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जब लड़ोगे तभी भ्रष्टाचार से जीतोगे

सार

जिस जमीन पर सांस लेने के लिए पार्क बनाया जाना था, वहां अवैध तरीके से करप्ट पॉवर ने सांठगांठ कर बहुमंजिला इमारत खड़ी करा दी थी..!

janmat

विस्तार

भारत के लोगों ने कल कंट्रोल ब्लास्ट से देश में पहली बार दो बहुमंजिला टॉवर ध्वस्त होते हुए देखे। लोहे-ईंट और सीमेंट से बने दोनों टॉवर के पीछे भ्रष्टाचार और कानून के राज की लाश खड़ी थी। नोएडा में अब यह टॉवर नहीं है लेकिन इनके निर्माण के पीछे जो करप्ट पॉवर था वह आज भी मस्त दिखाई पड़ता है। 

करप्ट पॉवर की सांठगांठ के ऐसे टॉवर भले नहीं हो लेकिन टपरिया दो देश के हर कोने में मिल जाएंगी। दोनों टॉवर्स को ध्वस्त करने के फैसले पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। देश की सर्वोच्च न्यायालय को सेल्यूट किया जाना चाहिए कि ये दोनों टॉवर  ढहाने का सख्त आदेश जारी कर भ्रष्टाचार के खिलाफ और कानून के राज के लिए ऐसा सख्त संदेश दिया है जो सदियों तक न केवल याद रखा जाएगा बल्कि रियल स्टेट सेक्टर की भावी दिशा भी निर्धारित करेगा। 

जिस जमीन पर सांस लेने के लिए पार्क बनाया जाना था, वहां अवैध तरीके से करप्ट पॉवर ने सांठगांठ कर बहुमंजिला इमारत खड़ी करा दी थी। रहवासियों की लड़ाई सफल हुई, दोनों टॉवर इतिहास का विषय बन गए हैं। अब तो वहां 'रूल आफ लॉ' का स्मारक बनाना चाहिए। 

रियल एस्टेट सेक्टर सबसे तेज और सर्वाधिक मुनाफे वाला क्षेत्र माना जाता है। इसके बाद भी बिल्डर-डेवलपर और संबंधित सरकारी एजेंसियों के अफसर अपने ईमान को बेच कर पैसा कमाने में कानून के राज को बेचने का काम करते हैं। किसी भी इंसान के लिए घर पहली जरूरत है। शहरी इलाकों विशेषकर मुंबई-दिल्ली जैसे बड़े शहरों में हजारों लोग अपने घर का सपना संजोये दुनिया से चले जाते हैं। अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा घर पर लगाने वाले खरीददार जब बिल्डर-डेवलपर के लोभ और बेईमानी का शिकार होते हैं, तब उनका जीवन बर्बाद हो जाता है। 

दिल्ली के विकास के साथ नोएडा जमीनों के धंधे और मकानों की खरीदी बिक्री के लिए बिल्डर्स के लिए स्वर्ग जैसा बन गया है। जिन अफसरों को यहां के विकास प्राधिकरण में सेवा का मौका मिल जाता है उन्हें फिर दोबारा कहीं और सेवा करने की जरूरत ही नहीं रह जाती। चाहे राजनेता हों, ब्यूरोक्रेट हों, बिल्डर हों, सब मिलकर जमीनों की बंदरबांट और मकानों के घटिया निर्माण से मोटी कमाई में लग जाते हैं। 

यह कोई पहला मामला नहीं है जब नोएडा में भ्रष्टाचार के टॉवर ध्वस्त किए गए हैं। इसके पहले भी इस विकास प्राधिकरण में काम करने वाले कई अधिकारी जेल तक जा चुके हैं। उत्तरप्रदेश के एक पूर्व मुख्य सचिव को भी जमीनों की बंदरबांट में ही जेल जाना पड़ा है। यह कैसी व्यवस्था है कि अवैध निर्माण की अनुमति जारी करने वाले सरकारी अफसर बच जाते हैं और राष्ट्रीय संपत्ति ध्वस्त हो जाती है। 

कई लोग इस बात से नाखुश दिखाई पड़ते हैं कि इन दोनों टॉवर में जो संसाधन लगे थे, उनको क्यों बर्बाद किया गया? कुछ लोग ऐसा भी कहते दिखाई पड़ रहे हैं कि इनको ध्वस्त करने की बजाय राजसात कर इनका उपयोग जनहित में किया जाना चाहिए था। रियल एस्टेट सेक्टर में गोलमाल, गड़बड़ी और बेईमानी रोज का विषय बन गई है। इसलिए ऐसे सख्त कदम की जरूरत थी जिससे देश में इस बात का संदेश जाए कि अब इस क्षेत्र में बेईमानी और नाइंसाफी नहीं चल सकेगी। शायद यही सोच कर सर्वोच्च न्यायालय ने इतना सख्त फैसला सुनाया था। जेपी इन्फ्रास्ट्रक्चर और यूनिटेक बिल्डर का मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। 

हर शहर में रियल स्टेट सेक्टर और उपभोक्ताओं के बीच में समस्याओं के समाधान को लेकर लंबा संघर्ष चलता रहता है। प्लाट लेने से शुरू हुआ संघर्ष भवन निर्माण की गुणवत्ता और घर का कब्जा पाने तक रुकता नहीं है। देश के किसी भी प्राइवेट बिल्डर द्वारा विकसित कॉलोनी में चले जाइए, बहुत साफ दिखाई पड़ेगा कि जो वायदा किया गया था वह बिल्डर-डेवलपर द्वारा पूरा नहीं किया गया है। रहवासी अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। कहीं सड़कें नहीं हैं तो कहीं पानी नहीं है। बिल्डर एक बार कॉलोनी विकसित कर चले जाते हैं और इन्हें रहवासियों की समितियों को सौंप दिया जाता है। फिर यह समितियां जीवन भर मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती रहती हैं। 

ऐसा नहीं है कि सरकारों को रियल स्टेट उपभोक्ताओं के साथ हो रही धोखाधड़ी और नाइंसाफी का पता नहीं है। मोदी सरकार ने रियल स्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन किया है। इस अथॉरिटी ने उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके बाद भी उपभोक्ता प्रक्रियाओं के जाल में उलझा रहता है। 
 
बिल्डर चूँकि प्रभावशाली होता है और उसका राजनीति और ब्यूरोक्रेट से सीधा संबंध होता है। इसलिए बिल्डर से उपभोक्ता का लड़ना बहुत कठिन होता है। बिल्डर की नाइंसाफी के खिलाफ उपभोक्ताओं की आवाज को मीडिया में भी कोई स्थान नहीं मिलता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बिल्डर मीडिया के लिए बड़ा विज्ञापनदाता होता है। राजनीतिक दलों को चंदा देने में भी रियल एस्टेट सेक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जमीन जायदाद और रियल स्टेट के कानून इतने जटिल होते हैं कि आम उपभोक्ता उनके जाल में उलझा रहता है। 

मध्यप्रदेश में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां ब्यूरोक्रेसी के शीर्ष पदों पर रहने वाले आईएएस अधिकारियों ने लो डेंसिटी एरिया में कानून तोड़कर बड़े-बड़े बंगले बनाएं हैं। ऐसे लोगों के लिए उनकी इच्छा ही कानून का राज मानी जा सकती है। 

डेमोक्रेटिक सरकारों द्वारा भी रियल एस्टेट सेक्टर में जाने-अनजाने अवैध गतिविधियों को बढ़ाया जाता है। मध्यप्रदेश में चुनावी लाभ के लिए अवैध कॉलोनियों को नियमित करने का महापाप भी किया गया है और भी राज्यों में इस तरीके के निर्णय लिए जाते हैं। चुनावी राजनीति में लाभ के लिए शहरों के व्यवस्थित विकास और नियम कानून का पालन करते हुए अपना घर बनाने खरीदने वाले उपभोक्ताओं को साफ-सुथरी हवा में सांस लेने का मौका भी छीन लिया जाता है। ‘सबके लिए घर’ सरकार की जिम्मेदारी हो सकती है लेकिन इसके लिए पूरी सोसाइटी की आबोहवा को खराब करते हुए अवैध कॉलोनियों को नियमित करने का अधिकार सरकारों को कैसे मिल जाता है?

रियल एस्टेट सेक्टर भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में हर शहर में देखा जा सकता है। बिल्डर-डेवलपर और अफसरों की सांठगांठ हर स्थान पर स्पष्ट देखी जा सकती है। उपभोक्ता, विकास प्राधिकरण और कलेक्टर-कमिश्नर कार्यालय में भटकते मिल जाएंगे। राजस्व, नगर निगम, विकास प्राधिकरण ऐसे संस्थान होते हैं जो जिसे चाहे उसे सही और जिसे चाहे उसे गलत साबित कर सकते हैं। 

मशहूर फिल्म अभिनेत्री कंगना रानावत के साथ शिवसेना सरकार का जब टकराव हुआ तो उनके वर्षों पुराने  घर का एक हिस्सा अवैध निर्माण के नाम पर तोड़ दिया गया था। ऐसी घटनाएं हर शहर में मिल जाएंगी। सरकारी एजेंसियां चाहे तो जिस भी घर पर पहुंच जाएं, वहां अवैध निर्माण निकाल सकते हैं। इसके विपरीत वह अगर चाहें तो किसी भी अवैध निर्माण को विधि सम्मत बताने की ताकत भी रखते हैं। 

घर के बिना किसी का काम नहीं चलता और घर का व्यापार जैसे भ्रष्टाचार के बिना नहीं चलता। इस धंधे में लगे और इससे जुड़े लोग भ्रष्टाचार का ही व्यापार करते हैं। नोएडा में ध्वस्त दोनों टॉवर इसे साबित भी कर रहे हैं। रियल स्टेट में उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण को प्रभावी बनाने की जरूरत है। रेरा को ज्यादा प्रभावी और त्वरित किया जाना चाहिए। सामान्य सरकारी प्रक्रिया की तरह रेरा की कार्यप्रणाली आम लोगों का जीवन बर्बाद कर सकती है। 

लोभ-लालच और भ्रष्टाचार का पर्दा लोगों को अंधा कर देता है। रियल एस्टेट सेक्टर में भ्रष्टाचार की संभावनाओं को समाप्त करने वाली सरकार को कितनी पापुलैरिटी मिलेगी, इसका केवल अंदाजा लगाया जा सकता है। बहुत बड़ी संख्या में लोग पीड़ित हैं। उन्हें राहत देने के लिए रियल एस्टेट सेक्टर में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के टॉवर को ध्वस्त करने की आज जरूरत है।