाड़, और उसके बदले में बढ़ते प्राकृतिक प्रकोप और उसमें होने वाली अकाल मृत्यु के आंकड़े हिला देने वाले हैं..!

janmat

विस्तार

प्रतिदिन-राकेश दुबे

09/08/2022

देश अमृत महोत्सव मना रहा है | देश क्या था,की गौरव गाथा के बीच हम भारतीयों को यह होश रहना चाहिए कि भविष्य में देश कैसा होगा ? प्रकृति की पूजा करने की बात करने वाले देश में प्रकृति से निरंतर खिलवाड़,  और उसके बदले में बढ़ते प्राकृतिक प्रकोप और उसमें होने वाली अकाल मृत्यु  के आंकड़े हिला देने वाले हैं | पिछले साल आकाशीय बिजली से २८७६ भारतीयों की अकाल मृत्यु हुई |१९६७ से २०१९ के बीच बिजली गिरने से भारत में एक लाख से ज्यादा मौतें दर्ज़ की गई हैं।प्रकृति से छेड़छाड़  से और क्या हो सकता है?इसका अनुमान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने एक रिपोर्ट में लगाया है रिपोर्ट में बताया गया है कि तेज गर्मी के कारण गेहूं, चना, मक्का, लोबिया, सरसों की पैदावार में खासी कमी होने का अंदेशा है। इसके साथ-साथ फलों और सब्जियों की उपज में भी कमी आएगी। इसके चलते मवेशियों की सेहत भी प्रभावित होगी और दूध उत्पादन भी घटेगा।क्या अमृत महोत्सव में इस पर मंथन नहीं होना चाहिए ?

यूं तो अमेरिका जैसे विकसित देश में भी बरसात के मौसम में बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं लेकिन उनसे भारत जैसी मृत्यु नहीं होती- इसका कारण है पूर्वानुमान की उन्नत तकनीक का उपलब्ध होना।भारत इस मामले में फिसड्डी है |

सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि २०२२  में तेज गर्मी/लू के २०३  दिन रिकॉर्ड किये गए जबकि पिछले वर्ष यह संख्या महज़ ३८ दिन थी अर्थात लगभग छह गुना वृद्धि। चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई कि सबसे ज्यादा लू का सामना उत्तराखंड को करना पड़ा - प्रमुख रूप से इस पहाड़ी राज्य में २८ दिन ऐसे थे, जिसमें पहाड़ी इलाकों का अधिकतम तापमान ३०  डिग्री सेल्सियस को पार कर गया और मैदानी इलाकों का ४०  डिग्री |सबसे ज्यादा गर्मी वाले अन्य अग्रणी राज्य राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, झारखण्ड और दिल्ली हैं। असम, हिमाचल और कर्नाटक को एक दिन भी तेज गर्मी का सामना नहीं करना पड़ा।जानकार इस सबका कारण नंगे होते पहाड़ और मैदान में साफ होते जंगल मानते हैं | जल , जंगल ,जमीन प्रकृति है, उसके बचाव के परिणाम स्वरूप वर्षा अन्न उत्पादन और संसार के चक्र का चलना है |

कुछ दिनों पहले ‘वेदर एंड क्लाइमेट एक्सट्रीम्स’ नामक जर्नल में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा कहा गया है कि तेज गर्मी के कारण ६२.२ प्रतिशत और आकाशीय बिजली गिरने के कारण ५२.८ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।  यदि मौसम के बेहतर और प्रामाणिक पूर्वानुमान लगाए जा सके तो इससे ऐसी मृत्यु दर में कमी आ सकती है ।इस वर्ष मार्च और अप्रैल में गर्मी सामान्य से पांच डिग्री या ज्यादा ऊपर रही। मौसम विभाग के आंकड़ों में बताया गया कि पिछले १२२ सालों में इस तरह की गर्मी नहीं पड़ी।

यह जानना चकित करता है कि इस देश में प्राकृतिक आपदाओं के चलते होने वाली मौतों में सबसे ऊपर आकाशीय बिजली (तड़ित) का नाम आता है और दिनों दिन यह संख्या बढ़ती जा रही है। सरकार द्वारा जारी किये आंकड़े बताते हैं कि बरसात के दिनों में आकाश में बिजली चमकने और धरती पर गिरने की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। १९७०  की तुलना में २०१९  आते-आते तड़ित आधारित मृत्यु दर में डेढ़ गुना से ज्यादा वृद्धि हुई।

प्रकाशित आंकड़े भिन्न – भिन्न सूचना देते हैं इसलिए मृत्यु के आंकड़े किस राज्य से सबसे ज्यादा आते हैं यह सही-सही बताना मुश्किल है। प्रकाशित खबरों को देखकर यह अनुमान लगाया  जा सकता है कि आकाशीय बिजली के कोप से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले राज्यों में ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र इत्यादि अग्रणी हैं।इन राज्यों में वन भी कम नहीं कटे हैं |

अभी हाल में प्रकाशित एक लेख में बीबीसी ने बताया है कि अमेरिका में यदि तापमान १  डिग्री बढ़े तो आकाशीय बिजली की घटनाओं में १२  प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। यह तथ्य सिर्फ अमेरिका में नहीं बल्कि भारत सहित उन तमाम देशों के लिए भी सही हो सकता है जिनमें अनेक कारणों से औसत तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है।भारत में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां सबसे ज्यादा मौतें साल-दर-साल बिजली गिरने से होती हैं। ऐसा ही एक गांव है पश्चिम बंगाल में कोलकाता से १२० किलोमीटर दूर समुद्र तट पर बसा हुआ, “फ़्रेजर गंज”, इस गांव में हर साल औसतन ६०  जानें बिजली गिरने से जाती हैं। इनके बचाव के लिए भरसक प्रयत्न किए जाने चाहिए।

सरकारी स्तर पर बिजली गिरने के पूर्वानुमान के कथित ऐप को लेकर चाहे जो दावे किए जाते रहे हों, अपनी स्थानीय पहल पर गांववासी देसी तड़ित चालक बना कर मृत्यु दर कम कर रहे हैं। वे बांस के डंडों के ऊपर साइकिल के पुराने पहियों के रिम को तिरछा टांग देते हैं और उनमें धातु के तार बांध कर दूसरा सिरा जमीन में गड्ढा बना कर गाड़ देते हैं जिससे धातु का होने और ऊंचाई पर होने के चलते बिजली इनपर गिरे और तार से होती हुई जमीन में समा जाए। ग्रामीणों की इस मुहिम के सकारात्मक परिणाम आए हैं और मौतों में साठ फ़ीसदी तक की कमी देखी गई है। सरकार को और उससे पहले समाज को कुछ सोचना चाहिए, अमृत महोत्सव गौरव गान के बीच हम भारतीयों को यह होश रहना चाहिए कि भविष्य में देश कैसा होगा ?