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“हाय-हाय" "वापस जाओ" क्यों बन रही हैं ये राजनीतिक हवाएं। ना लांघो मर्यादायें, खत्म हो रही हैं सहनशक्ति की सीमाएं- सरयूसुत मिश्र

सार

राजनीति में बातों और वास्तविकता में अंतर सामान्य है। देश में आज दो खबरों पर चिंता महसूस की जा रही है। भारत का रुपया (Rupee) डॉलर (Dollar) के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। रुपए की कीमत गिरना महंगाई को और बढाएगा। दूसरी खबर श्रीलंका में प्रधानमंत्री का घर जलाने के साथ ही पूरे देश में नेताओं के प्रति आक्रोश और जानलेवा हमले कान खड़े कर रहे है। राजनीति के प्रति यह निराशा का वातावरण क्यों बढ़ता जा रहा है? 

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विस्तार

मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों को जनता का आक्रोश झेलना पड़ा है। दंगा प्रभावित खरगोन में कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को वहां की जनता ने “वापस जाओ, वापस जाओ” के नारे के साथ लौटने के लिए मजबूर कर दिया। दूसरी घटना सिवनी जिले में गोकशी की शंका में मौत के घाट उतारे गए आदिवासी युवकों की खोज खबर के लिए गए भाजपा प्रतिनिधिमंडल के साथ घटित हुई है। “हाय हाय” के नारों के साथ इस राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल का जनता ने विरोध किया।

शांतिप्रिय मध्यप्रदेश में इस तरह की राजनीतिक हवाएं क्यों चलने लगी है? राजनेताओं को "हाय हाय" और "वापस जाओ" के नारों के साथ जनता का आक्रोश झेलना पड़ रहा है। क्या राजनीति जनता के असली मुद्दों को नहीं पकड़ पा रही है? क्या जनता को ऐसा महसूस हो रहा है कि उनकी बहुत सारी समस्याओं की जड़ राजनीति है? क्या आम लोगों की सहनशक्ति की सीमाएं समाप्त हो रही है? राजनीतिक लोग झूठ, छल, प्रपंच और दिखावे की राजनीति करते करते सच से ही दूर हो गए है।

जनता की आक्रोशभरी प्रतिक्रियाएं क्या राजनीति के लिए चुनौती बनने लगी है? जनता के असली मुद्दों पर राजनीति क्यों नहीं की जाती? घोषणाओं और वादों की बातों और असलियत में बढ़ता अंतर क्या आम लोगों की समझ में आने लगा है? अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर कोई भी राजनीतिक दल चर्चा करने से क्यों कतराता है? सरकारी धन का दुरुपयोग क्या राजनेताओं का मौलिक अधिकार बन गया है? मनमर्जी की योजनाएं बनाना और लागू करना क्या समाज में राजनेताओं को विलेन बना रहा है?

वोटों के ध्रुवीकरण के लिए दिखावटी और फ्री योजनाओं की भरमार क्या समाज के एक बड़े तबके को राजनीतिक नैराश्य की ओर धकेल रहा है? समाज में एक ही चीज का अलग-अलग मूल्य देना क्या लोगों को अब सहन नहीं हो रहा है? अड़ोस-पड़ोस में ही रहने वाले लोगों को बिजली फ्री, सस्ती और महंगी दरों पर मिल रही है। जब प्रकृति सबको समान रूप से अपनी सौगात देती है तो फिर सरकारे स्वार्थी राजनीति के चक्कर में समाज को बांटने का काम क्यों करती है?

राजनीति और राजनेताओं को जनता झूठ का पुतला क्यों मानने लगी है। पेट्रोल डीजल की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही है। महंगाई से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। भारतीय रुपए की कीमत इतिहास में सबसे कमजोर हो रही है। फिर भी हनुमान चालीसा, अजान, काशी में ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की शाही मस्जिद, आगरा का ताज महल और दिल्ली में क़ुतुब मीनार का विवाद रोज बनते जा रहे है।

रुपया (Rupee) कमजोर हो रहा है लेकिन धार्मिक विवाद मजबूत हो रहे है। इस आम धारणा को कौन तोड़ेगा कि धार्मिक विवादों के पीछे राजनीतिक हाथ होते है। बिना राजनीतिक संरक्षण के कोई भी धार्मिक विवाद सड़कों पर नहीं आ सकते है। सांप्रदायिक दंगा भी क्या राजनीतिक रोटी सेकने का चूल्हा बन गया है? पक्ष और विपक्ष एक दूसरे को दंगे के लिए जिम्मेदार ठहराते है लेकिन दोनों में कोई भी आरोपी नहीं बनता?

केवल राजनीतिक रोटी सेककर दोनों हंसते-हंसते शांति के साथ अगली जगह पर पहुंच जाते है। जहां भी सांप्रदायिक दंगा या कोई ऐसी घटना होती है जिसमें किसी समुदाय या समाज से जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने का मौका हो सकता है। उसमें कोई भी दल मौका नहीं छोड़ता।

खरगोन में दंगा हुआ तो दोनों दलों ने अपनी राजनीतिक गोटियों के हिसाब से जनता को साधने की कोशिश की? कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को तो वहां की जनता ने दुर्व्यवहार के साथ वापस लौटाया। लोगों का साफ-साफ कहना वीडियो में दिख रहा है कि “वापस जाओ, वापस जाओ” पहले आतंक फैलाओ और फिर जनता के बीच में आओ।

राजनीति से निराशा को दूर करने की चुनौती भी राजनेताओं और राजनीतिक दलों पर ही है। लोकतांत्रिक शासन में इनकी ही जिम्मेदारी है कि जनता में सिस्टम के प्रति विश्वास बना रहे। चुनाव जीतने के लिए ऐसे हथकंडों का उपयोग न किया जाए जो समाज को ही डस ले। आज श्रीलंका में क्या हो रहा है। लोग जरूरी चीजों के लिए मारे-मारे फिर रहे है। जो भी राजनेता सामने पड़ रहे है उन पर लोग जानलेवा हमले कर रहे हैं. 

प्रधानमंत्री के मकान जलाए जा रहे है। सांसदों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। श्रीलंका भी पहले राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं था। वहां भी पक्ष और विपक्ष अपनी अपनी राजनीति चलाने से पीछे नहीं थे। राजनीति में न मालूम क्या हुआ कि देश की अर्थव्यवस्था ही डूब गई। पूरा देश कर्जो में डूब गया। कर्ज चुकाने की हेसियत नहीं बची।

पाकिस्तान में भी ऐसा ही वातावरण बना हुआ है। पूरा देश कंगाली का शिकार हो गया है। दोनों राष्ट्रों में जनता राजनीति और राजनेताओं को सबक सिखाने में लगी हुई है। एक बार कोई सिस्टम फेल हो जाये, तो फिर उसे दोबारा नए सिरे से स्थापित करना कठिन काम होता है।

हमारे देश में देशहित के मुद्दों पर भी राजनीतिक विभाजन साफ-साफ देखा जाता है। देश के लिए काम कर रहे राजनीतिक दल देश के मुद्दों पर क्या एक साथ काम नहीं कर सकते? वोट के लिए एक दूसरे को गलत साबित करने की परंपरा में देश के मुद्दों को भी और देश की जनता को भी बरगलाया जाता है। जब भाषण दिए जाते है तब ऐसा लगता है कि इससे सच तो कुछ भी नहीं है। लेकिन जब उसका असली सच पता लगता है तब तक लोग अपनी राजनीतिक रोटियां पका चुके होते है।

फिर जब अगले चुनाव में मौका आता है तब तक लोग भूल जाते है। ईश्वर द्वारा इंसान को भूलने की जो शक्ति दी गई है।उसका सबसे ज्यादा लाभ राजनीतिक दल ही उठाते है। लोग अपने साथ हुए अन्याय, झूठ और छल प्रपंच को भी याद नहीं रख पाते। इसी कारण ऐसी राजनीति फलती फूलती है। किसी भी शहर में चले जाइए मुख्य सड़क को छोड़ दें तो कालोनियों की सड़कें उखड़ी पड़ी है।

बड़ी आबादी को टैंकर से पानी नसीब हो रहा है। पर्यावरण खत्म हो रहा है। लेकिन विकास के भाषण सुनो तो ऐसा लगने लगता है कि हम पृथ्वी पर नहीं राजनीतिक स्वर्ग में पहुंच गए है। वास्तविकता से अलग बात करने वाला हर इंसान अंततः धोखा ही खाता है। राजनीतिज्ञों को भी सच की राजनीति को अपनी कार्यशैली में उतारना ही एक रास्ता है।