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सुसंस्कृत भारत का असंस्कृत इंडिया बनने का चिंतनीय दौर

सार

मणिपुर को भारत का गहना कहा जाता है. भारत की इस मणि के नागफनी बनने से देश शर्मसार है. मात्र स्वरूप बेटियों के साथ दुर्व्यवहार की घटना ने भारत माता को अपमानित और कुंठित किया है. प्रधानमंत्री से लगाकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इस बर्बर घटना की निंदा के साथ ही कठोर कार्यवाही का विश्वास दिलाया है. कार्यवाही तो होगी लेकिन इससे भारत की आत्मा को जो ठेस लगी है उसकी भरपाई कैसे हो सकेगी?

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विस्तार

सुसंस्कृत भारत के असंस्कृत इंडिया बनने के इस चिंतनीय दौर ने राजनीतिक और सामाजिक नेताओं को सियासत से ऊपर इंसानियत और मानवीयता की रक्षा के लिए ईमानदारी से आगे आने का अवसर दिया है. सियासी लाभ-हानि और विभाजनकारी प्रवृत्तियों और ताकतों से एक दूसरे को नीचा दिखाने की सियासी मनोवृत्तियाँ अगर ऐसे ही चलती रहीं तो भारत को वसुधैव कुटुंबकम की बुलंद आवाज से पीछे हटना पड़ेगा.

जिस देश के एक राज्य में जातीय और नस्लीय हिंसा गृहयुद्ध का ऐसा रूप ले ले और बेटियों को सरेआम निर्वस्त्र करने में भी शर्मिंदगी ना हो, जो अपने पड़ोसियों को भी सम्मान नहीं दे पा रहा है, वह वसुधैव कुटुंबकम का दावा करने का हक कैसे रख सकता है? मणिपुर की समस्याएं क्या हैं? वहां आदिवासी समुदायों के बीच में हिंसा और संघर्ष इस स्तर पर कैसे पहुंच गया? यहाँ बीजेपी की सरकार है. लंबे समय से मणिपुर हिंसा से चल रहा है. मणिपुर में पहचान और स्थानीयता से जुड़ी लड़ाइयाँ इस वीभत्स स्तर तक क्यों पहुंचने दी गईं? भारत की सीमा से लगे इस राज्य में सदियों पुराने जनजातीय संघर्ष के इस रूप के समाधान की अभी तक कोई कारगर पहल क्यों नहीं की गई?

इस राज्य में विदेशी घुसपैठ और दोनों प्रमुख जनजातियों के बीच स्थानीयता और आरक्षण का विवाद संकट के कारणों में माना जाता है. एनआरसी की मांग और डर, अवैध प्रवासियों के कारण पैदा हो रहे जातीय अशांति के खतरे को रोकने की ठोस जरूरत है. जब भी जातीय संघर्ष चरम पर होते हैं तब वहां की शासन व्यवस्था का विभिन्न जातीय समूहों के प्रति निष्पक्ष और तटस्थ होना शांति बहाली के लिए सबसे कारगर होता है. लगता है कि मणिपुर सरकार के प्रति सभी समुदायों में यह भरोसा नहीं बन पाया है. इस समस्या को सुलझाने का प्रयास तब तक कारगर नहीं होगा जब तक समस्या की जड़ में जाकर उसके समाधान के लिए सभी पक्षों और हितधारकों को विश्वास में नहीं लिया जाएगा.

मणिपुर के मुद्दे पर संसद आज नहीं चल पाई है. ऐसा कोई मुद्दा विपक्षी दलों के हाथ लगे और उस पर सियासत ना हो यह तो भारत के लिए अजूबा और आठवां आश्चर्य ही माना जाएगा. दल कोई भी हो विपक्ष में रहते हुए ऐसे मुद्दों को कोई भी अपने सियासी लाभ के लिए उपयोग करने से पीछे नहीं हटता. कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल इस मुद्दे पर बीजेपी को घेर रहे हैं तो यह कोई आश्चर्यजनक नहीं है. यह उनका दायित्व भी है लेकिन समस्या के समाधान में सरकार के साथ सहयोग भी विपक्षी दलों का कर्तव्य होना चाहिए.

इस तरह की अमानवीय और दिल दहलाने वाली घटनाएं कई बार कई राज्यों में देखी गई हैं. कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा का मामला सभी राज्यों में चुनौती बना हुआ है. मणिपुर की घटना तो जातीय और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ गई है. जब तक दोनों समुदायों के जख्मों को भरा नहीं जाएगा तब तक केवल ताकत के बल पर स्थितियों को संभालना संभव नहीं हो सकेगा. सीमावर्ती राज्य होने के कारण मणिपुर की स्थिति काफी संवेदनशील है. भारत की सुरक्षा भी इससे जुड़ी हुई है.

अपराध स्वभाव का हिस्सा होता है. अहंकार और क्रोध चारों तरफ प्रकट होता दिखाई पड़ता है. समाज में आजकल जैसी घटनाएं दिखाई पड़ रही हैं वह तो अपराध और मनोविकार की पराकाष्ठा ही कहीं जाएंगी. कोई किसी निरीह व्यक्ति पर पेशाब कर रहा है तो कोई महाकाल की सवारी पर थूकने की हिम्मत कर रहा है. कोई बेटियों को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र घुमाने का महापाप कर रहा है. ऐसी सोच और मानसिकता समाज और अपराधियों में क्यों बढ़ रही है यह देश के लिए चिंता का विषय होना चाहिए.

सबसे बड़ी चिंता हर घटना पर सियासत और उससे लाभ हानि का गणित है. इस वीभत्स घटना से भी बर्बर और अमानवीय घटनाएं देखी गई हैं. हर समय सियासत एक जैसी होती है लेकिन फिर उस घटना को भुला दिया जाता है. धीरे-धीरे यह सियासी प्रवृत्ति समाज पर हावी होती जा रही है. अमीरी-गरीबी और असमानता की दृष्टि से भेदभाव तो समझा जा सकता है लेकिन सरकारी लाभ और सुविधाओं के लिए जातियों और समुदाय का भेद कर सियासी हित साधने की प्रवृत्ति देश का सर्वाधिक नुकसान कर रही है.

किसी भी घटना का अगर गहराई से अध्ययन किया जाएगा तो इसके पीछे कहीं न कहीं सियासत में एक दूसरे को नीचा दिखाने की घटिया सोच मिल ही जाएगी. जब प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करती तो फिर सुविधाओं में सियासी भेदभाव क्यों किया जाना चाहिए? इस भेदभाव के कारण जो मनोविकार दूसरे लोगों में पैदा होते हैं वह भले ही लंबे समय के बाद ही सही लेकिन विभाजन की बुनियाद को मजबूत करते हैं.

हमारी सियासत की विचारधारा ही विभाजन की बुनियाद पर खड़ी है. स्थापित राजनीतिक दलों के लच्छेदार भाषण से  किसी गरीब का पेट नहीं भरता. इन भाषणों से वोट की फसल उगाकर राजनीतिज्ञ अपना ही पेट भरने का उपक्रम करते हैं. राजनीतिक दल अब तो अपने राजनीतिक नजरिए में इंडिया को ही बांटकर राजनीतिक हित साधने का प्रयास करने लगे हैं. यूपीए अब इंडिया बन गया है. अब जो यूपीए में नहीं है वह क्या इंडिया का हिस्सा नहीं माना जाएगा?

भारतीय संस्कृति और सभ्यता ने ऐसे कई वीभत्सकारी दौर देखे हैं. हमारा सनातन शास्त्र रामायण हमें बताता है कि राक्षस रावण ने भी स्त्री की मर्यादा का सम्मान कायम रखा था. अपने को सभ्य और आधुनिक समाज होने का दावा करने वाले भारत के लोग क्या मणिपुर जैसी घटना की कल्पना सपने में भी कर सकते हैं? ऐसा लगता है कि अब हर साल दशहरे पर रावण को जलाने से ज्यादा हर दिन ऐसे वीभत्सकारी और विभाजन कारी कृत्यों को अंजाम देने वालों की आत्मा को जलाने और जगाने की जरूरत है.