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सुप्रीम कोर्ट-संसद-सड़क तक क्यों है शोर?

सार

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के खिलाफ याचिकाओं को निरस्त करते हुए ईडी के गिरफ्तारी के अधिकार को सलामत रखते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा संदेश दिया है। ईडी द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के मामलों में लगातार की जा रही छापेमारी, गिरफ्तारी और कैश बरामदगी से राजनीतिक हलकों में कंपकंपी का माहौल है। सोनिया गांधी से लेकर ममता बनर्जी, महबूबा मुफ्ती से लेकर शरद पवार जैसे नेताओं को ईडी के नाम पर पसीने छूट रहे हैं। कोई खुद उलझा हुआ है तो किसी के शागिर्द ईडी के जाल में फंस कर जेल भुगत रहे हैं। 

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विस्तार

राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस केंद्रीय एजेंसी के दुरुपयोग के आरोप हर रोज का विषय बन गए हैं। इसमें बड़ा सवाल यह है कि छापेमारी में ईडी को जो करोड़ों का कैश मिल रहा है, वह ईदी (उपहार) तो नहीं हो सकती। भ्रष्टाचार से काली कमाई के कुबेरों को डरना ही चाहिए। अगर इसे सच भी माना जाए कि राजनीतिक इशारों पर जांच एजेंसी चुन-चुन कर छापे की कार्यवाही कर रही है तो भी वास्तविक रुप से पकड़ी तो काली कमाई ही जा रही है। जो लोग काली कमाई कर देश को और सिस्टम को लूट रहे हैं, उन पर कार्यवाही के खिलाफ एजेंसी पर ही दोषारोपण काली राजनीति ही मानी जाएगी। 

आज संसद से लगाकर सड़क तक ईडी के खिलाफ आंदोलन किए जा रहे हैं। ऐसे दलों को जब यह महसूस हुआ कि जनता में गलत संदेश जा रहा है, तब आंदोलन में महंगाई और सांसदों के निलंबन के कुछ मुद्दों को जोड़ने की औपचारिकता की गई। प्रीवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानि पीएमएलए के तहत ईडी को मिले अधिकारों को चुनौती देते हुए लगाई गई सभी याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने नकारते हुए एजेंसी के अधिकारों को बरकरार रखा है। एजेंसी से पीड़ित पक्ष का तो यहां तक कहना है कि यह मौलिक अधिकारों का हनन है। कोई भी सरकारी एजेंसी बिना एफआईआर की कॉपी दिए हुए किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी कैसे कर सकती है? ईडी के अंतर्गत एफआईआर नहीं बल्कि ईसीआईआर (ECIR) दर्ज की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि ईडी की गिरफ्तारी के अधिकार जायज हैं।  

मनी लॉन्ड्रिंग काले धन को सफेद करने के लिए की जाती है। मनी लॉन्ड्रिंग कानून का उद्देश्य काले धन को सफेद करने के तौर-तरीकों को रोकना है। देश में जिस तरह राजनीतिक क्षेत्रों में और सिस्टम में बड़े लेवल पर भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो रहे हैं, उसको देखते हुए काली कमाई को सफेद करने की कोशिशों को रोकना देश के लिए जरूरी है। इस पर सख्ती से जहां एक ओर भ्रष्टाचार पर चोट होगी वही काली कमाई की प्रवृत्ति हतोत्साहित होगी। 

ईडी की कार्यवाही का ताजा मामला पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले की परतें उजागर कर रहा है। इस घोटाले से हासिल की गई काली कमाई में 50 करोड़ से ज्यादा नगद राशि बरामद की जा चुकी है। केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी द्वारा ईमानदारी से कार्यवाही नहीं की गई होती तो यह काली कमाई सफेद करने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती। कंपनी कानूनों और बैंकिंग सिस्टम में डिजिटाइजेशन के कारण प्रक्रियाएं जहां पारदर्शी हुई हैं वहीं गड़बड़ियों को पकड़ना आसान हुआ है। 

राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की काली कमाई को खपाया जाता है। चुनाव के दौरान नगद पैसों से मतदाताओं को प्रभावित करना आसान रहता है। सत्ताधारी दल को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों की ओर से यह आवाजें आ रही हैं कि ईडी के कारण देश में आतंक का माहौल है। राजनीतिक क्षेत्रों में जरूर आतंकित करने वाला माहौल हो सकता है। वैसे तो इस केंद्रीय एजेंसी की आजकल सर्वाधिक चर्चा हो रही है। एजेंसी द्वारा बरामद की गई नगद राशि देख-देख कर देशवासियों की आंखें चकरा रही हैं। पब्लिक को तो ऐसा लगता है कि राजनीति और बड़े नौकरशाहों से जुड़े ठिकानों को जहां कहीं भी तलाश लिया जाए वहां काली कमाई निकलना निश्चित है। 

नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस वर्सेस ईडी का वातावरण पूरे देश में बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ को लेकर कांग्रेस पार्टी द्वारा पूरे देश में आंदोलन-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। देश के विभिन्न राज्यों में ईडी के कार्यालयों पर कालिख पोती जा रही है। प्रतीकात्मक रूप से कुछ जगहों पर भाजपा के झंडे लगाए गए हैं। कांग्रेस संदेश देना चाहती हैं कि भाजपा के इशारे पर उनके नेताओं के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है। कांग्रेसी नेता ऐसी सफाई देते हैं कि नेशनल हेराल्ड मामले में पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ है फिर मनी लांड्रिंग कैसे हुई?

ईडी के सूत्रों से जो तथ्य सामने आए हैं उसमें यह बताया जा रहा है कि एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की संपत्ति यंग इंडिया कंपनी को ट्रांसफर की गई और इस ट्रांसफर में सुनियोजित तरीके से बहुत कम कीमत पर बड़ी संपत्ति हथियाई गई है। इस मामले में क्या सच है यह तो धीरे-धीरे स्पष्ट होगा लेकिन कानून की दृष्टि से देश का हर नागरिक बराबर है। किसी से भी पूछताछ हो सकती है। जो भी पीड़ित है उसके लिए न्याय के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। 

कांग्रेस जैसी पार्टी को जांच एजेंसी को निशाने पर लेते हुए आंदोलन की कोई जरूरत नहीं लगती। हमारे कानून कहते हैं कि किसी भी शासकीय एजेंसी के काम में बाधा पैदा करने की कोशिश अपराध होती है। भ्रष्टाचार की जांच कर रही एजेंसी के खिलाफ आंदोलन क्या केवल राजनीतिक मानकर स्वीकार किया जा सकता है। इसके कानूनी पहलू भी जरूर देखे जाने चाहिए। 
 
आजकल राजनीतिक क्षेत्र ऐसे-ऐसे बिरले उदाहरण पेश कर रहा है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर ही सवाल उठ रहे हैं। संसद के संचालन पर करोड़ों रुपए प्रतिदिन खर्च हो रहे हैं और राजनीतिक गतिरोध के कारण संसद ठप कर दी जाती है। संसद को राजनीतिक अखाड़े के रूप में तब्दील कर दिया जाता है। सांसदों के लिए निलंबन की कार्यवाही कठोर हो सकती है लेकिन नियमों के अनुरूप कार्यवाही नहीं करने पर अराजकता का माहौल बनता है। 

लोकसभा में कांग्रेस के नेता राष्ट्रपति के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं। राजनीतिक लीडरशिप आखिर देश में क्या संदेश देना चाहती है? समाज के सामान्य शिष्टाचार और व्यवहार के विरुद्ध आचरण करने वाले आम लोगों को नेतृत्व देने में ऐसे नेता कैसे सक्षम हो सकते हैं? पब्लिक को कहा जाता है सत्य बोलो, राजनीतिक क्षेत्र में शायद असत्य ही सत्य होता है। चुनावी वायदे और उनकी हकीकत से अधिक सत्य-असत्य का स्वरूप और कुछ नहीं हो सकता। 

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखना चाहिए। जिस तरह से न्यायालयों पर देश का हर व्यक्ति विश्वास करता है, उसी तरीके से जांच एजेंसियों पर भी विश्वास करना चाहिए। तमाम सारे विवादों के बाद भी ऐसा कभी भी नहीं देखा गया कि जिन भी प्रकरणों में ईडी द्वारा कार्यवाही की गई वह बिलकुल आधारहीन निकले हों। यह अलग बात है कि कानूनी प्रक्रिया में ऐसे प्रकरणों में अंतिम निष्कर्ष निकलने में वर्षों लग जाते हैं। आरोपियों को सजा मिलने में समय निकल जाता है। जांच एजेंसी को भी इस बात की पूरी कोशिश करना चाहिए कि जिन भी प्रकरण में जांच की जाए उनको अंतिम लक्ष्य तक यानि आरोपी को दंड दिलाने के अंजाम तक पहुंचाया जाए।